Archive for February, 2007
शेयर मार्केट धड़ाम
February 28, 2007और फरवरी भी समाप्त
February 28, 2007इस महीने बहुत से ब्लॉग देखे. कुछ प्रयोग स्वयं भी किये. हिन्दी में यूनीकोड से IME द्वारा लेखन प्रारम्भ किया. हिन्दी का प्रयोग इससे बढ़ेगा. शायद जो कुछ अंगरेजी में सोच कर लिखा जा रहा था, वह फिर से हिन्दी में सोचना प्रारम्भ हो सकेगा.
जरूरी वही है. लिखने से ज्यादा जरूरी है भाषा सोच का माध्यम बने. भले ही F11 कुन्जी के माध्यम से सोच द्विभाषी हो, पर उसमें हिन्दी का अंश बढे तो. (फोटो में २८ फरवरी को सवेरे शिवकुटी मंदिर के पास गंगा नदी का सवेरा.)
‘अहो रूपम – अहो ध्वनि’, चमगादड और हिन्दी के चिट्ठे
February 25, 2007ये चमगादड़ बुद्धिमान टाइप के हैं. आपस में ‘अहो रूपम – अहो ध्वनि’ के आलाप के साथ अपनी, जो भी कमजोरियां हों, उनपर से ध्यान हटा रहे हैं. परस्पर प्रशंसा के साथ एक दूसरे की साइट पर क्लिक करने का खेल भी खेल रहे हैं. अपनी साइट कैसे चमकाई जाये कि वह ज्यादा क्लिक हो सके, उसके लिये एक दूसरे का माल चुरा कर अपने चिट्ठे पर चस्पां करने का रोग भी कुछ में है.
इंटरनेट पर दुकान जमाने में खर्चा नहीं लगता. ब्लॉग की फेसीलीटी ने सबको अवसर दे दिये हैं. बीएसएनल की मदद से ब्राडबेण्ड भी सस्ता हो गया है. सो हिन्दी के चिट्ठाकार चमगादडों की प्रजाति बागबाग हो कर फल फूल रही है. कल तक जो अखबार-पत्रिकाओं में छपास के लिये परेशान रहते थे, वे आज इंटरनेट पर फोकट में छप ले रहे हैं. अब छपास के स्थान पर रोग ‘पढ़ास’ का हो गया है. कितने लोग ब्लॉग पढ रहे हैं, यह नापने के लिये चिट्ठाकारों ने अपने ब्लॉग पर काउंटर भी चिपका रखे हैं.
ज्यादातर इस प्रजाति में फुटकर लेखन वाले ही हैं. ज्ञान-विज्ञान के एक हिन्दी ब्लॉग पर लेटेस्ट एंट्री 2005 की है. अर्थशास्त्र पर कोई गम्भीर चिट्ठा नहीं है हिन्दी में. हिन्दी जानने वाले के पास अगर अर्थशास्त्र की समझ है तो वह स्टाक मार्केट में पैसा बनायेगा या हिन्दी के यूनीकोड से जूझेगा? विषेशज्ञों के ब्लॉग हिन्दी में आने में शायद समय लगेगा. अभी तो ‘जनसत्ता’ के पतन के बाद ‘अजदक’ छाप अच्छे लेखन से वंचित लोगों को सहूलियत मिल गई है हिन्दी के चिट्ठों से. मजा आता है उसे पढने में.
गेदुरा (चमगादड) के मेहमान आये तो ज्यादा से ज्यादा वे भी एक डाल पकड कर लटक जायेंगे. आप भी एक ब्लॉग बनाइये और घुस जाइये गेदुरा की प्रजाति में. अपन तो गेस्ट आर्टिस्ट है. यदा कदा चिपकाते रहेंगे अपना चिट्ठा…
दीनदयाल बिरद संभारी
February 23, 2007ऐसे में मंत्र काम कर सकते हैं.
मंत्र जाप का अलग विज्ञान है. मैं विज्ञान शब्द का प्रयोग एक देसी बात को वजन देने के लिये नहीं कर रहा हूं. मंत्र आटो-सजेशन का काम करते हैं. जाप किसी बात या आइडिया को अंतस्थ करने में सहायक है.
अर्जुन विषादयोग का समाधान ‘मामेकं शरणमं व्रज:’ में है. अर्जुन के सामने कृष्ण उपस्थित थे. कृष्ण उसके आटो-सजेशन/रिपीटीशन को प्रोपेल कर रहे थे. हमारे पास वह सुविधा नहीं है. हमारे पास मंत्र जाप की सुविधा है. और मंत्र कोई संस्कृत का टंग-ट्विस्टर हो, यह कतई जरूरी नहीं. तुलसी बाबा का निम्न पद बहुत अच्छा काम कर सकता है:
मेरी टिप्पणी की नीति
February 22, 2007कृपया अप्रिय स्थिति न आने दें.
सधन्यवाद,
ज्ञानदत्त पाण्डेय
Indian Railway innovates to generate coaches for new services
February 4, 2007
This year the Indian Railway Time Table Committee (IRTTC) meeting was held at Secunderabad on 29-31 January.
Indian Railways has decided that trains hereafter need to get examined for a maximum distance of travel up to 3500kms as against the present upper limit of 2500kms. Besides the coaches can be in service for 18 months between two periodic overhauls. The second step at one stroke releases 11% more availability of coaching stock. The first step is a tool to fire the imagination of the coaching service planners and time table controllers to come up with new solutions. That may release coaches; give longer distance and better trains.
Old, sluggish systems also change for the better so fast in one stroke!
(Photo: IRTTC Meeting in progress)

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