Archive for April, 2007

क्रोध पर नियंत्रण कैसे करें?

April 30, 2007

मेरे घर और दफ्तर दोनो जगहों पर विस्फोटक क्रोध की स्थितियां बनने में देर नहीं लगतीं। दुर्वासा से मेरा गोत्र प्रारम्भ तो नहीं हुआ, पर दुर्वासा की असीम कृपा अवश्य है मुझ पर. मैं सच कहता हूं, भगवान किसी पर भी दुर्वासीय कृपा कभी न करें.

क्रोध पर नियंत्रण व्यक्ति के विकास का महत्वपूर्ण चरण होना चाहिये. यह कहना सरल है; करना दुरुह. मैं क्रोध की समस्या से सतत जूझता रहता हूं. अभी कुछ दिन पहले क्रोध की एक विस्फोटक स्थिति ने मुझे दो दिन तक किंकर्तव्यविमूढ़ कर दिया था. तब मुझको स्वामी बुधानन्द के वेदांत केसरी में छ्पे लेख स्मरण हो आये जो कभी मैने पढ़े थे. जो लेखन ज्यादा अपील करता है, उसे मैं पावरप्वाइण्ट पर समेटने का यत्न करता हूं। इससे उसके मूल बिन्दु याद रखने में सहूलियत होती है. ये लेख भी मेरे पास उस रूप में थे.

मैने उनका पुनरावलोकन किया. उनका प्रारम्भ अत्यंत उच्च आदर्श से होता है यह बताने के लिये कि क्रोधहीनता सम्भव है. पर बाद में जो टिप्स हैं वे हम जैसे मॉर्टल्स के लिये भी बड़े काम के हैं.

कुछ टिप्स आपके समक्ष रखता हूं:

  • राग और द्वेष क्रोध के मूल हैं.
  • जब तक हममें सत्व उन्मीलित (सब्लाइम) दशा में है, हम क्रोध पर विजय नहीं पा सकते.
  • अगर आप क्रोध पर विजय पाना चाहते हैं तो दूसरों में क्रोध न उपजायें. अगर कोई अपने पड़ोसी के घर में आग लगाता है तो वह अपने घर को जलने से नहीं बचा सकता.
  • जो लोग कट्टर विचार रखते हों, उनसे विवादास्पद विषयों पर चर्चा से बचें.
  • अपने में जीवंत हास्य को बनाये रखें और जीवन के विनोद पक्ष को हमेशा देखने का प्रयास करें.
  • याद रखें; जैसे आग के लिये पेट्रोल है, वैसे क्रोध के लिये क्रोध है. जैसे आग के लिये पानी है, वैसे क्रोध के लिये विनम्रता है.
  • बुद्ध कहते हैं: अगर तुम अपना दर्प अलग नहीं कर सकते तो तुम अपना क्रोध नहीं छोड़ सकते.
  • धैर्य से क्रोध को सहन करें. विनम्रता से क्रोध पर विजय प्राप्त करें.
  • क्रोध का सीमित और यदा-कदा प्रयोग का यत्न छोड़ दें.
  • जैसे कि सीमित कौमार्य का कोई अर्थ नहीं है, वैसे ही तर्कसंगत क्रोध का कोई अस्तित्व नहीं है.
  • क्रोध में कोई कदम उठाने में देरी करें. चेहरे पर क्रोध छलकाने से बचें. क्रोध छ्लक आया हो तो कटु शब्द बोलने से बचें. कटु बोल गये हों तो हाथ उठाने से बचें. पर अगर आप हाथ उठा चुके हों तो बिना समय गंवाये आंसू पोंछें और पूरी ईमानदारी और विनम्रता से क्षमा याचना करें.
  • क्रोध न रोक पाने के लिये अपने आप पर बहुत कड़ाई से पेश न आयें. अपने आप को पूरी निष्ठा और सौम्यता से संभालें.
  • अहंकार, अपने को सही मानने की वृत्ति, और स्वार्थ को निकाल बाहर फैंकें.
  • अपने में व अपने आसपास सतर्कता का भाव रखें. बुराई को अपने अन्दर से बाहर या बाहर से अन्दर न जाने दें.

उक्त विचार स्वामी बुधानन्द के धारावाहिक लेख से रेण्डम चयन किये गये हैं. सूत्रबद्ध पठन के लिये निम्न पीपीएस फाइल के आइकॉन पर क्लिक कर डाउनलोड करें, जिसे मैंने हिंदी में रूपांतरित कर दिया है। चूंकि उसमें बिन्दु दिए गए हैं, आपको धाराप्रवाह पढ़ने में दिक्कत हो सकती है.

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ऊपर जिस छोटी पुस्तक का चित्र है, वह स्वामी बुधानंद की अंग्रेजी में लिखी “How to Build Character” के हिंदी अनुवाद का हैयह अद्वैत आश्रम, कोलकाता ने छापी हैमूल्य रुपये मात्रक्रोध पर लेख इस पुस्तक में नहीं हैकिसी को छोटी सी गिफ्ट देने के लिए यह बहुत अच्छी पुस्तक है

बाबूभाई कटारा की तरफदारी (?) में एक पोस्ट

April 30, 2007

मुझे भाजपा और कटारा पर तरस आ रहा है. जब मैं रतलाम में था तो झाबुआ-पंचमहल-दाहोद कांग्रेस के गढ़ हुआ करते थे. मैं आदिवासियों से पूछ्ता था कि देश का प्रधानमंत्री कौन है? तब या तो वे सवाल समझ नहीं पाते थे, या वेस्ता पटेल, कंतिलाल भूरिया अथवा सोमाजी डामोर जैसे स्थानीय कांग्रेसी का नाम लेते थे. उन गरीबों के लिये दुनियां में सबसे बड़े वही थे.

फिर आर.एस.एस.वालों ने वनवासी विकास संघ जैसे प्लेटफार्म से आदिवासियों में पैठ बनाई. मिशनरियों का वर्चस्व कुछ सिमटा. उस क्षेत्र से भाजपा जीतने लगी चाहे मध्यप्रदेश हो या गुजरात.

और अब कटारा ने लोढ़ दिया है! बेचारे आर.एस.एस. के कमिटेड वर्कर मुंह पिटा रहे होंगे. कटारा परमजीत कौर को ले जा रहे थे; सो तो ठीक; शिलाजीत(? – देसी वियाग्रा) काहे को ले जा रहे थे जब पत्नी साथ नहीं जा रही थी? पैसे के लिये भ्रष्ट आचरण तो खास बात नहीं है वह तो चलता है! पकड़े गये, वही गड़बड़ हो गया. पर खांटी दैहिक वासना का भ्रष्टाचार यह अति हो गयी.

मुझमें यह वक्र सोच क्यों है, यह मैं नहीं जानता. जनता कबूतरबाजी-कबूतरबाजी की रट लगाये है और मुझे खोट देसी वियाग्रा में नजर आ रहा है.

एक बाबू रिश्वत ले कर मकान बना लेता है, बच्चों को डाक्टरी/इंजीनियरी पढ़ा देता है. लड़की की ठीक से शादी कर देता है, सुबह शाम मन्दिर हो आता है, सुन्दर काण्ड का पाठ और भागवत श्रवण कर लेता है. यह मानक व्यवहार में फिट हो जाता है.

पर अगर वह पैसा पीटता है, दारू-मुर्गा उड़ाता है, रेड़ लाइट एरिया के चक्कर लगाता है, इधर-उधर मुंह मारता है; तब गड़बड़ है. कटारा देसी वियाग्रा के कारण दूसरे ब्रैकेट में लग रहे हैं. आगे क्या निकलेगा, भगवान जाने.

कैश और क्वैरी या कबूतरबाजी छोटा गुनाह है. उसपर तो सांसद निकाल बाहर किये गये. बड़ा गुनाह है माफियागिरी, औरत को मार कर जला देना, आई.एस.आई. से सांठ-गांठ, मधुमिता शुक्ला जैसे मर्डर, पोलिटिकल दबंगई के बल पर देह/असलाह/नशा आदि के व्यापार चलाना. ऐसे गुनाह करने वाले ज्यादातर छुट्टा घूम रहे हैं. उनकी नेतागिरी बरकरार है या चमक रही है.

ब्लॉगर भाई तलवारें तान सकते हैं. कह सकते हैं कि सरकारी नौकर है, रिश्वत को जस्टीफाई (?) कर रहा है. जरूर चक्कर है. पर ब्लॉगरी का मायने ही यह है कि (मर्यादा में रहते हुये) जो जंचे, लिखा जाये.

सड़क पर होती शादियां

April 29, 2007

हिन्दुस्तान में सड़क केवल सड़क नहीं है. जन्म से लेकर परलोक गमन के सभी संस्कार सड़क पर होते हैं. जीवन भी इन्हीं पर पलता है. सचिन तेन्दुलकर से लेकर मुन्ना बजरंगी तक इन्ही सड़कों पर बनते हैं.

लोग ज्यादा हो गये हैं तो स्कूल, मैदान, मैरिज हॉल, धर्मशालायें कम पड़ने लगी हैं. लिहाजा शादियां इन्ही सड़कों पर होती हैं.

समाज के रहन-सहन के मैन्युअल में यह कोडीफाइड है. आपके घर में शादी है तो सड़क पर टेंण्ट गाड़ लो. किसी नगर पालिका, मुहल्ला समिति, पास पड़ोस से पूछ्ने की जरूरत नहीं. और पूछना क्यूं? जब पड़ोस के लाला/सुकुल/गोयल/पासवान जी के पप्पू या गुड्डी की शादी में किसी ने सड़क बन्द करते समय आप को नहीं ग़ांठा तो आपको क्या जरूरत है?

(यह सड़क देख रहे हैं आप। पास में बफे डिनर का कचरा भी था जो मैं केप्चर नहीं कर पाया)

रात भर कान फोड़ू संगीत बजाना, ट्रेफिक की ऐसी तैसी कर देना, सवेरे बचे-खुचे भोजन और थर्मोकोल/प्लास्टिक के इस्तेमाल हुये प्लेट-गिलास-चम्मच सड़क पर बिखेर देना, जयमाल के लिये लगे तख्त-स्टेज-टेण्ट को अगले दिन दोपहर तक खरामा-खरामा समेटना…..यह सब हिन्दू/मुस्लिम पर्सनल लॉ में स्पेसीफाइड है. सवेरा होने पर बरात और टेण्ट हाउस के बन्दे सड़क पर सोते मिलते हैं और गाय-गोरू बचे-खुचे भोजन में मुंह मारते पाये जाते हैं. सवेरे की सैर के जायके में मिर्च घुल जाती है.

प्रवचन देने की तथागती मुद्रा अपनाना बेकार है. जन संख्या बढ़ती रहेगी. सड़क का चीर हरण होता रहेगा और भी फ्रीक्वेंट हो जायेगा.

सड़क आपकी, आपकी, आपकी.
सड़क हमारे बापकी.

प्लास्टिक पर निर्भरता कम करने के तरीके.

April 28, 2007

मैं यह क्लिक-इफेक्टिव पोस्ट नहीं लिख रहा। प्लास्टिक के कचरे के बारे में कम ही लोगों ने पढा। पर आप क्लिक के लिए नहीं लिखते हैं। जिस मुद्दे पर आप महसूस करते हैं, उसपर कलम चलानी चाहिये। कम से कम ब्लागिंग है ही इस काम के लिए.
मुझे लगता है की अपना कैरी बैग ले कर बाजार जाना बड़ा ही इफेक्टिव तरीका है प्लास्टिक पर अपनी निर्भरता कम करने का। इसके अलावा निम्न उपाय किये जा सकते हैं:

  1. प्लास्टिक सेशे का प्रयोग कम कर दें। जहाँ तक हो बड़ी क्वान्टिटी में ख़रीदें और कोशिश करें कि वह शीशे के जार में हो.
  2. जो खुला या बिना प्लास्टिक के कंटेनर के मिले, उसे लेने में रूचि दिखाएँ। मसलन अनाज खुला लें और अपने थैले में ही भरवा लें।
  3. घर में रखने के लिए शीशे के जार या स्टील के कंटेनर का प्रयोग करें।
  4. किराने की दुकान का प्रयोग करें अगर सुपर मार्केट/बिग बाजार आप के कैरीबैग को मान्यता नहीं देता। वालमार्ट या बिग बाजार शायद प्लास्टिक के उपयोग को बंद करने वाले अन्तिम लोग हों।
  5. प्लास्टिक का रिप्लेसमेंट तलाशें। कई चीजें कागज, शीशे या लकडी/मिटटी की मिल सकती हैं। प्लास्टिक के खडखडिया कप की बजाय कुल्हड़ को वरीयता दें।
  6. अगर प्लास्टिक का कैरीबैग लेना ही पड़े तो मोटा और मजबूत लें, पतली फट जाने वाली पन्नी नहीं।
  7. आपका प्लास्टिक कम करना आपके सामान्य व्यवहार का अंग हो, कोई मेनिया नहीं।

जरा अपने आस-पास के लैंडफिल का मुआयना करें – कितना बड़ा प्लास्टिक का कब्रिस्तान बनता जा रहा है!

प्लस्टिक का कचरा कब तक चलेगा?

April 27, 2007

इकनामिस्ट” में है कि सेनफ्रंसिसको में प्लास्टिक के शॉपिंग बैग पर पाबन्दी लग गयी है. किराना वालों ने इस का विरोध किया है. पर कानून बनाने वालों ने सुनी नहीं. पता नहीं कैसे कानून बनाने वाले हैं वहां. हमारे यहां तो जनता के बिना बोले बहुत कुछ सुन लेते हैं. खैर.

प्लास्टिक का कचरा वास्तव में जिन्दगी तबाह कर रहा है. एक महीना हार्लिक्स और डाबर का च्यवनप्राश सेहत बनाता है पर उनकी बोतल हमारे आगे की सौ पीढ़ियां झेलेंगी. रिसाइकल्ड प्लास्टिक न जाने कौन कौन से स्वास्थ्य नाशक तत्व लिये रहता है. आपमें लम्बा लेख पढ़ने की पेशेंस हो तो बेस्टलाइफ मैगजीन में यह लेख पढ़ें. प्लास्टिक अब भोजन कि चेन को भी प्रदूषित कर रहा है। गायें प्लास्टिक का कचरा खाते देखी जा सकती हैं। पक्षी, समुद्री जीव, मछलियाँ – ये सब प्लास्टिक की चपेट में हैं। वहा दिन दूर नहीं जब मानव शरीर में प्लास्टिक प्रवेश कर जायेगा – या कर ही चुका है। प्लास्टिक कि बोतल से दूध पीते नवजात के दिमाग, प्रतिरोधक क्षमता और प्रजनन अंगों पर प्रभाव पड़ रहा है। केंसर और डायबिटीज के मामले प्लास्टिक प्रदूषण से बढ़ रहे हैं. लेख बड़ी भयानक तस्वीर सामने रखता है।

ड़ेढ़ सौ साल से बने प्लास्टिक का एक छोटा सा हिस्सा ही नष्ट हुआ है. हर साल 60,000,000,000 टन प्लास्टिक बनता है. उसमें से ज्यादातर तो केवल एक बार ही इस्तेमाल किया जाता है. अपने मजे के लिये हम धरती और समन्दर दोनों को कब्रिस्तान बना दे रहे हैं.

एक बड़ी खोज वह होगी जो प्लास्टिक के बायोडिग्रेडेबल बनाने के बारे में होगी. खोजने या उसको कमर्शियल रूप देने वाला बिल गेट्स जैसा धनी बन जायेगा और आगे आने वाली पीढ़ियां उसका गुण गान करेंगी.

तब तक हम क्या करें? घर में तो हमने नियम बना लिया है बाजार जायेंगे तो अपना थैला लेकर जायेंगे. दुकानदार को विनम्रता से मना कर देते हैं कि भैया, आपका कैरी बैग नहीं चाहिये। पर यह तो मात्र आत्मसंतोष के लिए है। समस्या का समाधान तो नहीं है।

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हमारे एक वरिष्ठ अधिकारी हैं, उनका कहना है कि जब वे नार्थ फ्रंटियर रेलवे में असम में पोस्टेड थे तो उनके एक प्लास्टिक के थैले को (जिसमें किताबें थीं) दीमक पूरी तरह चट कर गयीं थींथैले समेतप्लास्टिक को बायो डीग्रेडेबल करने के लिए उस दीमक की खोज की जा सकती है

बहुजन समाज पार्टी ने शिव जी का आशिर्वाद लिया

April 26, 2007

गौतम बुद्ध, अम्बेडकर, महामाया रोड/नगर/पार्क/क्रासिंग आदि का जमाना शायद पुराना हो गया है. वोट बैंक के गणित का तकाजा ऐसा हुआ कि बसपा ने शंकर जी का आशिर्वाद सेंक्शन करा लिया.

सवेरे घूमने जाती मेरी मां ने खबर दी कि शिव कुटी के एतिहासिक मन्दिर पर बहुजन समाज पार्टी का झण्डा फहरा रहा है. चित्र देखें:

(शिव कुटी में कोटेश्वर महादेव मंदिर का कंगूरा – आयत में बसपा का ध्वज)

शिव कुटी का कोटेश्वर महादेव का मन्दिर उस स्थान पर है जहां वनवास जाते समय भगवान राम ने गंगा पार कर शिवलिंग की स्थापना कर पूजा की थी. तुलसी ने उस विषय में लिखा है:

मुदित नहाइ किन्हि सिव सेवा। पूजि जथाबिधि तीरथ देवा।

राम का शिवलिंग का कोटेश्वर महादेव के रूप में पूजन उनके एक महत अभियान का संकल्प था.

अब जब कोटेश्वर महादेव के पुरी-पुजारी गण; मुफ्त में बंटे बाटी-चोखा और अन्य माल से तृप्त; बसपा का झण्डा शिव मन्दिर पर फहरा रहे हैं, तो समय बदला जानिये मित्रों! बहन जी ने सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की वकालत कर एक मुद्दा तो झटक ही लिया है. आगे, जैसी सरकार बनाने में जरूरत पड़े, राम मन्दिर बनाने का मुद्दा भी वे भजपा से हड़प लें तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिये. क्या पता टेण्ट में बैठे राम लला का परमानेण्ट निवास बनाने की निमित्त बसपा बन जाये।

कौन कहता है गिरगिट ही रंग बदल सकता है
सियासी दलों को तबियत से निहारो यारों.

शिक्षा के क्षेत्र में देश बैक फुट पर है.

April 25, 2007

सन 2005 में विश्वबैंक ने पड़ताल की थी. उसमें पता चला था कि हमारे देश में 25% प्रतिशत प्राइमरी स्कूल के अध्यापक तो काम पर जाते ही नहीं हैं. बाकी, जो जाते हैं उनमें से आधे कुछ पढ़ाते ही नहीं हैं. तनख्वाह ये पूरी उठाते हैं. यह हालत सरकारी स्कूलों की है. आप यहां पढ़ सकते हैं इस पड़ताल के बारे में. ऐसा नहीं है कि सन 2005 के बाद हालत सुधर गये हों.

मेरे काम में शिक्षकों से वास्ता नहीं पड़ता. पर समाज में मैं अनेक स्कूली अध्यापकों को जानता हूं, जिनके पास विचित्र-विचित्र तर्क हैं स्कूलों में न जाने, न पढ़ाने और पूरी तनख्वाह का हकदार होने के. उनके सामान्य ज्ञान के स्तर पर भी तरस आता है. अच्छा है कि कुछ नहीं पढ़ाते. अज्ञान बांटने की बजाय स्कूल न जाना शायद बेहतर है!

उच्च शिक्षा का भी कोई बहुत अच्छा हाल नहीं है. सामान्य विश्वविद्यालयों को छोड़ दें, तकनीकी शिक्षा के स्तर भी को भी विश्वस्तरीय नहीं कहा जा सकता. द न्यू योर्कर में छपा यह लेख आंखें खोलने वाला है. भारत में 300 से ज्यादा विश्वविद्यालय हैं पर उनमें से केवल दो ही हैं जो विश्व में पहले 100 में स्थान पा सकें. इंफोसिस वाले महसूस करते हैं कि भारत में स्किल्ड मैनपावर की बड़ी किल्लत है. पिछले साल तेरह लाख आवेदकों में से केवल 2% ही उन्हें उपयुक्त मिलें. अमेरिकी मानक लें तो भारत में हर साल 170,000 ईंजीनियर ही पढ़ कर निकलते हैं, न कि 400,000 जिनका दावा किया जाता है. कुकुरमुत्ते की तरह विश्वविद्यालय और तकनीकी संस्थान खुल रहे हैं. उनकी गुणवत्ता का कोई ठिकाना नहीं है. आवश्यकता शायद 100-150 नये आईआईटी/आईआईएम/एआईआईएमएस और खोलने की है और खुल रहे हैं संत कूड़ादास मेमोरियल ईंजीनियरिंग/मेडीकल कॉलेज! उनमें तकनीकी अध्ययन की बुनियादी सुविधायें भी नहीं हैं!

छिद्रांवेषण या दोषदर्शन के पचड़े में फंसना उचित नहीं होगा. पर समाज को बांट कर शिक्षा के क्षेत्र में राजनीति चलाने की बजाय प्राईमरी-सेकेण्डरी-उच्च सभी स्तरों पर शिक्षा में गुणवत्ता और संख्या दोनो मानकों पर बेहतर काम की जरूरत है. वर्ना अर्थ व्यवस्था की आठ-दस प्रतिशत की वृद्धि दर जारी रख पाना कठिन होगा. एक तरफ बेरोजगारों की कतार लम्बी होती चली जायेगी और दूसरी तरफ कम्पनियों को काम लायक लोग नहीं मिलेंगे.

रेलवे स्टेशन पर पलते बच्चे – क्या सिफारिश है सर्वेक्षण की?

April 24, 2007

पिछली पोस्ट में वर्णित सर्वेक्षण की जो प्रति मंत्रालय ने प्रेषित की है, उसमें मुद्दे और अनुसंशायें नाम से अध्याय है. इसमें जो सिफारिशें हैं, वे या तो भगीरथ प्रयत्न की मांग करती हैं, या फिर मात्र यूटोपियन हैं. ज़रा देखें:

  1. बच्चों के परिवारों को आय अर्जन की गतिविधियों में लगाने को सहायता दी जानी चाहिये, जिससे बच्चे काम करने की बजाय स्कूल जाने लगें.
  2. एन.जी.ओ. प्रोत्साहित किये जायें कि वे इन बच्चों में तकनीकी हुनर और कामकाजी विकास को टार्गेट करें.
  3. सरकार नशीले पदार्थों के प्रसार और प्रयोग के खिलाफ मुहीम चलाये.
  4. सरकार रेलवे स्टेशनों के आसपास इन बच्चों के लिये डिस्पेंसरी बनाये या इन बच्चों की स्वास्थ्य समस्याओं के लिये मेडीकल स्टाफ डिप्यूट करे.
  5. स्वयं सेवी संस्थाओं के माध्यम से उनके कार्य स्थलों पर ही कम से कम बेसिक शिक्षा की व्यवस्था हो.
  6. पुलीस व कुली उनसे प्यार से पेश आयें और समझायें कि वे जो कर रहे हैं वह सही नहीं है.
  7. बच्चे गन्दा इसलिये भी रहते हैं कि गन्दा रहने से सहानुभूति और भीख मिलती है. जनता में यह जागृति लायी जाये कि भीख देना एक सामाजिक बुराई है.
  8. संविधान की धारा 45 का पालन हो, जो 14 वर्ष की उम्र तक के लिये निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की बात कहती है.
  9. इन बच्चों के लिये आवासीय रैन बसेरों की व्यवस्था हो, जैसा फतेहपुरी, दिल्ली में है.
  10. जन जागृति अभियान छेड़ा जाये कि लोग प्लास्टिक का कचरा प्लेटफार्म और ट्रेनों में न बिखेरें.
  11. ये बच्चे पर्याप्त कमाते हैं पर इनका शोषण भैया या वेण्डर करते हैं. इनमें बचत की प्रवृत्ति व इस शोषण से बचाने के प्रयास किये जायें.
  12. ये बच्चे बिना टिकट ट्रेनों में चलते और सामान बेचते हैं. उसपर प्रभावी रोक लगाई जाये.
  13. कुछ बच्चे चोरी, छिनैती और नशीली वस्तुओं को बेचने के अपराध में लिप्त हैं. दण्ड की बजाय उन्हें समझा कर इन दुर्गुणों से दूर रहने को कहा जाये.
  14. ये बच्चे अनधिकृत रूप से सामान बेचते हैं. समय समय पर चेकिंग कर इस पर रोक लगाई जाये.
  15. इन बच्चों का शोषण करने वालों पर कानूनी कार्रवाई हो.
  16. बच्चों में प्रतिभायें हैं. उन्हे चिन्हित करने और उभारने के यत्न किये जायें.
  17. जंकशन स्टेशनो पर वीडियो प्रोग्रामों के माध्यम से इन बच्चों का मनोरंजन करते हुये इनमें जागृति लाई जाये.

यह सिफारिशें पढ़कर मैने एक जोर से सांस खींची. लगता है कि यह भी एक वर्जिन फील्ड है जिसमें अगर कोई कुछ करे तो बांगलादेश वाले यूनुस साहब की तरह नोबुल पुरस्कार का हकदार हो सकता है.

असली खुशी की दस कुंजियां

April 23, 2007

मैं रेलवे स्टेशन पर जीने वाले बच्चों पर किये गये एक सर्वेक्षण के आंकड़ों से माथापच्ची कर रहा था. उस पर लेखन रेलगाड़ी वाले ब्लॉग पर देखें.

जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा चौंकाया; वह थी कि 68% बच्चे अपनी स्थिति से संतुष्ट थे. बुनियादी जरूरतों के अभाव, रोगों की बहुतायत, पुलीस का त्रास, भविष्य की अनिश्चितता आदि के बावजूद वे अगर संतुष्ट हो सकते हैं, तो प्रसन्नता का विषय उतना सरल नहीं, जितना हम लोग मान कर चलते हैं.

अचानक मुझे याद आया कि मैने प्रसन्नता के विषय में रीडर्स डायजेस्ट में एक लेख पढ़ा था जिसमें कलकत्ता के अभाव ग्रस्त वर्गों में प्रसन्नता का इंडेक्स ऊंचा पाया गया था. मैने उस लेख का पावरप्वाइंट भी तैयार किया था. कम्प्यूटर में वह मैने ढूंढा और रविवार का सदुपयोग उसका हिन्दीकरण करने में किया.

फिलहाल आप, असली खुशी की दस कुंजियां की फाइल का अवलोकन करें. इसके अध्ययन से कई मिथक दूर होते हैं. कहीं-कहीं यह लगता है कि इसमें क्या नयी बात है? पर पहले पहल जो बात सरल सी लगती है, वह मनन करने पर गूढ़ अर्थ वाली हो जाती है. धन किस सीमा तक प्रसन्नता दे सकता है; चाहत और बुद्धि का कितना रोल है; सुन्दरता और सामाजिकता क्यों महत्वपूर्ण हैं; विवाह, धर्म और परोपकार किस प्रकार प्रभावित करते हैं और बुढ़ापा कैसे अभिशाप नहीं है यह आप इस डाउन लोड में पायेंगे।

(चिन्ह पर क्लिक कर डाउन लोड करे)

ट्रेनों पर पलता बचपन – अभावों के गर्त में भी खुश है.

April 22, 2007

सेंटर फार रिसर्च एक्शन एंड ट्रेनिंग , नई दिल्ली ने एक अध्यन किया है ट्रेनों पर पलते बच्चों पर। यह स्पष्ट नहीं है कि अध्यन कहाँ किया गया था, पर लगता है कि दिल्ली के आसपास हुआ होगा। कुल २३६ बच्चों का सैम्पल सर्वे था यह। ज़्यादातर बच्चे उत्तर प्रदेश (५३%) व बिहार (२५%) से थे। ज़्यादातर (९५%) १० साल से अधिक उम्र के थे। अधिकांश अनुसूचित जाति/जनजाति, पिछडे या मुसलमान थे। बहुत से अनपढ़ थे। पढे क्यों नहीं: ४३% पारिवारिक गरीबी के चलते, २६% माँ-बाप ने भर्ती नहीं कराया और ९% लापरवाही के कारण।
इन बच्चों में त्वचा के रोग बहुतायत से पाये गए। ज़्यादातर बच्चे चिन्दियाँ व प्लास्टिक की बोतलें बीनने वाले थे। स्वच्छता का आभाव भी त्वचा और अन्य रोगों का कारण था। भोजन व पीने के पानी की गंदगी के कारण पीलिया, गेस्टोएन्ट्राइटिस, ख़ून की कमी और लीवर का ठीक से काम न करना भी आम रोग थे।
इकसठ प्रतिशत बच्चे किसी न किसी प्रकार से तम्बाकू का सेवन करते थे। कुल १५% बच्चों में कोई न कोई हुनर था। इन्हें बैग बनाना, पापड़ बनाना, जूता पालिश करना, पंखा व स्कूटर ठीक करना आता था।
ज़्यादातर बच्चे (५८.९%) रेलवे स्टेशन पर रहते थे। इक्यावन फीसदी बच्चे तो ३-५ साल से वहीं रह रहे थे। वे इसके लिए पुलिसवाले, ठेकेदार और असामाजिक तत्वों को हफ्ता देते थे। रिहायश के लिए इन्हें १०० से ४०० रुपये हर महीना खर्च करना पडता था।
दो तिहाई बच्चे हफ्ते में एक या दो बार ही नहाते थे। केवल ७% ने ही बताया की वे ५-६ बार नहाते है एक हफ्ते में। पाखाने के लिए ६१% ने बताया की वे रेल डिब्बों का इस्तेमाल करते हैं। कुल ४४% ने माना की वे पाखाने के बाद हाथ नहीं धोते
स्टेशन पर वे क्यों काम करते हैं? इसके जवाब में ५९% ने कहा कि तुरत और कैश में पैसा मिलाने की सहूलियत है स्टेशन पर। इसके अलावा २९% ने कहा की दोस्त की सलाह के कारण वे स्टेशन पर काम करते हैं।
काम क्या करते है? झाड़ू लगना (१६%); चना, पापड़, मून्गफली, ताले, आइसक्रीम, चाय, गुटका आदि बेंचना (२०%); जूता पालिश करना, चिन्दियाँ बीनना (४०%) और गाना गा कर या वैसे ही भीख मांगना उनके मुख्य उद्यम हैं।
उनके काम के घंटे तय नहीं हैं। ज़्यादातर (४४%) ने बताया की वे ७-८ घंटे काम करते हैं। चाय बेचने, चना/पापड़/मूंग फली बेचने व जूता पालिश करने में वे १५००-२००० रुपये महीना कमाते हैं। आइसक्रीम वालों की आमदनी ज्यादा है।
प्रसन्नता के विषय में जो निष्कर्ष है वहा चौंकाने वाला हो सकता है६८% कहते हैं कि वे अपने जीवन से सन्तुष्ट हैं। जो ३२% असंतुष्ट हैं उनके कारण हैं: पुलिस की पकड़-धकड़ (२९%), पुलिस की मार-पीट (११%), बहुधा भूखे रह जाना (३२%), जरूरतों से कम कमायी (१५%) तथा काम में इज्जत का अभाव (१३%)।
कुल ४३% बच्चे कहते हैं की उन्हें कोई समस्या नहीं है उनकी दशा को देखते हुये यह बड़ा प्रतिशत है। जिन ५७% को समस्याएं हैं उनमें से ज़्यादातर को पुलिस के त्रास और लाक अप की समस्या है (७०%)। दस फीसदी (समस्या वालों में से) को असामाजिक तत्वों की छीना-झपटी और मार-पीट का कष्ट है। यानी पुलिस असामाजिक तत्त्वों से ज्यादा बर्बर है

इस अध्यन की प्रति श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने रेल मंत्रालय को भेजी होगी। जिसे रेल मंत्रालय ने;रेल मंत्रालय चाहता है की रेल परिसर में चाइल्ड लेबर के मामले हों और चाइल्ड लेबर (प्रोहिबिशन तथा रेग्युलेशन) एक्ट, १९८६ का कड़ा पालन हो“; की चिप्पी लगा कर प्रेषित कर दिया है। पर यह विशाल काम कैसे होगा? भगवान जाने।

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Incidentally, a few years back I had made a powerpoint presentation on 10 Keys to Happiness based on an article in Readers Digest. You may download the presentation here.