Archive for July, 2007

गंगा का कछार, नीलगाय और जट्रोफा

July 8, 2007

हरिकेश प्रसाद सिन्ह मेरे साथ जुड़े इंस्पेक्टर हैं. जो काम मुझे नहीं आता वह मैं एच पी सिन्ह से कराता हूं. बहुत सरल जीव हैं. पत्नी नहीं हैं. अभी कुछ समय पहले आजी गुजरी हैं. घर की समस्याओं से भी परेशान रहते हैं. पर अपनी समस्यायें मुझसे कहते भी नहीं. मैं अंतर्मुखी और वे मुझसे सौ गुणा अंतर्मुखी. राम मिलाये जोड़ी…

एक दिन मैने पूछ ही लिया – जमीन है, कौन देखता है?
बोले – यहां से करीब 20-25 किलोमीटर दूर गंगा के कछार में उनकी जमीन है. करीब 40 बीघा. कहने को तो बहुत है पर है किसी काम की नहीं. खेती होती नहीं. सरपत के जंगल बढ़ते जा रहे हैं.
पूरे चालीस बीघा बेकार है?
नहीं. लगभग 10 बीघा ठीक है पर उसमें भी खेती करना फायदेमन्द नहीं रहा.
क्यों?
मर खप के खेती करें पर जंगली जानवर – अधिकतर नीलगाय खा जाते हैं. नीलगाय को कोई मारता नहीं. पूरी फसल चौपट कर देते हैं.
नीलगाय तो हमेशा से रही होगी?
नहीं साहब, पहले आतंक बहुत कम था. पहले बाढ़ आती थी गंगा में. ये जंगली जानवर उसमें मर बिला जाते थे. अब तो दो दशक हो गये बाढ़ आये. इनके झुण्ड बहुत बढ़ गये हैं. पहले खेती करते थे. रखवाली करना आसान था. अब तो वही कर पा रहा है जो बाड़ लगा कर दिन-रात पहरेदारी कर रहा है. फिर भी थोड़ा चूका तो फसल गयी.

मुझे लगा कि बाढ़ तो विनाशक मानी जाती है, पर यहां बाढ़ का न होना विनाशक है. फिर भी प्रश्न करने की मेरी आदत के चलते मैं प्रश्न कर ही गया – वैसा कुछ क्यों नहीं बोते जो नीलगाय न खाती हो?
एच पी सिन्ह चुप रहे. उनके पास जवाब नहीं था.
मैने फिर पूछा – जट्रोफा क्यों नहीं लगाते? रेलवे तो लाइन के किनारे जट्रोफा लगा रही है. इसे बकरी भी नहीं चरती. अंतत: बायो डीजल तो विकल्प बनेगा ही.

हरिकेश की आंखों में समाधान की एक चमक कौन्धी. बोले – दुर्वासा आश्रम के पास एक सभा हुई थी. जट्रोफा की बात हुई थी. पर कुछ हुआ तो नहीं. लगा कि उन्हे इस बारे में कुछ खास मालुम नहीं है.

लेकिन मुझे समाधान दिख गया. सब कड़ियां जुड़ रही हैं. गंगा में पानी उत्तरोत्तर कम हो रहा है. कछार जंगल बन रहा है सरपत का. नील गाय बढ़ रहे हैं. जट्रोफा की खेती से जमीन का सदुपयोग होगा. खेती में काम मिलेगा. जट्रोफा के बीजों का ट्रांसस्ट्रेटीफिकेशन ट्रांसएस्टेरीफिकेशन के लिये छोटे-छोटे प्लाण्ट लगेंगे. उनमें भी रोजगार होगा. बायोडीजल के लाभ होंगे सो अलग. हरिकेश की पूरे 40 बीघा जमीन उन्हे समृद्ध बनायेगी. वह जमीन जहां आज उन्हे कुछ भी नजर नहीं आ रहा.

गंगा में पानी कम हो रहा है तो कोसना और हताशा क्यों? उपाय ढ़ूंढ़े. फिर मुझे लगा कि मैं ही तो सयाना नहीं हूं. लोग देख-सोच-कर रहे होंगे….भविष्य में व्यापक परिवर्तन होंगे. एच पी सिन्ह की जमीन काम आयेगी.

देखें, आगे क्या होता है.

आप जरा जट्रोफा पर जानकारी के लिये यह साइट देखें.


एक जंक पोस्ट – फीड एग्रीगेटर को क्या-क्या बताओगे?

July 7, 2007

पहले लोग खुले में डर्टी लिनेन धोते थे, अब भी धोते हैं. पहले शायद साबुन लगाते हों, अब डिटर्जेण्ट के रूप में फीड एग्रीगेटर का प्रयोग करते हैं. मेल बनाते हैं – हमें हटा दो. पर भेजने से पहले पोस्ट पब्लिश कर फीड एग्रीगेटर को देते हैं (उसी मेल का कण्टेण्ट प्रयोग करते हुये).

फलाने जी कहते हैं मुझे तुम्हारे मुहल्ले में नहीं रहना. टू-वे डॉयलॉग नहीं; बाकायदा पोस्ट लिख कर फीड एग्रीगेटर को थमाते हैं उस बारेमें. कुछ उस अन्दाज में जैसे पुराने जमाने में गंगापरसाद पूरे गांव में घूम-घूम कह रहे हों – कौलेसरा तोरे दुआरे पिसाब करन भी न जाब. यह अलग बात है कि कुछ दिन बाद गंगापरसाद और कौलेसर पांत में एक साथ बैठे तेरही की पूडी तोडते पाये जाते थे.

बन्धु, फीड एग्रीगेटर पूरी गांव की चौपाल का मजा दे रहा है बिल्कुल हाई-टेक अन्दाज में. जितने भी रागदरबारी छाप लेखन के जितने भी करेक्टर हैं, सारे मिलेंगे अपनी-अपनी पोस्ट की खरताल बजाते फीड एग्रीगेटर के पन्ने पर. जो जितना बढ़िया सनसनीखेज नौटंकी रिमिक्स कर लेता है खरताल की आवाज के साथ वह लोकप्रियता वाले पन्ने पर उतना ऊपर चलता चला जाता है!

भाव लेना हो तो एक ठो नया फीड एग्रीगेटर बना लो. एक नया फंक्शन ईजाद करो सक्रियता का. दस वैरियेबल का ताजा फंक्शन. उसे रखो गोपनीय. यानि दस वैरियेबल का वैरियेबल/कानफीडेंशियल फंक्शन. उसमें मदारी की तरह नचाते रहो ब्लॉगरों को.

सक्रियता का जंक फार्मूला
Factive = fconfidential(X1,—X10)
उक्त फार्मूला के सभी वेरियेबल गोपनीय हैं. फार्मूला भी गोपनीय है.

मैने पाया है कि जो जितना ज्यादा बुद्धिमान छाप ब्लॉगर है वो उतना ही नाच रहा है फीड एग्रीगेटर की मदारीगिरी से. वो उतना ही दिमाग लगा रहा है फीड एग्रीगेटर के वैरियेबल/कानफीडेंशियल फंक्शन के कोड को डीकोड करने में!

अरुण अरोड़ा कट लिये. बड़े गलत मौके पर कटे. जब पंगेबाजी का पीक आया तो पंगेबाज सटक लिया. शायद ठोस पंगेबाज नहीं थे वो. सेण्टीमेण्टालिटी की मिलावट थी. पर बन्धु, राजा गये राजा तैयार होता है. पंगेबाज का वैक्यूम भरने को बहुत दावेदार हैं.

ई-पण्डित* कहां हैं? कहते हैं बड़ा प्रेम-प्यार है चिठेरों में. हाईपावर की 4 सेल वाली जीप टार्च से भी नहीं दिख रहा इस समय.

बस, यह पोस्ट अगेंस्ट इनेट (नैसर्गिक) नेचर लिखी है और ज्यादा लम्बी करने पर विवादास्पद बनने की बहुत सम्भावना है. जै हिन्द!


* ई-पण्डित इसे इग्नोर कर सकते हैं आप. यह तो बस यूंही लिखा है!

कर्ज लेते हैं पर लौटाते समय कोसते हैं बाजारवाद को!

July 6, 2007

बाजार है वह भग्वद्गीता के स्थितप्रज्ञ दर्शन पर नहीं चलता है. वह उपभोक्ता केन्द्रित होता है और पूंजी तथा वस्तुओं के विनिमय को सुविधजनक बनाता है. बैंक बाजार की एक महत्वपूर्ण इकाई है. बैंक वाले रेलवे स्टेशन के हॉकर की तरह चाय-चाय की रट जैसा बोल लोन बाटें तो लोग अच्छा महसूस करते हैं. उससे उनके उपभोग की कल्पनाओं को मूर्त करने के साधन सुलभ हो जाते हैं. पर उगाही के लिये बैंक टेढ़ी उंगली का प्रयोग करें तो वही लोग “नाश हो पूंजीवाद का” नारा लगाते हैं!

भैया, बैंक वाले ने धर्मादे के लिये सदाव्रत थोड़े ही खोल रखा है.

लोग बेइंतहा खर्च करें. कर्जा लेकर घी पियें. चारवाक को आधुनिक युग में री-इनवेण्ट करें वह ठीक. पर उनसे कोई कर्जा वापस मांगे तो वे बन जायें निरीह/दीन/गरीब और वापस मांगने वाला सूदखोर महाजन. यह प्रपंचवाद मैने भारतीय समाज में बहुत देखा है.

मैं पुराना अनुभव बताता हूं. एक मण्डल रेल प्रबन्धक जी के पास बैंक वाले पंहुचे. करीब 300 कर्मचारियों की लिस्ट दी; जिन्होने पर्सनल लोन ले कर वापस न करने का मन बना रखा था और लम्बे समय से डिफॉल्टर थे. एक रेल वाले ने सर्टीफाई किया था कि वे रेल कर्मी हैं और उनकी नियमित आय है. उसी आधार पर उन्हें लोन मिला था. मण्डल रेल प्रबन्धक ने अपने विवेक से तय किया कि कर्मचारियों का यह व्यवहार अशोभनीय है और रेल की छवि को धूमिल करता है. उन लोगों को चार्ज-शीट देने का निर्णय लिया – उनको अशोभनीय व्यवहार के लिये क्यों न नौकरी से निकाल दिया जाये? इस निर्णय के लेते ही बहुतों ने आनन-फानन में लोन वापस कर दिये. बाकियों ने किश्त भरनी प्रारम्भ कर दी.

एक दूसरा उदाहरण : एक चपरासी बहुत कर्जे में डूबा था – पठानी ब्याज के कर्ज में. उधारी की रकम बढ़ती ही जा रही थी. हम दो अधिकारियों नें, जिन्हे परोपकार का कीड़ा यदा-कदा काटता है, विचार विमर्श कर पाया कि हम दोनो मिलकर उसे ब्याज मुक्त लोन अगर दें और उसका पठानी ब्याज वाला कर्ज एक बार उतर जाये तो शायद उसकी गाड़ी पटरी पर आ जाये. पूरी गणना के बाद हमने उससे कहा कि हम उससे वायदा चाहेंगे कि वह तनख्वाह मिलने पर हमारी किश्त – जो मूल ऋण (मुक्त ब्याज) की होगी, समय से वह चुका देगा. चपरासी ने बताया कि उसके घर का खर्च उसकी पत्नी चलाती है. अत: अंतिम रूप से तय करने को उसे सपत्नीक दफ्तर में बुलाया. हमारा सोचना था कि उसकी पत्नी कुशलता से घर का खर्च भी चलायेगी और हमारा सॉफ्ट-लोन भी चुकायेगी. पर जब उसकी पत्नी को देखा तो हमारे चेहरे पर से परोपकार की हिलोरें शांत हो गयीं. वह इतने साज शृंगार के साथ थी कि कोई अफसर की बीवी भी क्या होगी. हम समझ गये कि चपरासी की समस्या परिस्थितियों का मारा होने की नहीं – जैसा वह कहता था, वरन ऋण लेकर उपभोग करने की है. वह हमारे एक बार की सहायता से हल होने वाली नहीं है. परोपकार की हमारी कोशिश चारवाक के सिद्धांत के सलीब पर चढ़ गयी – अमल में आ ही न सकी.

मैं जानता हूं कि लोन देना भी भ्रष्टाचार का जनक है. यह भ्रष्टाचार पहले महाजन किया करता था (आज भी करता है). अब, कुछ मात्रा में, बैंक कर्मी भी करते हैं. ग्रामीण माइक्रोक्रेडिट देने के लिये तो भारत में बांगलादेश के मोहम्मद यूनुस जी की तर्ज पर ईमानदार पहल होनी चाहिये. पर वह विषयांतर है. मैं यहां केवल लोन लेने की वृत्ति और न चुकाने की नीयत के विषय में लिख रहा हूं. यह वृत्ति नव-मध्यवर्ग में तेजी से घर करता जा रही है. इसके लिये अपनी इच्छाओं पर लगाम लगाने की बजाय बाजार/पूंजीवाद को कोसना गैरजिम्मेदार आचरण है.

कर्ज न चुका पाने के कारण जो मौतें हो रही हैं, उन सबके मूल में दैवी आपदा या मानव की क्षमता के बाहर के गणक नहीं हैं. बहुधा अपने उपभोक्तापन के लिये कर्ज लिये जाते हैं. शादी-विवाह-तेरही आदि के लिये अपनी सामाजिक हैसियत से अधिक कर्ज लिये जाते हैं. येन-केन-प्रकरेण कर्ज लिये जाते हैं. आज के उपभोग के लिये भविष्य के स्वयम को बन्धक बना देते हैं लोग! कर्ज लेते समय कर्ज वापसी का कैश-फ्लो कितने लोग सोचते है? कर्ज लेते समय लोग अपनी अर्जन क्षमता का भी तर्कसंगत आकलन नहीं करते. फिर एक कर्ज को दूसरे कर्ज से पाटने का दुश्चक्र चलाते हैं. बाजार व्यक्ति को ललचाता जरूर है. पर बाजार में अपना विवेक तो व्यक्ति स्वयम बेचता है!

मैं अपने कर्मचारियों को समझाता हूं. मकान बनाने के लिये लोन लेते हो तो ठीक है. अगर कल विपत्ति आयी तो मकान बेंच कर भी लोन चुका सकते हो. पर मोटरसाइकल या कार के लिये लोन न लो. वह खरीदते ही उनकी कीमत कम हो जाती है. फिर डिप्रीशियेशन से और भी वैल्यू कम होने लगती है. उनकी खरीद उपभोग के लिये है. उपभोग करना हो तो अपनी कमाई या बचत से करो. अपनी आय और व्यय के खानों की समझ रखो. अपनी सम्पत्तियों और देनदारियों की समझ रखो. मोटरसाइकल/कार/एयरकण्डीशनर आपकी सम्पत्तियां नहीं; आपकी देनदारियां है. पर लोग इस फेर में पड़ते नहीं. या तो न चुकाने की नीयत से लोन लेते हैं या फिर सरासर बेवकूफी में अपना विवेक बेच देते हैं.

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फुटनोट: आलोक पुराणिक अपने अगड़म-बगड़म वाले ब्लॉग पर जितना लिखते हैं उतना ही स्मार्टनिवेश वाले ब्लॉग के लिये लिखें और लोगों में पैसे के प्रति आदरभाव विकसित करें तो हम ब्लॉगरों का बहुत भला हो! :-)

‘भैया किराया-भाड़ा बढ़ाते क्यों नहीं?’

July 5, 2007

अमुक हमारा कम्पिटीटर है. बस चलाता है. बनारस-इलाहाबाद से नागपुर. हमारा कम्पिटीटर यानी रेलवे का कम्पीटीटर. ट्रेन में जगह न मिले तो बनारस स्टेशन से उसके चेले यात्री को उसकी बस में बिठाने ले आते हैं. उसे एक ही कष्ट है कि रेलवे किराया क्यों नहीं बढ़ाती. किराया बढ़ाये तो वह भी अपनी बस का किराया अनुपात में बढ़ा दे.

रोड ट्रांसपोर्ट में अमुक की पैठ है. थाने-आर.टी.ओ. से कभी कोई तकलीफ नहीं. मंत्री की रिश्तेदारी में शादी-वादी अटेण्ड कर आता है. पत्रकार सम्मेलन भी कर लेता है. लोकल टीवी में बस-ट्रांसपोर्ट एसोसियेशन की ओर से बोलते भी पाया जाता है. सन 2015 तक एम.एल.ए. और 2020 तक मंत्री बनने का लक्ष्य है. कुल मिला कर कैल्कुलेटेड तरीके से चल रहा है. कभी-कभी हमसे भी मिल लेता है. हमसे कभी काम नहीं पड़ा, पर उसके नेचर में मेल-जोल रखना है, सो अपना धर्म निभाता है. यदा-कदा नेम-ड्रापिंग के लिये हमारे नाम का प्रयोग करता है, बस. हमें भी वह पसन्द है क्योंकि मिलते ही चरण-स्पर्श करता है.

नागपुर जाता है तो बस से ही. रिजर्वेशन के लिये भी तंग नहीं करता. बस से क्यों जाता है पूछने पर काम की बात बताई. बोला – “भैया, ये बस के ड्राइवर-कण्डक्टर जब रूट पर चलते हैं तो पनीर की सब्जी ही खाते हैं. अमिषभोजी हुये तो चिकन के नीचे नहीं उतरते. सभी ढ़ाबे वालों से सेटिंग है. जहां रोकेंगे वहां इनकी खातिरदारी तय है. अब मैं साथ जाऊं तो मेरे लिये भी वही ठाठ रहेगा कि नहीं!”

उसने और बताया बस का ड्राइवर जब तक बस चलाता है तब तक डनहिल से नीचे की सिगरेट नहीं पीता. और जब बस से उतार देता हूं तो सिगरेट के टोटे बीन कर पीता है. मुझे अपने ट्रेन में चलने वाले रेल-कर्मियों की याद आयी. उन्हें दण्डित करने को अगर उनका पास/प्रिविलेज टिकेट या एक आध इंक्रीमेण्ट बन्द कर दो तो सेहत पर कोई असर नहीं होता. पर अगर ट्रेन से उतार दो तो हफ्ते भर में मुंह पर मक्खियां भिनभिनाने लगती हैं. ट्रेन में चलने का रुआब बड़ी चीज है. ठीक बस के ड्राइवर की तरह.

मैने उससे कहता हूं कि कभी हमें भी साथ ले चले. घर में अरहर की दाल और नेनुआ खाते बहुत हो गया. कुछ चेंज हो जाना चाहिये. वह तुरंत हां कर देता है. फिर ऐसा गायब होता है कि महीनों नहीं दिखता.

बस अकस्मात, यदा कदा वह अवतरित हो जाता है चरण धूलि लेने को! आज के जमाने में जब स्वारथ लाइ करहि सब प्रीती ब्राण्ड के हैं तो बिना स्वार्थ के चरण छूने वाला वही भर है. न वह मेरा काम करता है न मैं उसका.

बस वह सदा यही कहता पाया जाता है भैया किराया-भाड़ा बढ़ाते क्यों नहीं. जैसे की रेल बज़ट बनाने का काम मेरे ही जिम्मे हो!

माइज़र कार्यक्रम देगा प्लास्टिक कचरे से डीजल

July 4, 2007

मित्रों, पेण्टागन 11 करोड़ का फण्ड दे रहा है माइज़र (MISER) कार्यक्रम के लिये. अगर यह शोध कार्यक्रम सफल रहा तो प्लास्टिक के कचरे का समाधान निकल आयेगा. आप तो जानते ही हैं कि प्लास्टिक बायो-डीग़्रेडेबल नहीं है. उसका कचरा हम आने वाली पीढ़ियों को पर्यावरण की बदसूरती की विरासत के रूप में निर्मित कर रहे हैं. यह कार्यक्रम आशा की किरण जगाता है कि भविष्य की पीढ़ियां हमें स्वार्थी के रूप में याद नहीं करेंगी.

यह कार्यक्रम है क्या? पॉलिटेक्निक यूनिवर्सिटी, ब्रुकलेन, न्यूयॉर्क में प्रोफेसर डा. रिचर्ड ग्रास मोबाइल इण्टीग्रेटेड सस्टेनेबल इनर्जी रिकवरी (MISER) प्रोग्राम के नाम से एक शोध कार्य कर रहे हैं. वे बॉयो-तेल (जैसे सोया तेल) से प्लास्टिक बना रहे हैं. यह प्लास्टिक आज के खनिज तेलों से बने प्लास्टिक जैसा ही है. इसके प्रयोग से जो कचरा बनेगा, वह आज के प्लास्टिक के कचरे की तरह कालजयी दैत्य नहीं होगा! उसे अगले 500 वर्षों तक सभ्यता को ढ़ोना नहीं पड़ेगा. वरन उस कचरे की चिन्दियां कर, उसके खमीरीकरण से उत्पन्न होगा डीजल जो ऊर्जा भी प्रदान करेगा.

पेण्टागन को इसमें रुचि इसलिये है कि उसे विषम स्थलों पर प्लास्टिक युक्त रसद भेजनी पड़ती है और उन जगहों पर उसकी इन्धन की भी जरूरतें होती हैं. उस रसद का कचरा अगर इन्धन भी उपलब्ध करा दे तो क्या कहने!

(डा. रिचर्ड ग्रास, बायो तेलों से बने बायो-प्लास्टिक की शीट दिखाते हुये)

आप यह समझने के लिये निम्न 2 स्थितियों की तुलना करें:

  • स्थिति 1. खनिज तेल -> प्लास्टिक -> प्लास्टिक के उत्पाद -> उपयोग के बाद नष्ट न होने वाला धरती और समुद्र को नर्क बनाने वाला कचरा.
  • स्थिति 2. बायो-तेल -> बायो-प्लास्टिक (प्लास्टिक के सभी गुणों से युक्त) -> प्लास्टिक के उत्पाद -> उपयोग के बाद कचरा -> कचरे की श्रेडिंग -> गुनगुने पानी में चिन्दी के रूप में कचरे का खमीरीकरण -> 3-5 दिन चली प्रक्रिया के बाद घोल पर उत्पन्न डीजल ऊपर तैरने लगता है.

स्थिति 2 में यूरेका की अनुभूति होती है. और यह स्थिति प्रयोगशाला स्तर पर कारगर हो चुकी है.खमीरीकरण की प्रक्रिया में कुछ ऊर्जा व्यय होती है पर उससे उत्पन्न डीजल कहीं अधिक ऊर्जा युक्त होता है. कुल मिला कर बायो-प्लास्टिक कचरा रूपांतरित हो कर ऊर्जा स्रोत बनेगा. डा. ग्रास का शोध अभी वाणिज्यिक तौर पर लांच करने की अवस्था में नहीं आया है. पर जब पेण्टागन इसमें अपनी रुचि जता रहा है, तो मामला यूं ही नहीं है.

आप याद कर सकते हैं कि बहुत सी जीवनोपयोगी खोजें विश्व युद्ध और अंतरिक्ष विज्ञान के अनुसन्धान से ही हमें मिली हैं. क्या पता यह पर्यावरणीय विकट समस्या का समाधान हमें पेण्टागन के माध्यम से मिले.

आप पूरी खबर के लिये न्यूयार्क टाइम्स के इस पन्ने का अवलोकन करें.

विकी पर कोई गया तो फिर लौटा है? – समीर लाल

July 3, 2007

भैया, समीर जी कौन सी चक्की का खाते हैं जो ऐसी सुपर सशक्त टिप्पणी करते हैं. मदान जी ने एक पोस्ट लिखी नारदजी सुनिये जमाना बदल गया है. अब नारदजी सुनिये से हमें लगता है कह रहे हों – जीतेंद्र चौधरी सुनिये. बेचारे जीतेन्द्र सुनते-सुनते अण्डर ग्राउण्ड हो गये. वे हमें कह रहे थे कि जून के अंत में मिलेंगे. पर अभी तक इंतजार ही कर रहा हूं.

खैर, डिटूर कर जाने की बुरी आदत है. मदान जी नाराज हैं कि महादेवी जी पर उन्होने विकीपेडिया का इतना महत्वपूर्ण हाइपर लिंक दिया था पर किसी टिपेरे ने उनको सुना तक नहीं! वो इतने नाराज थे कि उस पोस्ट पर टिपेरने की सुविधा भी नहीं प्रदान की. इतना महत्वपूर्ण मुद्दा हो और समीर जी टिपेर न पायें? गजब हो जायेगा. लिहाजा समीर जी ने उसके पिछली पोस्ट पर टिपेरा. और क्या मस्त टिपेरा! मैं उनकी टिप्पणी जस की तस रिप्रोड्यूस कर रहा हूं :

भाई, पढ़ते तो जरुर हैं मगर आपने ही तो लिंक से सब को विकि पर भेज दिया तो जो गया सो गया..कौन लौटा है आजतक वो भी टिप्पणी करने!!! आप संवेदनशील हैं..मगर लिखना जारी रखें. कोशिश की जायेगी कि पढ़ने के बाद पावती रख जायें. शुभकामनायें.

महादेवी वर्मा, हिन्दी साहित्य, मदान जी की अच्छी पोस्ट, उनकी खुन्दक – इन सबसे मेरा कोई लेना-देना नहीं है. मैं तो सिर्फ समीर जी के टिपेरने पर पोस्ट लिख रहा हूं. क्या ग्रेट बात की है उन्होनें – विकी न हुआ, ब्लैक होल हो गया. हम भी जब विकी पर गये हैं तो उसी में दारुजोषित की नाईं भटकते रहे हैं. कटिया दर कटिया, हाइपर लिंक दर हाइपर लिंक. उस दिन पत्नी भिन्ना कर बोल ही देती हैं – ये तुम्हारा कम्प्यूटर गंगाजी में फिंकवा दूंगी!

कितना गूढ़ ऑब्जर्वेशन है समीर जी का!

समीर जी ने हमारे ब्लॉग पर टिपेरा :

अच्छा शोध किया है और मैं सहमत हूँ…..बहुत सही. अब सोता हूँ.

अब देखिये; साफ है कि उन्हे हमारी पोस्ट निहायत ऊबाऊ लगी. पढ़ कर नींद आने लगी. फिर भी कितने शरीफ हैं. साफ-साफ नहीं कहा – ‘क्या अण्ट-शण्ट लिखते हो. कोई किताब पढ़ ली तो इसका मतलब यह नहीं कि सब को पढ़ा मारो!’ बड़ी शराफत से यह बता दिया कि पोस्ट ऊबाऊ है पर वे मॉरल डाउन नहीं करना चाहते!

जब बात समीर जी की कर रहा हूं तो एक ऑब्जर्वेशन मैं और करना चाहता हूं. चिठ्ठे छप रहे हैं – धड़ाधड़. ऐसे में समीर जी सो कैसे सकते हैं? ऐसे कैसे हो सकता है कि चिठ्ठों की प्रोडक्शन लाइन तीनों शिफ्ट में चले और मास्टर टिपेरा एक शिफ्ट बन्द कर दे – यूनीलेटरली. पोस्ट बनने लगेंगी – नारदजी सुनिये हम परेशान हैं, समीरजी सो रहे हैं!

एक काम वो कर सकते हैं. अपने कम्प्यूटर को वे ई-मेल के ऑटो-रिप्लाई मोड की तरह ऑटो-कमेण्ट मोड में डाल दें. और इस तरह की टिप्पणियां अपने सोते में जेनरेट करें :

udan tashtari said…
बहुत शानदार. लिखते रहें. आपके लेखन में बहुत धार है. बहुत प्रेरक लिखा है! (यह ऑटो कमेण्ट है. अभी मैं दौरे पर हूं. वापस आते ही पुन: टिप्पणी करूंगा.)

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पुन:
अभी-अभी देखा है कि अनुनाद सिन्ह जी के ब्लॉग पर भी मदान जी के विषय में समीर जी टिपेर चुके हैं :

हमारी भी टिपियाने की हसरत धरी रह गई!! :(

इतना बढ़िया टिपेरने पर भी समीर जी की हसरतें हैं कि पूरी नहीं होतीं!

खैर, समीर जी, हमारी कोई पोस्ट आपकी टिप्पणी से बचनी नहीं चाहिये वर्ना मुझे लगेगा कि आप नाराज हो गये.

रुपये की पांचवी चवन्नी कहां है?

July 3, 2007

बिग बाजार पर किशोर बियाणी की किताब* ने विभिन्न प्रांतों मे लोगों की खुदरा खरीद की अलग-अलग आदतों पर प्रकाश डाला है. वह विवरण बहुत रोचक है. मैं उस अंश का मुक्त अनुवाद पेश करता हूं -

जैसे-जैसे हमने नये शहरों और नये लोगों को सेवा देनी प्रारम्भ की, हमें यह अहसास हो गया कि हम अपने हर स्टोर को एक से नियम या तरीके से नहीं चला सकते. खरीददारी स्थानीय अनुभव और आदत है. नुक्कड़ की दुकान से बड़े शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, सेल्फ सर्विस, आधुनिक आउटलेट में अपने को रूपांतरित करना इस बेसिक आदत में बदलाव मांगता है. यह बदलाव अलग-अलग समुदायों में अलग-अलग प्रकार से होता है. इसलिये हमारे लिये न केवल यह अनिवार्य हो जाता है कि हम हर समुदाय को समझें वरन अपने स्टोर के स्तर पर उस समझ के अनुसार निर्णय लें और फेरबदल करें.

उदाहरण के लिये हमने गुजरात में अपना स्टोर खोला भी न था कि हमें खुदरा व्यापार के स्थानीय मजाक से वाकिफ होना पड़ा. खुदरा व्यापारी वहां कहते हैं कि गुजराती ग्राहक यह सवाल पूछने का आदी है कि मेरे रुपये की पांचवीं चवन्नी कहां है? यही कारण है कि बहुत से खुदरा व्यापारी गुजरात को भारतीय रिटेल का वाटरलू मानते हैं. यह कहा जाता है कि अगर कोई गुजरात में सफल हो गया तो भारत में कहीं भी सफल हो जायेगा.

अपना स्टोर गुजरात में लॉंच करने पर हमने पाया कि गुजराती माणस न केवल जबरदस्त वैल्यू-कांशस है बल्कि उसकी खरीददारी की आदतें विलक्षण हैं जो भारत के और हिस्सों में नही मिलतीं. जहां अनाज खरीदने की बात हो, गुजराती आदमी/औरत साल भर की खरीद एक साथ करने में यकीन करते हैं. अनाज अट्टाल में संग्रह करने की प्रवृत्ति पूरे गुजरात में है. चूकि गुजराती महिला साल भर का अनाज एक साथ खरीदती है, वह चाहती है कि उसे पर्याप्त छूट मिले, सामान घर तक पंहुचाया जाये और बिक्री उधारी पर हो! जब वह साल भर का अनाज एक साथ खरीदने आती है तो चाहती है कि अनाज बिल्कुल वैसा ही हो या उसी खेत का हो जैसा पिछले साल उसने खरीदा था. यह सब रिटेल व्यापार के लिये काफी चुनौती भरा होता है. हमें सतत सृजनात्मकता का सहारा लेकर इस तरह की मांग को पूरा करना होता है. और जब हमने पाया कि हम इस चुनौती का सामना कर पाने में सफल हो रहे थे, तो हमें अपने सामने असीमित सम्भावनयें और विशाल बाजार नजर आने लगे.

लेकिन जैसे जैसे हम गुजरात से हट कर अन्य प्रांतों की तरफ जाते हैं, हमें स्पष्ट होता है कि हर जगह हर समुदाय की अपनी अलग मौलिकता है. बंगाल का ग्राहक व्यक्तिगत सम्बन्धों की अंतर्धारा की तलाश करता है और चल रही ब्राण्डों के प्रति बहुत अधिक प्रतिबद्ध है. इस लिये वहां एक नयी ब्राण्ड को खपाना कठिन काम है.

“इसके उलट पंजाब में ग्राहक के पास खर्च करने को बहुत अधिक इनकम है. इसके अलावा पंजाब बहुत थोड़े से प्रांतों मे है जहां बड़े पैमाने पर खर्च करने की वृत्ति के साथ किसी तरह का अपराध बोध लिपटा हुआ नहीं है. पर ग्राहक वहां किसी ब्राण्ड, उत्पाद या स्टोर के साथ घनिष्टता से चिपके नही हैं और बड़े पैमाने पर ब्राण्ड बदलने के प्रयोग करते हैं.

“इसलिये दोनो समुदाय अलग-अलग प्रकार से बेजोड़ सम्भावनायें और चुनौतियां पेश करते हैं.”

बस बाकी तो बियाणी अपने बिजनेस के तरीकों और रीटेल व्यवसाय के मॉडल की बात करने लगते हैं, जिसके लिये, आप चाहें तो सीधे किताब पढ़ सकते हैं.

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* It Happened In India by Kishore Biyani with Dipayan Baishya
Rupa & Co, Rs. 99.-

बार-बार देखो; हजार बार देखो!

July 1, 2007

मेरे एक मित्र हैं. सारी टिप्स लेने और सारी गणना करने के बाद एक शेयर खरीदते है. फिर पांच मिनट बाद उसकी वैल्यू चेक करते हैं. अगर पांच पैसे बढ़ गयी तो दस लोगों को बताते हैं कि उनकी स्टॉक रिसर्च कितनी जबरदस्त है. उनका सेंस आफ टाइम कितना एक्यूरेट है.

ये जितने ब्लॉगर हैं, पोस्ट लिखते ही नारद चेक करते हैं कि फीड एग्रीगेटर ने पकड़ी की नहीं. समय बीतता है और बेताबी बढ़ती है. कुछ कर नहीं सकते सिवाय बार-बार चेक करने और अंगूठा चूसने के. अचानक पोस्ट नारद के पन्ने पर आ जाती है तो जैसे कमोड पर पेट हल्का हो जाता है. बस उसके बाद स्टैटकाउण्टर की रीडिंग देखने लगते हैं. कई बार अन्देशा होता है कि कहीं स्टैटकाउण्टर वाले की साइट में स्नैग तो नहीं आ गया. वर्ना इतनी धांसूं पोस्ट पर भी रीडिंग बढ़ नही रही!

मेरे पिताजी पुराने जमाने के हैं. वे कम्प्यूटर नहीं देखते. वे घर के बिजली/पानी के मीटर को देखते हैं. ज्यादातर बिजली का मीटर उसकी डिस्क कितनी तेजी से भाग रही है. चश्मा लगा कर बिजली की यूनिट का काउण्टर पढ़ने का यत्न करते हैं. नहीं पढ़ पाते तो किसी को बुला कर पढ़वाते हैं. अगर काउण्ट आशानुरूप हुआ तो ठीक, वर्ना एक-आध पंखा-बत्ती का बटन टीप देते हैं.

मेरी पत्नीजी बार-बार कहती रहीं कि घण्टों ब्लॉगरी करते हो पर उससे धेले भर की भी तो आमदनी नहीं है. उनकी नैगिंग से परेशान हो कर मैने गूगल-एडसेंस के विज्ञापन चस्पां कर दिये हैं ब्लॉग पर. अब पत्नीजी का एक महत्वपूर्ण काम यह पता करना है कि एडसेंस एकाउण्ट में कितने पैसे आये. पाठक लोग इतने मिरचुक हैं कि कोई विज्ञापन क्लिक ही नहीं करता. इस रेट से तो 3 साल लगेंगे 100 डॉलर कमाने में. पर जब देखो तब वे एडसेंस एकाउण्ट चेक करती रहती हैं. एकाउण्ट चेक करने में ही आमदनी से ज्यादा खर्चा होता होगा!

भरतलाल (मेरा बंगलो-पियुन) दिनमें तीन बार बगीचे की नेनुआ-लौकी नाप आता है. नेनुओं की संख्या बताता है और लौकी के बारे में यह जानकारी देता है कि बस दो-तीन इंच और बढ़ गयी तो लौकी का कोफ्ता बन सकेगा.

मैं टीवी नहीं देखता पर एक बार की याद है. दो-तीन दिन तक पूरा देश बार-बार टीवी खोल कर देख रहा था और बता रहा था कि प्रिंस अभी गढ्ढ़े में ही है. बाहर निकलने में बस थोड़ा टाइम और लगेगा.

हर आदमी कुछ न कुछ देख रहा है. तकनीकी विकास ने देखने के संसाधन बढ़ा दिये हैं. इस देखने से कोई छोटी-बड़ी क्रांति हो रही हो ऐसा कतई नहीं है. पर समय है, उसे गुजारना है तो बस; देखो!

बार-बार देखो, हजार बार देखो, देखने की चीज है ये समय दिलरुबा.