यदि हमारे पास यथेष्ट चरित्र न हो —

November 24, 2007 by halchal

यदि हमारे पास यथेष्ट चरित्र न हो तो हमारी शक्तियों की बजाय हमारी दुर्बलतायें ही अधिक प्रभावी होंगी, हमारे सौभाग्य की तुलना में हमारा दुर्भाग्य ही अधिक प्रबल होगा, हमारे जीवन में सुख शांति की जगह शोक विषाद की ही बहुतायत होगी और हमारे भविष्य की तुलना में हमारा अतीत ही अधिक गौरवशाली होगा।

यदि हमारे पास यथेष्ट चरित्र न हो तो हमारे मित्रों की अपेक्षा हमारे शत्रु ही अधिक सबल होंगे, शांति की तुलना में युद्ध ही अधिक होंगे, मेल मिलाप के स्थान पर हिंसा का ही आधिक्य होगा। यथेष्ट चरित्र के अभाव में हमारी रेलगाड़ियां समय से नहीं चलेंगी, कारखाने अपनी क्षमता के अनुरूप उत्पादन नहीं करेंगे; उद्योग धन्धे चौपट हो जायेंगे और खेतों से आशानुरूप फसल नहीं होगी।

यदि यथेष्ट चरित्र न हो तो हमारे मन्दिर व्यवसायिक केन्द्र बन जायेंगे और हमारे शिक्षाकेन्द्र कारखाने मात्र बन कर रह जायेंगे। हमारे पास यदि यथेष्ट चरित्र न हो तो हम ऐसे कार्यों को टालेंगे जो हमें पूर्ण बनाते हैं और उत्साह पूर्वक ऐसे कार्य करेंगे जो बरबादी लाते हैं। यदि यथेष्ट चरित्र न हो तो हमारे बांध बाढ़ को रोक नहीं सकेंगे, हमारे पुल बह जायेंगे और हमारे राजमार्ग जगह-जगह टूट कर जीवन का विनाश करेंगे।

यदि हमारे पास यथेष्ट चरित्र न हो, तो हमारी नगरपालिकायें गुटबन्दी के अड्डे बन जायेंगे, सड़कें कूड़े-कचरे से परिपूर्ण होंगी और हमारे कार्यालयों में कामचोरी का साम्राज्य होगा। यदि यथेष्ट चरित्र न हो तो हमारे नेता अपने नेतृत्व की खरीद-फरोख्त करेंगे, हमारे राजनैतिक दलों में फूट होगी, हमारे पुरोहित दुकानदारों के समान होंगे और व्यवसायी ‘गला काटने’ में आनन्द का अनुभव करेंगे।

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यथेष्ट चरित्र के अभाव में हमारी रेलगाड़ियां समय से नहीं चलेंगी, कारखाने अपनी क्षमता के अनुरूप उत्पादन नहीं करेंगे; उद्योग धन्धे चौपट हो जायेंगे और खेतों से आशानुरूप फसल नहीं होगी।

यदि हमारे पास यथेष्ट चरित्र न हो, तो सेवा कार्यों की अपेक्षा आपराधिक कर्म ही अधिक होंगे, सुरक्षित स्थानों की तुलना में असुरक्षित स्थानों का ही बाहुल्य होगा, विश्वसनीय व्यक्तियों की अपेक्षा सन्दिग्ध लोगों की ही संख्या अधिक होगी। यदि हमारे पास यथेष्ट चरित्र न हो, तो युवक और युवतियां असंयमी होंगे, वृद्ध और वृद्धायें उत्तेजक तथा तारुण्यपूर्ण आचरण करेंगे, जिसके फलस्वरूप सरकार को अधिकाधिक पागलखाने खोलने की आवश्यकता होगी। यदि हमारे पास यथेष्ट चरित्र न हो, तो हमारी संस्कृति कामुकता का पर्याय बन जायेगी, हमारी कला धूल में मिल जायेगी और हमारा साहित्य शुद्ध इन्द्रियपरता में परिणत हो जायेगा।

यदि हमारे पास यथेष्ट चरित्र न हो, तो हमारे समाज में शांति-सामंजस्य, सुख-संयम और सच्चाई-ईमानदारी की तुलना में लड़ाई-झगड़ों, उत्तेजना-उपद्रव, भ्रष्टाचार तथा भाई-भतीजावाद का बोलबाला होगा। हमारे पास यथेष्ट चरित्र न हो, तो धन कमाने के लिये हम निम्न तथा कुरुचिपूर्ण भावों को बढ़ावा देने वाली चीजों को बेंच कर, लोगों की और यहां तक अपने बच्चों की अभिरुचि तक को भी भ्रष्ट कर डालेंगे। यदि हमारे पास यथेष्ट चरित्र न हो, तो धर्म निर्जीव अनुष्ठानों तक ही सीमित रह जायेगा, नैतिक मूल्य विकृत होकर विताण्डवाद में परिणत हो जायेंगे, लोकहित आत्मप्रशंसा के हेतु सामाजिक कार्य में, आध्यात्मिकता ऐहिकता में, ऐहिकता सुखवाद में और सुखवाद विनाश में परिणत हो जायेगा। (शेष कल —)


स्वामी बुधानन्द की पुस्तिका - "चरित्र-निर्माण कैसे करें", अध्याय - 4 के अंश। 

अद्वैत आश्रम, कोलकाता से प्रकाशित। मूल्य रुपये 8 मात्र।  


टिप्पणी नीति - कुछ यूंही विचार

November 23, 2007 by halchal

कमेण्ट मॉडरेशन बड़ी वाहियात चीज है। अगर आप अपने पाठकों से जुड़ाव महसूस करते हैं तो यह आपको इण्टरनेट और कम्प्यूटर से दूर नहीं जाने देती। तो फिर मेरे जैसा आदमी, जो टिप्पणी मॉडरेशन के खिलाफ लिख चुका था, मॉडरेशन को क्यों बाध्य हुआ?

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इस बारे में चर्चा होनी चाहिये कि सुस्पष्ट व्यक्तिगत टिप्पणी नीति पाठक/ब्लॉगर आवश्यक मानते हैं या नहीं।

चित्र में टच-स्टोन

पहले जब मुझे पढ़ने वाले और टिप्पणी करने वाले कम थे, तो हम पर्सन-नॉन-ग्राटा थे।

हमारे लेखन या टिप्पणियों से किसी के पेट में दर्द नहीं होता था। मेरी टिप्पणियों में और लेखों में कभी-कभी तल्खी अवश्य झलकती है। वह व्यक्तित्व का अंग है। शायद दुर्वासा के गोत्र में होऊं। लिहाजा जब कुछ ब्लॉग-यातायात बढ़ा ब्लॉग पर तो लैम्पूनर्स (निन्दक) भी आये।

स्वस्थ निन्दा खराब नहीं लगती, वरन सोचने को ऊर्जा प्रदान करती है। पर गाली गलौज और अश्लीलता को जायज मानने वाले और व्यर्थ ईश निन्दा में रुचि लेने वाले भी इस ब्लॉग जगत में हैं। पहले मुझे लगा कि उनके लिये एक टिप्पणी नीति की आवश्यकता है। मैने आनन-फानन में बनायी भी। वह यहां पर है। वह नीति मुझे ब्लॉग पोस्ट के रूप में दिखाने की जरूरत नहीं पड़ी। मैने साथ में टिप्पणी मॉडरेशन का निर्णय लिया। और मुझे याद नहीं आता कि एक आध बेनामी टिप्पणी के अलावा कभी मुझे कोई टिप्पणी हटानी पड़ी हो। ब्लॉग जगत में लोग जिम्मेदार ही हैं और अगर उन्हे पता रहे कि खुराफात का स्कोप नहीं है तो और भी जिम्मेदारी से काम लेते हैं।

इस टिप्पणी नीति के इतर मैने कुछ दिनों पहले यही निर्णय लिया है कि अंग्रेजी में भी टिप्पणियों का स्वागत करूंगा। 

 

अपने ब्लॉग पर तो नहीं पर आलोक 9211 के ब्लॉग पर एक मामला मुझे मिला। इसमें आलोक ने आगे ‘बिल्लू पीछे सेब’ के नाम से पोस्ट लिखी है। इस पर आयी दो विवादास्पद टिप्पणियों को आलोक ने ब्लॉग पर रखने का निर्णय लिया। आलोक की पोस्ट और टिप्पणियों का आप अवलोकन करें। यह पोस्ट माइक्रोसॉफ्ट के लिये अप्रिय है। एक बेनाम सज्जन ने आलोक को माइक्रोसॉफ्ट के प्रति अनग्रेटफुल पिग (अकृतज्ञ सूअर) कहते हुये अंग्रेजी में टिप्पणी की है। उसपर अरविन्द जी ने मां की गाली देते हुये उस अंग्रेजी में टिप्पणी करने वाले को ललकारा है। आलोक ने अपनी टिप्पणी नीति का हवाला दे कर दोनो टिप्पणियों को रिटेन करना जस्टीफाई किया है।1

मैं आलोक के पक्ष-विपक्ष में नहीं जा रहा। मैं केवल यह प्रसन्नता व्यक्त कर रहा हूं कि आलोक के पास टिप्पणी पॉलिसी का टच-स्टोन है जिसपर वे तोल कर टिप्पणी रखने/हटाने का निर्णय करते हैं। शायद और ब्लॉगरों के पास भी अपनी नीति हो। कृपया आप आलोक के तर्क भी उस पोस्ट पर देखें। 

इस बारे में चर्चा होनी चाहिये कि सुस्पष्ट व्यक्तिगत टिप्पणी नीति पाठक/ब्लॉगर आवश्यक मानते हैं या नहीं।


1. वैसे; आलोक 9211 वाला उक्त मामला मेरे साथ होता तो मैं दोनो टिप्पणियों पर रबर फेर देता! आलोक मनमौजी हैं, जापानी से निकल थाई भाषा में टहल रहे हैं। पर मेरे लिये हिन्दी माँ है तो अंग्रेजी मामी! कोई दिक्कत नहीं अंग्रेजी से। और ब्लॉगर.कॉम को भी मैं दान की बछिया मानता हूं - उसके दांत नहीं देखे जाते। गूगल जी को हिन्दी में नफा नजर आयेगा तो हिन्दी ब्लॉगर.कॉम अपने से चमकदार बनेगा। ब्लॉगर की पोल से क्या फर्क पड़ेगा; यह मैं किनारे बैठ कर देखता रहूंगा।

चलते-चलते : कल संजय तिवारी का यह लेख पढ़ा। टिप्पणी करने के पहले रुक गया। लिखा था -  ‘बिना पूरा पढ़े, टिप्पणी न करें’। पूरा पढ़ना क्या होता है? आत्मसात करना? आत्मसात करने पर टिप्पणी क्या निकलेगी? उहापोह में मैं रुक गया। अच्छा हुआ, नहीं तो शायद अण्ट-शण्ट लिखता। बिना पोस्ट पढ़े टिप्पणी करने को दिखाने/न दिखाने के विषय को संजय अपनी टिप्पणी नीति से जोड़ सकते हैं।       


कम्प्यूटर तकनीक बच्चों से सीखें

November 22, 2007 by halchal

मेरे पास रेलवे के एक वरिष्ठ अधिकारी आये। उन्होने कहीं से सुना था कि मेरे पास कोई वेब साइट है, जिसपर मैं लिखता हूं। ये वरिष्ठ अधिकारी नॉन-टेक नहीं हैं। इंजीनियर हैं। उन्होने जब संघ लोक सेवा अयोग की परीक्षा पास की होगी तब इंजीनियरिग प्रतिभा की क्रीम रेलवे में आती थी।

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(उम्र के साथ) अव्वल तो आदमी में सीखने का मद्दा नहीं बचता। बचता भी है तो अपने से छोटों पर यह जाहिर हो कि हम अनाड़ी हैं - बड़ी तौहीन महसूस होती है।

इन वरिष्ठ अधिकारी महोदय को भी अपने काम की तकनीक का अच्छा अनुभव है। पर जहां कम्प्यूटर/इण्टरनेट के प्रयोग का नाम आता है, अपंग महसूस करते हैं। मुझे नहीं लगता कि यह पीढ़ी (और यह मेरी पीढ़ी है) कम्प्यूटर तकनीक का बहुत प्रयोग करेगी। बहुतों को मैने मोबाइल फोन के मूलभूत प्रयोग से आगे बढ़ने में उलझते देखा है।

मैंने उन सज्जन को ब्लॉग बनाने के बेसिक्स बताये। उन्हे अपने ब्लॉग के बारे में बताया। उन्हें विश्वास ही न हो रहा था कि मैं यह सब लिखता-करता हूं। वे चले गये। थोड़े जोश और अधिक कंफ्यूजन में। मुझे नहीं लगता कि वे स्वयम मेरा ब्लॉग खोलेंगे या खोल पायेंगे। ऐसे लोग अपवाद नहीं, बहुतेरे हैं।

Lap Top

सभी रेल प्रशासनिक अधिकारियों को रेलवे ने लैपटॉप दिये। हमने जब अपना लैपटॉप प्राप्त किया तो बहुत उत्सुकता थी। पर ज्यादातर वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी बड़ी साफगोई से कहते पाये गये कि यह कम्प्यूटर तो उनके बच्चे प्रयोग करेंगे।

नये लैपटॉप ने मेरे पुराने बूढ़े सेलेरॉन वाले असेम्बल्ड पीसी को लगभग 85% विश्राम दे दिया है। पर लगभग सभी अधिकारी जो मेरी जान पहचान वाले हैं, या तो लैपटॉप का प्रयोग नहीं कर रहे या फिर उनके बच्चे उसका उपयोग कर रहे हैं। कनिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी अवश्य प्रयोग कर रहे हैं इस सुविधा का।

कम्प्यूटर तकनीक (या कोई भी तकनीक) का प्रयोग करने में उम्र बाधक नहीं।1 पर झिझक अवश्य देती है। अव्वल तो आदमी में सीखने का मद्दा नहीं बचता। बचता भी है तो अपने से छोटों पर यह जाहिर हो कि हम अनाड़ी हैं - बड़ी तौहीन महसूस होती है।

सरकारी अफसर के साथ एक और फिनॉमिनॉ है। वह नये गैजेट के लिये एक बन्दा ढ़ूंढता है जो उसका प्रयोग कर सके। वह स्वयम ‘गिफ्ट ऑफ द गैब’ (बकबक करने की प्रतिभा) के माध्यम से काम चलाता है। प्राइवेट सेक्टर में शायद लोग ज्यादा उम्र में भी तकनीक का प्रयोग सीखने में तत्पर रहते हों।

तो मित्रों, तकनीक का प्रयोग सीखने में अगर दिक्कत है तो अपने से छोटी उम्र के व्यक्ति को दोस्ताना अन्दाज में पकड़िये!


1. इसी लिये जब अनूप शुक्ल जब मेरी कल की पोस्ट पर टिप्पणी देते हैं कि - ‘आपने पुलकोट के भी आगे फोटो लगाना सीख लिया। क्या कहने!’ और फिर फोन पर वही बात दुहराते हैं तो (यद्यपि मैं यूं जताता हूं कि कोई खास बात नही है; पर) मन ही मन प्रसन्न होता हूं।

आखिर बढ़ती उम्र में तकनीकी खुराफात जिन्दा तो है!Thumbs-up

हर्रा या हरड़ - एक चमत्कारिक वनौषधि

November 21, 2007 by halchal

पंकज अवधिया मेरे ब्लॉग के नियमित पाठक हैं। मैं भी इनका ब्लॉग मेरी कविता नियमित पढ़ता हूं। इनका वनस्पति और पर्यावरण के प्रति जुनूनी प्रेम मुझे बहुत आकर्षित भी करता है और अपने अज्ञान पर मुझे संकुचित भी करता है। अपनी टिप्पणियों में मेरी नींद, वजन, पैरों में दर्द तथा मेरी पत्नी के आधासीसी सिरदर्द के विषय में उन्होने बहुत उपयोगी सुझाव दिये। मुझे मौका मिला उन्हें मेरे ब्लॉग के लिये स्वास्थ्य विषयक अतिथि-ब्लॉगपोस्टें लिखने का आमंत्रण देने का। और उन्होने मुझे निराश नहीं किया। आप उनकी पोस्ट पढ़ें - 


panj_imageमैं पिछले कुछ समय से लगातार ज्ञान जी के ब्लॉग को पढ रहा हूँ और टिप्पणी कर रहा हूँ। मेरी टिप्पणियो मे यदा-कदा वनौषधीयों के विषय मे भी लिखा होता है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इस आधार पर ढेरो सन्देश पाठकों की स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं को लेकर मुझे मिल रहे है।

मैने जब ज्ञान जी को इसके बारे मे बताया तो उन्होने सुझाया कि मै बतौर अतिथि लेखक उनके ब्लाग पर इन सन्देशों का जवाब दूँ। मैने स्वीकार कर लिया। अब मै प्रति सप्ताह एक प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करूंगा। अभी तो इतने प्रश्न है कि छ माह तक जवाब दिये जा सकते है। आप भी अपने प्रश्न प्रेषित कर सकते है ज्ञान जी को।

जैसा आप जानते है मै कृषि विशेषज्ञ हूँ और वर्तमान मे वनौषधियों से सम्बन्धित पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान का दस्तावेजीकरण कर रहा हूँ। अब तक किये गये कार्य के आधार पर ढाई लाख पन्नो मे समाहित 20,000 वैज्ञानिक दस्तावेज अंतरजाल पर उपलब्ध है। देश भर के पारम्परिक चिकित्सको के सानिध्य से जो कुछ मैने सीखा है उस ज्ञान को जग-हित मे मैं यहाँ बाँटना चाहूंगा। अब मैं एक आम हित का प्रश्न लेता हूं -

 

प्रश्न: ऐसा उपाय बतायें जिससे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़े और रोगों से बचाव हो सके।

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मेरे दिवंगत स्वसुर जी कहते थे कि जिस अभागे की मां न हो, वह हर्रा, बहेर्रा और आंवला को अपनी मां समझे। ये तीनों मां की तरह स्वास्थ्य की रक्षा करेंगे।

- ज्ञानदत्त पाण्डेय

उत्तर: देश के मध्य भाग के पारम्परिक चिकित्सक एक बडा ही सरल उपाय सुझाते है। यह उपाय है हर्रा या हरड के प्रयोग का।

एक फल ले और उसे रात भर एक कटोरी पानी मे भिगो दे। सुबह खाली पेट पानी पीयेँ और फल को फैंक दें। यह सरल सा दिखने वाला प्रयोग बहुत प्रभावी है। यह ताउम्र रोगो से बचाता है। वैसे विदेशो मे किये गये अनुसन्धान हर्रा के बुढापा रोकने की क्षमता को पहले ही साबित कर चुके हैं।

अब प्रश्न उठता है कि कितने समय तक इसे लिया जाये। बहुत से विशेषज्ञ इसे आजीवन लेने की सलाह देते है पर किसी भी दवा का नियमित प्रयोग उचित नही है। अत: साल के किसी भी तीन महिने इसे लिया जा सकता है।

मैने पेट, आँख, अच्छी नींद, तनाव मुक्ति, जोड़ों के दर्द, मोटापे आदि के लिये इसे उपयोगी पाया है पर पारम्परिक चिकित्सक इसे पूरे शरीर को मजबूत करने वाला उपाय मानते है। शरीर चंगा तो फिर रोग कहाँ से आयेंगे।

terminalia Harad
harra ^ चित्र ऊपर
छोटी और बड़ी हर्रा/हरड़ के हैं - इण्टरनेट से लिये गये।

«चित्र बायें 
कटोरी में रात भर पानी में भिगोया हर्रा व उसका पानी

यदि आपको कोई गम्भीर रोग है तो आप अपने चिकित्सक की सलाह लेकर इसका प्रयोग करे। अन्य अंग्रेजी दवाओ के साथ इसके प्रयोग के लिये भी उनसे पूछ ले। मैने तो पाया है कि किशोरावस्था से यदि इसके प्रयोग की आदत हो जाये तो क्या कहने?!

इस साधारण प्रयोग को और अधिक उपयोगी बनाने बहुत सारे जटिल नियम है। जैसे झरने के पानी के साथ इसका प्रयोग, या फिर उच्च गुणवत्ता के फलों का उपयोग। हमारे छत्तीसगढ मे पारम्परिक चिकित्सक पुराने पेड़ों को विभिन्न सत्वो से सींचते है ताकि फल उच्च गुणयुक्त हो। आज के व्यस्त जीवन मे यह सब कर पाना असम्भव सा है हम आधुनिक मनुष्यों के लिये।

अत: जो भी और जितना भी बन पड़े उसे ही अच्छे से करना चाहिये।

पंकज अवधिया


कहाँ से कसवाये हो जी!

November 20, 2007 by halchal

साइकल ऑफ-द-शेल्फ मिलने वाला उत्पाद नहीं है। आप दुकान पर बाइसाइकल खरीदते हैं। उसके एक्सेसरीज पर सहमति जताते हैं। उसके बाद उसके पुर्जे कसे जाते हैं। नयी साइकल ले कर आप निकलते हैं तो मित्र गण उसे देख कर पूछते हैं - ‘नयी है! कहाँ से कसवाये भाई!?’।

नयी चीज, नया प्रकरण या नया माहौल - उसमें ‘कसवाना‘ शब्द का प्रयोग या दुष्प्रयोग बड़ा मनोरंजक हो जाता है।

सोनियाँ गांधी जी से पूछा जा सकता है कि उनकी "स्पीच बहुत धांसू है; किससे कसवाई है?"

पांड़े जी नयी जींस की नीली शर्ट पहने फोटो खिंचाकर अपने ब्लॉग पर फोटो चस्पाँ करते हैं। टिप्पणियाँ आती हैं - "बड़े चमक रहे हो जी। नयी जमाने की शर्ट है। कब कसवाये?"

मेटर्निटी होम से लौटने पर नौजवान से लोग पूछ बैठें (यह जानने को कि क्या हुआ) - "क्या कसवाये जी? लड़का या लड़की?"

बाऊजी के दांत क्षरित हो गये। नयी बत्तीसी के लिये डेण्टिस्ट से अप्वॉइण्टमेण्ट तय कराया लड़के ने। पिताजी को बोला - "संझा को दफ्तर से लौटूंगा तो चलेंगे। आपके नये दांत कसवाने!"

Gyan(202)

Gyan(203) कसवाई जाती नयी साइकल

रविवार को साढ़े इग्यारह बजे मैं कटरा बाजार में पुरानी 4-5 घड़ियों में सेल लगवा रहा था। एक दो में कुछ रिपेयर भी कराना था। मोबाइल पर उपेन्द्र कुमार सिन्ह जी का फोन बजा - "क्या कसवा रहे हैं जी?" कसवाना शब्द मेरी जिन्दगी में इन अर्थों में परिचित कराने का श्रेय उन्हें ही है। पिछले सप्ताह भर से इस शब्द को वे बहुत कस कर प्रयोग कर रहे हैं।Gyan(207) मैने जवाब दिया कि फिलहाल तो घड़ी कसवा रहा हूं। वहीं बगल में साइकल वाले की दुकान थी और उसका कारीगर वास्तव में नयी साइकल कस रहा था।

कसवाने में दूसरे पर निर्भरता निहित है। उदाहरण के लिये अनूप सुकुल को यह नहीं कह सकते कि "आपकी पोस्ट बड़ी मस्त है, किससे कसवाये हो जी!" यह जग जानता है कि वे (भले ही जबरी लिखते हों) अपनी पोस्ट खुद कसते हैं! सोनियाँ गांधी जी से पूछा जा सकता है कि उनकी "स्पीच बहुत धांसू है; किससे कसवाई है?"

‘गुरू गुड़ और चेला शक्कर’ वाले मामलों में कसवाने का मुक्त हस्त से प्रयोग हो सकता है - कसवाया गुरू से और क्रेडिट चेले ने झटक लिया। मसलन ब्लॉग जगत का टेण्ट कसवाया नारद से और झांकी जम रही है नये एग्रेगेटरों की!

सो मित्रों, कसवाना शब्द मैने उपेन्द्र कुमार सिन्ह से - जो खुद ब्लॉगर नहीं हैं; झटका है। पर असकी कसावट तो आप ला सकते हैं अपनी टिप्पणियों से। Laughing


$2500 की कार भारत में ही सम्भव है!(?)

November 19, 2007 by halchal

टाटा की लखटकिया कार कैसे सम्भव है? दुनियाँ के किसी और हिस्से से ऐसी सस्ती कार की बात नहीं आयी। टाटा की बात को भी काफी समय तक अविश्वास से लिया गया। यह तो अब है कि समझा जा रहा है कि भले एक लाख में न हो, सवा लाख में तो कार मिलने लगेगी। अगले साल के शुरू में यह कार नुमाइश के लिये रखी जायेगी और सन 2008 के मध्य में मार्केट में आ जायेगी।

मैं इस बात से आश्वस्त हूं कि सस्ती कार (अन्य स्तरीय चीजें भी) भारत में बन सकने के लिये सही वातावरण है। उद्यमिता और प्रतिभा - दोनो की कमी नहीं है। जबरदस्त सिनर्जी है!

इसके देखा-देखी बजाज आटो, रेनाल्ट (फ्रेंच कम्पनी) और निसान मोटर के साथ मिल कर $3000 में अपनी कार दुनियाँ भर में लाने की योजना रखते हैं। हुन्दै मोटर इण्डिया कम्पनी $5000 में ऐसी कार लाने की बात कर रही है। कुल मिला कर 2008-09 में छोटी और सस्ती कारों की लाइन लगने जा रही है। और सबके पीछे टाटा की लखटकिया कार का साकार होने जा रहा स्वप्न ही है।

एक लाख की कार का बनना मुझे लगता है कि भारत में ही सम्भव है। भारत ही ऐसा देश है जहां इतनी सस्ती डिजाइन की जा सकती है। जबसे मैने अपनी आंख से जुगाड़ ट्रेक्टर देखा है मैं इस देश के लोगों की प्रतिभा का कायल हो गया हूं। मेरा कहना यह नहीं है कि टाटा की कार का डिजाइन जुगाड़ जैसा है - वह तो निश्चय ही बेहतरीन होगा। मैं तो मात्र भारत में सस्ता और उत्कृष्ट डिजाइन हो पाने की सम्भावना की बात कर रहा हूं जो अन्यत्र सम्भव नहीं लगता। यह डिजाइन नयी सोच के हिसाब से हो सकता है - रिवर्स इंजीनियरिंग के हिसाब से नहीं।

रतन टाटा उवाच

24 जनवरी’05 को बिजनेस वर्ल्ड में :

Let’s take the example of an Indian refrigerator manufacturer who is trying to go from A to B. It will go and buy some benchmark refrigerator, will take it apart, and reverse engineer - we’re still in that phase - then make a product which may not be as good. Or, by luck, better. Some of our companies are in that position. Each time they have to develop a product, they have to find a product they want to emulate, take it apart, reverse engineer. I think we will have really arrived when we don’t need to do that.

एक लाख की कार में भीषण कॉस्ट कटिंग के फण्डे लगने चाहियें। यह डिजाइन और प्रोडक्शन के लिये चैलेंज है। मुझे लगता है कि टाटा मोटर्स बहुत सा काम अपनी पार्ट्स सप्लाई की वेण्डर कम्पनियों से करा रही होगी जो डिजाइन और उत्पादन दोनों में कॉस्ट कटिंग के लिये उपयुक्त हैं। भारत की ये कम्पनियां चाहे फोर्जिंग, इंजन के हिस्सों, ब्रेक असेम्बली या गीयर सिस्टम में दखल रखती हों, बहुत सक्षम हैं डिजाइन में। ये वेण्डर डिजाइन का बड़ा हिस्सा संभाल रहे होंगे। इन सब वेण्डरों की विजय बहुत बड़ी संख्या में होने जा रही बिक्री पर निर्भर है। वह बिक्री भारत की 8-9% से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था के रथ पर आरूढ़, एक सशक्त सम्भावना लगती है। और कार अगर चल निकली तो दुनियाँ भर में बिकेगी!

लगभग वैसा ही बजाज आटो के साथ होगा। उनके पास दुपहिया वाहनों के पार्ट्स के बहुत से सप्लायर्स हैं जो कार के पार्ट्स वेण्डर्स में अपग्रेड होंगे और पार्ट डिजाइन भी करेंगे। हुन्दै मोटर इण्डिया कम्पनी के बारे में यह नहीं कहा जा सकता। वैसे भी वह दुगने दाम की कार की बात कह रही है।

मैं यह कार खरीदने की सोच से नहीं लिख रहा हूं। पर उपलब्ध सूचना के आधार पर कल्पना करना मुझे आता है। और मैं इस बात से आश्वस्त हूं कि सस्ती कार (अन्य स्तरीय चीजें भी) भारत में बन सकने के लिये सही वातावरण है। उद्यमिता और प्रतिभा - दोनो की कमी नहीं है। जबरदस्त सिनर्जी है!


(1. ऊपर चित्र 24 जनवरी 2005 के बिजनेस वर्ल्ड के पेज से है। बहुत सम्भव है इसका टाटा की आने वाली कार से कोई समरूपता न हो।

2. सागरचन्द नाहर जी का ये जुगाड़ बहुत मस्त है! ऊपर मैने इस्तेमाल कर रखा है।)


गन्ना खरीद के भाव तय करने में कोर्ट की भूमिका

November 18, 2007 by halchal

कोटा-परमिट राज में सरकार तय करती थी चीजों के भाव। अब उत्तरोत्तर यह कार्य कोर्ट के हस्तक्षेप से होने लगा है। Bamulahija बामुलाहिजा में कीर्तिश भट्ट का कुछ दिन पहले एक कार्टून था कि मध्यप्रदेश में दूध के भाव सुप्रीम कोर्ट तय करेगा। लगभग उसी दिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तय किया कि उत्तर प्रदेश में गन्ना का खरीद मूल्य 110 रुपये प्रति क्विण्टल रखा जायेगा। चीनी मिलें गन्ने का खरीद मूल्य 60 रुपये मात्र देने को राजी थीं - वर्ष 200708 के लिये। केन्द्र सरकार का वैधानिक न्यूनतम रेट 85-90 रुपये है वर्तमान सीजन के लिये। उत्तर प्रदेश सरकार ने चीनी मिलों को 125 रुपये प्रति क्विण्टल देने को कहा था।

उत्तर प्रदेश सरकार का आदेश इस प्रकार का नहीं था कि अगर चीनी मिलें गन्ना नहीं खरीदतीं तो सरकार उस कीमत पर खरीदेगी - जैसा ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ के मामले में होता है। इस आदेशानुसार चीनी मिलों को ही खरीद करनी थी। चीनी मिलें इस मूल्य पर खरीद की बजाय उत्पादन न करने का विकल्प तलाश रही थीं। अब हाई कोर्ट ने थोड़े घटे मूल्य पर खरीदने को कहा है। Sugar

यह कीमतें तय करने का कृत्रिम तरीका प्रतीत होता है। अगर चीनी मिलें समय पर गन्ना खरीद का पैसा किसान को नहीं देतीं तो कोर्ट को हस्तक्षेप करना चाहिये। पर खरीद मूल्य बाजार को ही तय करने चाहियें। मान लें कि किसी दशा में खरीद मूल्य कम रहता है - उस दशा में सभी चीनी उत्पादन में कूदेंगे और प्रतिस्पर्धा के चलते खरीद मूल्य स्वत: ही बढ़ेगा और उस स्तर पर आ जायेगा जिसे स्वस्थ मार्केट कण्डीशन तय करेंगी। और अगर पेट्रोल की दरों में सरकारी नियंत्रण कम हो तो शायद गन्ना वैकल्पिक ऊर्जा का स्रोत बन सके और गन्ना उत्पादकों को बेहतर मूल्य स्वत: मिलें।  

पर यदि भावों को लेकर राजनीति चलती रही तथा चीनी का आयात-निर्यात बाजार की आवश्यकताओं से परे किन्ही अन्य कारणों के आधार पर तय होते रहे तो भाव तय करने में न्यायालय की भूमिका उत्तरोत्तर बढ़ती जायेगी। न्यायालय को भाव तय करने पड़ें - यह बहुत स्वस्थ दशा नहीं है समाज या अर्थव्यवस्था की। और कोई आशा की किरण नजर नहीं आती।     


राजकमल, लोकवाणी और पुस्तक व्यवसाय

November 17, 2007 by halchal

सतहत्तर वर्षीय दिनेश ग्रोवर जी (लोकवाणी, इलाहाबाद के मालिक) बहुत जीवंत व्यक्ति हैं। उनसे मिल कर मन प्रसन्न हो गया। व्यवसाय में लगे ज्यादातर लोगों से मेरी आवृति ट्यून नहीं होती। सामान्यत वैसे लोग आपसे दुनियाँ जहान की बात करते हैं, पर जब उनके अपने व्यवसाय की बात आती है तो बड़े सीक्रेटिव हो जाते हैं। शब्द सोच-सोच कर बोलते हैं। या फिर जनरल टर्म्स में कहने लग जाते हैं। लेकिन दिनेश जी के साथ बात करने पर उनका जो खुलापन दीखा, वह मेरे अपने लिये एक प्रतिमान है।

दिनेश जी के बड़े मामा श्री ओम प्रकाश ने 1950 में राजकमल प्रकाशन की स्थापन दरियागंज, दिल्ली में की थी। सन 1954 में राजकमल की शाखा इलाहाबाद में स्थापित करने को दिनेश जी इलाहाबाद पंहुचे। सन 1956 में उन्होने पटना में भी राजकमल की शाखा खोली। कालांतर में उनके मामा लोगों ने परिवार के बाहर भी राजकमल की शेयर  होल्डिंग देने का निर्णय कर लिया। दिनेश जी को यह नहीं जमा और उन्होने सन 1961 में राजकमल से त्याग पत्र दे कर इलाहाबाद में लोक भारती प्रकाशन प्रारम्भ किया।

उसके बाद राजकमल के संचालक दो बार बदल चुके हैं। राजकमल में दिनेश जी की अभी भी हिस्सेदारी है।

Gyan(185) Gyan(186)
Gyan(187)

Gyan(188)
विभिन्न मुद्राओं में दिनेश ग्रोवर जी

सन 1977 में दिनेश जी ने लोकभारती को लोकभारती प्रकाशन के स्थान पर लोकभारती को पुस्तक विक्रेता के रूप में री-ऑर्गनाइज किया। वे पुस्तकें लेखक के निमित्त छापते हैं। इसमें तकनीकी रूप से प्रकाशक लेखक ही होता है। दिनेश जी ने बताया कि उन्होने लॉ की पढ़ाई की थी। उसके कारण विधि की जानकारी का लाभ लेते हुये अपने व्यवसाय को दिशा दी।

उन्होने बताया कि उनकी एक पुत्री है और व्यवसाय को लेकर भविष्य की कोई लम्बी-चौड़ी योजनायें नहीं हैं। उल्टे अगले तीन साल में इसे समेटने की सोचते हैं वे। कहीं आते जाते नहीं। लोकभारती के दफ्तर में ही उनका समय गुजरता है। जो बात मुझे बहुत अच्छी लगी वह थी कि भविष्य को लेकर उनकी बेफिक्री। अपना व्यवसाय समेटने की बात कहते बहुतों के चेहरे पर हताशा झलकने लगेगी। पर दिनेश जी एक वीतरागी की तरह उसे कभी भी समेटने में कोई कष्ट महसूस करते नहीं प्रतीत हो रहे थे। व्यवसायी हैं - सो आगे की प्लानिंग अवश्य की होगी। पर बुढ़ापे की अशक्तता या व्यवसाय समेटने का अवसाद जैसी कोई बात नहीं दीखी। यह तो कुछ वैसे ही हुआ कि कोई बड़ी सरलता से सन्यास ले ले। दिनेश जी की यह सहजता मेरे लिये - जो यदा-कदा अवसादग्रस्त होता ही रहता है - बहुत प्रेरणास्पद है। मैं आशा करता हूं कि दिनेश जी ऐसे ही जीवंत बने रहेंगे और व्यवसाय समेटने के विचार को टालते रहेंगे। 

मैं दिनेश जी की दीर्घायु और पूर्णत: स्वस्थ रहने की कामना करता हूं। हम दोनो का जन्म एक ही दिन हुआ है। मैं उनसे 25 वर्ष छोटा हूं। अत: बहुत अर्थों में मैं उन्हे अपना रोल मॉडल बनाना चाहूंगा।  


बम्बई जाओ भाई, गुजरात जाओ

November 16, 2007 by halchal

मेरी सरकारी कार कॉण्ट्रेक्ट पर है। ठेकेदार ने ड्राइवर रखे हैं और अपनी गाड़ियाँ चलवाता है। ड्राइवर अच्छा है। पर उसे कुल मिलते हैं 2500 रुपये महीना। रामबिलास रिक्शेवाला भी लगभग इतना ही कमाता है। मेरे घर में दिवाली के पहले पुताई करने वाले आये थे। उन्हें हमने 120 रुपया रोज मजूरी दी। उनको रोज काम नहीं मिलता। लिहाजा उनको भी महीने में 2000-2500 रुपये ही मिलते होंगे।

tailors कल मैं अपनी पत्नी के साथ टेलर की दूकान पर गया। मास्टर ने दो कारीगर लगा रखे थे। उनसे मैने पूछा कितना काम करते हो? कितना कमाते हो? उन्होने बताया कि करीब 10-12 घण्टे काम करते हैं। मास्टर ने बताया कि दिहाड़ी के 100 रुपये मिलते हैं एक कारीगर को। कारीगर ने उसका खण्डन नहीं किया। मान सकते हैं कि इतना कमाते हैं। यह भी पड़ता है 2500 रुपया महीना।

मेरी पत्नीजी का अनुमान है कि अगर घर का हर वयस्क इतना कमाये तो परिवार का खर्च चल सकता है। यह अगर एक बड़ा अगर है। फिर यह भी जरूरी है कि कोई कुटेव न हो। नशा-पत्ती से बचना भी कठिन है।

कुल मिला कर इस वर्ग की आमदनी इतनी नहीं है कि ठीक से काम चल सके।

‘ब’ बम्बई से मुझे फोन करता है - भैया, बम्बई आई ग हई (भैया बम्बई आ गया हूं)। उसे मैने सीड मनी के रूप में 20,000 रुपये दिये थे। कहा था कि सॉफ्ट लोन दे रहा हूं। साल भर बाद से वह 500 रुपये महीना ब्याज मुक्त मुझे लौटाये। उस पैसे को लेकर वह बम्बई पंहुचा है। बाकी जुगाड़ कर एक पुरानी गाड़ी खरीदी है और बतौर टेक्सी चलाने लगा है। मैं पैसे वापस मिलने की आशा नहीं रखता। पर अगर ‘ब’ कमा कर 4000-5000 रुपया महीना बचाने लगा तो उसका पुण्य मेरे बहुत काम आयेगा।

‘स’ मेरे पास आया था। बोला मूंदरा पोर्ट (अडानी का बन्दरगाह, गुजरात) जा रहा है। उसका भाई पहले ही वहां गया था - 8-10 महीना पहले। वह 7000 रुपया महीना कमा रहा है। इसे 3500 रुपया शुरू में मिलेगा पर जल्दी ही यह भी 7000 रुपया कमाने लग जायेगा। Car Driver

मैं तुलना करता हूं। अपने ड्राइवर को कहता हूं कि बम्बई/अहमदाबाद क्यों नहीं चला जाता। भरतलाल के अनुसार खर्चा-खुराकी काट कर एक टेक्सी ड्राइवर वहां 5000 रुपया महीना बचा सकता है। मैं ड्राइवर से पूछता हूं कि वह इलाहाबाद में क्यों बैठा है? वह चुप्पी लगा जाता है। शायद स्थितियाँ इतना कम्पेल नहीं कर रहीं। अन्यथा मैं तो इतने लोगों को देख चुका हूं - यहां इलाहाबाद में और वहां बम्बई गुजरात में - कि सलाह जरूर देता हूं -

भाई, बम्बई जाओ, गुजरात जाओ।

आपके अनुसार यह सलाह उचित है या नहीं? 


मित्रों, आप तो मेरा पर्सोना ही बदल दे रहे हैं!

November 15, 2007 by halchal

Bouquet किसी भी जन्म दिन पर नहीं हुआ कि मुझे इतने एकोलेड्स (accolades - प्रशस्तियाँ?) मिले हों। सुकुल ने तो इतना कहा कि जितना मेरे किसी जगह के फेयरवेल में भी नहीं कहा गया। सभी कुछ सुपरलेटिव! उसके बाद तो आप सब ने इतना चढ़ाया कि मुझे अपने पर्सोना (persona - व्यक्ति का सामाजिक पक्ष) में परिवर्तन प्रत्यक्ष दिखाई देने लगा। संजीत ने किसी पोस्ट पर कमेण्ट में ऐसा कहा भी था - पर मैने उस समय खास नोटिस नहीं किया। अब लगता है कि हिन्दी ब्लॉगरी ने मेरे व्यक्तित्व में स्पष्ट देखे जाने योग्य परिवर्तन किये हैं।

अनूप की ब्लॉग पोस्ट और टिप्पणी के बाद अपने आप के प्रति जो भी भाव था, वह मन में केन्द्रित न रह कर चारों ओर फैल गया।  पहले मैं जन्मदिन जैसे विषय को पश्चिमी सोच की स्नॉबरी मानता था। उसी जिद के चलते कई बार यह दिन आया और चला गया - बिना किसी से कोई जिक्र के। पर इस बार तो जैसे मन में था कि भाई कोई नोटिस तो करे! और नोटिस जो किया सो जबरदस्त था। इतना उछाला गया मैं कि दिन भर सम्पट ही नहीं बैठ रहा था - कितना खुशी जाहिर की जाये और कितना "बस ठीक है" वाले भाव से दबा दी जाये! Gyandutt

मेरी कल की पोस्ट पर और सुकुल की पोस्ट पर जो टिप्पणियाँ आयीं, उससे मन अभिभूत हो गया है। समझ में नहीं आ रहा कि अपने में सिमटा एक धुर-इण्ट्रोवर्ट व्यक्ति कैसे इतने लोगों का स्नेह पा सकता है? शीशे में देखने पर कोई खास बात नजर नहीं आती।

टिप्पणियाँ ही नहीं, फोन भी आये - प्रियंकरजी, संजीत, बालकिशन और नीरज गोस्वामी जी के। सब स्नेह से सेचुरेटेड - संतृप्त। आलोक 9211 का ई-मेल और शाम को अनिताकुमार जी का ई-ग्रीटिंग कार्ड। देर से आयी मीनाक्षी जी की टिप्पणी नें तो फारसी में जन्म दिन मुबारक सुना दिया! 

यही नहीं कि यह ब्लॉगरी में ही हुआ हो। मेरे दफ्तर में मुझे बुके दिया गया। सामुहिक मिष्टान्न का कार्यक्रम रहा। ढ़ेरों लोग मुझसे मिलने आये। बहुत ही विशिष्ट दिन रहा आम जिन्दगी में भी।

मित्रों लगता है आप सब के संसर्ग ने मेरे पर्सोना में व्यापक परिवर्तन का सूत्रपात कर दिया है।

एक और खास बात यह रही कि कई ब्लॉगर मित्र जिनसे बौद्धिक/वैचारिक मतभेद कभी न लिपिड़ियाने की परम्परा निर्वाह करने की आदत के चलते आवृत नहीं रहे - वे भी थे। अभय और अविनाश के ब्लॉग पर मैं टिप्पणी करने से बचता रहता हूं - दूसरे ध्रुव की सोच रखने के कारण। वे भी जन्म दिन की बधाई देने वालों में थे। यह भी बहुत अच्छा लगा। उनके बारे में भी बेहतर समझ बनेगी समय के साथ। 

मेरी पत्नी प्रसन्न हैं - बार-बार कह रही हैं कि तुम्हारा जन्मदिन कभी ऐसा तो नहीं रहा। सभी टिप्पणियाँ ध्यान से पढ़ कर प्रसन्न हो रही हैं। कह रही हैं कि यह परिवर्तन इन्ही सब (यानी आप सब) के कारण हुआ है।

सही में मित्रों आप सब तो मेरा पर्सोना ही बदले दे रहे हैं! अ चेंज फॉर द बैटर! बहुत बहुत धन्यवाद। और फुरसतिया की पोस्ट के कल के गीत के शब्द उधृत करूं -

पंक्तियां कुछ लिखी पत्र के रूप में,
क्या पता क्या कहा, उसके प्रारूप में,
चाहता तो ये था सिर्फ़ इतना लिखूं
मैं तुम्हें बांच लूं, तुम मुझे बांचना।

यह परस्पर बांचन चलता रहे मित्रों!


इस पर्सोना में परिवर्तन की सोच कर मुझे कृतमाला (अलकनन्दा) में नहाते वैवस्वत मनु की याद आ रही है। उनके हथेली में जीरे के आकार की छोटी सी मछली आ गयी थी, जिसे वे साथ आश्रम में लेते आये थे। वह मछली उन्होने पानी भरे छोटे मिट्टी के बर्तन में रख दी थी। पर वह बढ़ने लगी। उसे मिट्टी के पात्र से नांद, नांद से तालाब और अंतत: वे उसे नदी में ले गये। जब प्रलय आयी तो यही जीरे के आकार की परिवर्तित मछली ही थी जो उन्हे और सप्तर्षियों को बचाने उनकी नाव को विशाल पर्वत तक ले कर गयी। उसी से नव युग चला। जीरे जैसी छोटी मछली युग परिवर्तन का सूत्रपात कर सकती है!

सम्भावनायें अनंत हैं। मेरा ट्रांसफार्मेशन तो बहुत छोटे स्केल की चीज है।