Archive for the ‘अर्थ’ Category

गंगा का कछार, नीलगाय और जट्रोफा

July 8, 2007

हरिकेश प्रसाद सिन्ह मेरे साथ जुड़े इंस्पेक्टर हैं. जो काम मुझे नहीं आता वह मैं एच पी सिन्ह से कराता हूं. बहुत सरल जीव हैं. पत्नी नहीं हैं. अभी कुछ समय पहले आजी गुजरी हैं. घर की समस्याओं से भी परेशान रहते हैं. पर अपनी समस्यायें मुझसे कहते भी नहीं. मैं अंतर्मुखी और वे मुझसे सौ गुणा अंतर्मुखी. राम मिलाये जोड़ी…

एक दिन मैने पूछ ही लिया – जमीन है, कौन देखता है?
बोले – यहां से करीब 20-25 किलोमीटर दूर गंगा के कछार में उनकी जमीन है. करीब 40 बीघा. कहने को तो बहुत है पर है किसी काम की नहीं. खेती होती नहीं. सरपत के जंगल बढ़ते जा रहे हैं.
पूरे चालीस बीघा बेकार है?
नहीं. लगभग 10 बीघा ठीक है पर उसमें भी खेती करना फायदेमन्द नहीं रहा.
क्यों?
मर खप के खेती करें पर जंगली जानवर – अधिकतर नीलगाय खा जाते हैं. नीलगाय को कोई मारता नहीं. पूरी फसल चौपट कर देते हैं.
नीलगाय तो हमेशा से रही होगी?
नहीं साहब, पहले आतंक बहुत कम था. पहले बाढ़ आती थी गंगा में. ये जंगली जानवर उसमें मर बिला जाते थे. अब तो दो दशक हो गये बाढ़ आये. इनके झुण्ड बहुत बढ़ गये हैं. पहले खेती करते थे. रखवाली करना आसान था. अब तो वही कर पा रहा है जो बाड़ लगा कर दिन-रात पहरेदारी कर रहा है. फिर भी थोड़ा चूका तो फसल गयी.

मुझे लगा कि बाढ़ तो विनाशक मानी जाती है, पर यहां बाढ़ का न होना विनाशक है. फिर भी प्रश्न करने की मेरी आदत के चलते मैं प्रश्न कर ही गया – वैसा कुछ क्यों नहीं बोते जो नीलगाय न खाती हो?
एच पी सिन्ह चुप रहे. उनके पास जवाब नहीं था.
मैने फिर पूछा – जट्रोफा क्यों नहीं लगाते? रेलवे तो लाइन के किनारे जट्रोफा लगा रही है. इसे बकरी भी नहीं चरती. अंतत: बायो डीजल तो विकल्प बनेगा ही.

हरिकेश की आंखों में समाधान की एक चमक कौन्धी. बोले – दुर्वासा आश्रम के पास एक सभा हुई थी. जट्रोफा की बात हुई थी. पर कुछ हुआ तो नहीं. लगा कि उन्हे इस बारे में कुछ खास मालुम नहीं है.

लेकिन मुझे समाधान दिख गया. सब कड़ियां जुड़ रही हैं. गंगा में पानी उत्तरोत्तर कम हो रहा है. कछार जंगल बन रहा है सरपत का. नील गाय बढ़ रहे हैं. जट्रोफा की खेती से जमीन का सदुपयोग होगा. खेती में काम मिलेगा. जट्रोफा के बीजों का ट्रांसस्ट्रेटीफिकेशन ट्रांसएस्टेरीफिकेशन के लिये छोटे-छोटे प्लाण्ट लगेंगे. उनमें भी रोजगार होगा. बायोडीजल के लाभ होंगे सो अलग. हरिकेश की पूरे 40 बीघा जमीन उन्हे समृद्ध बनायेगी. वह जमीन जहां आज उन्हे कुछ भी नजर नहीं आ रहा.

गंगा में पानी कम हो रहा है तो कोसना और हताशा क्यों? उपाय ढ़ूंढ़े. फिर मुझे लगा कि मैं ही तो सयाना नहीं हूं. लोग देख-सोच-कर रहे होंगे….भविष्य में व्यापक परिवर्तन होंगे. एच पी सिन्ह की जमीन काम आयेगी.

देखें, आगे क्या होता है.

आप जरा जट्रोफा पर जानकारी के लिये यह साइट देखें.


कर्ज लेते हैं पर लौटाते समय कोसते हैं बाजारवाद को!

July 6, 2007

बाजार है वह भग्वद्गीता के स्थितप्रज्ञ दर्शन पर नहीं चलता है. वह उपभोक्ता केन्द्रित होता है और पूंजी तथा वस्तुओं के विनिमय को सुविधजनक बनाता है. बैंक बाजार की एक महत्वपूर्ण इकाई है. बैंक वाले रेलवे स्टेशन के हॉकर की तरह चाय-चाय की रट जैसा बोल लोन बाटें तो लोग अच्छा महसूस करते हैं. उससे उनके उपभोग की कल्पनाओं को मूर्त करने के साधन सुलभ हो जाते हैं. पर उगाही के लिये बैंक टेढ़ी उंगली का प्रयोग करें तो वही लोग “नाश हो पूंजीवाद का” नारा लगाते हैं!

भैया, बैंक वाले ने धर्मादे के लिये सदाव्रत थोड़े ही खोल रखा है.

लोग बेइंतहा खर्च करें. कर्जा लेकर घी पियें. चारवाक को आधुनिक युग में री-इनवेण्ट करें वह ठीक. पर उनसे कोई कर्जा वापस मांगे तो वे बन जायें निरीह/दीन/गरीब और वापस मांगने वाला सूदखोर महाजन. यह प्रपंचवाद मैने भारतीय समाज में बहुत देखा है.

मैं पुराना अनुभव बताता हूं. एक मण्डल रेल प्रबन्धक जी के पास बैंक वाले पंहुचे. करीब 300 कर्मचारियों की लिस्ट दी; जिन्होने पर्सनल लोन ले कर वापस न करने का मन बना रखा था और लम्बे समय से डिफॉल्टर थे. एक रेल वाले ने सर्टीफाई किया था कि वे रेल कर्मी हैं और उनकी नियमित आय है. उसी आधार पर उन्हें लोन मिला था. मण्डल रेल प्रबन्धक ने अपने विवेक से तय किया कि कर्मचारियों का यह व्यवहार अशोभनीय है और रेल की छवि को धूमिल करता है. उन लोगों को चार्ज-शीट देने का निर्णय लिया – उनको अशोभनीय व्यवहार के लिये क्यों न नौकरी से निकाल दिया जाये? इस निर्णय के लेते ही बहुतों ने आनन-फानन में लोन वापस कर दिये. बाकियों ने किश्त भरनी प्रारम्भ कर दी.

एक दूसरा उदाहरण : एक चपरासी बहुत कर्जे में डूबा था – पठानी ब्याज के कर्ज में. उधारी की रकम बढ़ती ही जा रही थी. हम दो अधिकारियों नें, जिन्हे परोपकार का कीड़ा यदा-कदा काटता है, विचार विमर्श कर पाया कि हम दोनो मिलकर उसे ब्याज मुक्त लोन अगर दें और उसका पठानी ब्याज वाला कर्ज एक बार उतर जाये तो शायद उसकी गाड़ी पटरी पर आ जाये. पूरी गणना के बाद हमने उससे कहा कि हम उससे वायदा चाहेंगे कि वह तनख्वाह मिलने पर हमारी किश्त – जो मूल ऋण (मुक्त ब्याज) की होगी, समय से वह चुका देगा. चपरासी ने बताया कि उसके घर का खर्च उसकी पत्नी चलाती है. अत: अंतिम रूप से तय करने को उसे सपत्नीक दफ्तर में बुलाया. हमारा सोचना था कि उसकी पत्नी कुशलता से घर का खर्च भी चलायेगी और हमारा सॉफ्ट-लोन भी चुकायेगी. पर जब उसकी पत्नी को देखा तो हमारे चेहरे पर से परोपकार की हिलोरें शांत हो गयीं. वह इतने साज शृंगार के साथ थी कि कोई अफसर की बीवी भी क्या होगी. हम समझ गये कि चपरासी की समस्या परिस्थितियों का मारा होने की नहीं – जैसा वह कहता था, वरन ऋण लेकर उपभोग करने की है. वह हमारे एक बार की सहायता से हल होने वाली नहीं है. परोपकार की हमारी कोशिश चारवाक के सिद्धांत के सलीब पर चढ़ गयी – अमल में आ ही न सकी.

मैं जानता हूं कि लोन देना भी भ्रष्टाचार का जनक है. यह भ्रष्टाचार पहले महाजन किया करता था (आज भी करता है). अब, कुछ मात्रा में, बैंक कर्मी भी करते हैं. ग्रामीण माइक्रोक्रेडिट देने के लिये तो भारत में बांगलादेश के मोहम्मद यूनुस जी की तर्ज पर ईमानदार पहल होनी चाहिये. पर वह विषयांतर है. मैं यहां केवल लोन लेने की वृत्ति और न चुकाने की नीयत के विषय में लिख रहा हूं. यह वृत्ति नव-मध्यवर्ग में तेजी से घर करता जा रही है. इसके लिये अपनी इच्छाओं पर लगाम लगाने की बजाय बाजार/पूंजीवाद को कोसना गैरजिम्मेदार आचरण है.

कर्ज न चुका पाने के कारण जो मौतें हो रही हैं, उन सबके मूल में दैवी आपदा या मानव की क्षमता के बाहर के गणक नहीं हैं. बहुधा अपने उपभोक्तापन के लिये कर्ज लिये जाते हैं. शादी-विवाह-तेरही आदि के लिये अपनी सामाजिक हैसियत से अधिक कर्ज लिये जाते हैं. येन-केन-प्रकरेण कर्ज लिये जाते हैं. आज के उपभोग के लिये भविष्य के स्वयम को बन्धक बना देते हैं लोग! कर्ज लेते समय कर्ज वापसी का कैश-फ्लो कितने लोग सोचते है? कर्ज लेते समय लोग अपनी अर्जन क्षमता का भी तर्कसंगत आकलन नहीं करते. फिर एक कर्ज को दूसरे कर्ज से पाटने का दुश्चक्र चलाते हैं. बाजार व्यक्ति को ललचाता जरूर है. पर बाजार में अपना विवेक तो व्यक्ति स्वयम बेचता है!

मैं अपने कर्मचारियों को समझाता हूं. मकान बनाने के लिये लोन लेते हो तो ठीक है. अगर कल विपत्ति आयी तो मकान बेंच कर भी लोन चुका सकते हो. पर मोटरसाइकल या कार के लिये लोन न लो. वह खरीदते ही उनकी कीमत कम हो जाती है. फिर डिप्रीशियेशन से और भी वैल्यू कम होने लगती है. उनकी खरीद उपभोग के लिये है. उपभोग करना हो तो अपनी कमाई या बचत से करो. अपनी आय और व्यय के खानों की समझ रखो. अपनी सम्पत्तियों और देनदारियों की समझ रखो. मोटरसाइकल/कार/एयरकण्डीशनर आपकी सम्पत्तियां नहीं; आपकी देनदारियां है. पर लोग इस फेर में पड़ते नहीं. या तो न चुकाने की नीयत से लोन लेते हैं या फिर सरासर बेवकूफी में अपना विवेक बेच देते हैं.

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फुटनोट: आलोक पुराणिक अपने अगड़म-बगड़म वाले ब्लॉग पर जितना लिखते हैं उतना ही स्मार्टनिवेश वाले ब्लॉग के लिये लिखें और लोगों में पैसे के प्रति आदरभाव विकसित करें तो हम ब्लॉगरों का बहुत भला हो! :-)

रुपये की पांचवी चवन्नी कहां है?

July 3, 2007

बिग बाजार पर किशोर बियाणी की किताब* ने विभिन्न प्रांतों मे लोगों की खुदरा खरीद की अलग-अलग आदतों पर प्रकाश डाला है. वह विवरण बहुत रोचक है. मैं उस अंश का मुक्त अनुवाद पेश करता हूं -

जैसे-जैसे हमने नये शहरों और नये लोगों को सेवा देनी प्रारम्भ की, हमें यह अहसास हो गया कि हम अपने हर स्टोर को एक से नियम या तरीके से नहीं चला सकते. खरीददारी स्थानीय अनुभव और आदत है. नुक्कड़ की दुकान से बड़े शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, सेल्फ सर्विस, आधुनिक आउटलेट में अपने को रूपांतरित करना इस बेसिक आदत में बदलाव मांगता है. यह बदलाव अलग-अलग समुदायों में अलग-अलग प्रकार से होता है. इसलिये हमारे लिये न केवल यह अनिवार्य हो जाता है कि हम हर समुदाय को समझें वरन अपने स्टोर के स्तर पर उस समझ के अनुसार निर्णय लें और फेरबदल करें.

उदाहरण के लिये हमने गुजरात में अपना स्टोर खोला भी न था कि हमें खुदरा व्यापार के स्थानीय मजाक से वाकिफ होना पड़ा. खुदरा व्यापारी वहां कहते हैं कि गुजराती ग्राहक यह सवाल पूछने का आदी है कि मेरे रुपये की पांचवीं चवन्नी कहां है? यही कारण है कि बहुत से खुदरा व्यापारी गुजरात को भारतीय रिटेल का वाटरलू मानते हैं. यह कहा जाता है कि अगर कोई गुजरात में सफल हो गया तो भारत में कहीं भी सफल हो जायेगा.

अपना स्टोर गुजरात में लॉंच करने पर हमने पाया कि गुजराती माणस न केवल जबरदस्त वैल्यू-कांशस है बल्कि उसकी खरीददारी की आदतें विलक्षण हैं जो भारत के और हिस्सों में नही मिलतीं. जहां अनाज खरीदने की बात हो, गुजराती आदमी/औरत साल भर की खरीद एक साथ करने में यकीन करते हैं. अनाज अट्टाल में संग्रह करने की प्रवृत्ति पूरे गुजरात में है. चूकि गुजराती महिला साल भर का अनाज एक साथ खरीदती है, वह चाहती है कि उसे पर्याप्त छूट मिले, सामान घर तक पंहुचाया जाये और बिक्री उधारी पर हो! जब वह साल भर का अनाज एक साथ खरीदने आती है तो चाहती है कि अनाज बिल्कुल वैसा ही हो या उसी खेत का हो जैसा पिछले साल उसने खरीदा था. यह सब रिटेल व्यापार के लिये काफी चुनौती भरा होता है. हमें सतत सृजनात्मकता का सहारा लेकर इस तरह की मांग को पूरा करना होता है. और जब हमने पाया कि हम इस चुनौती का सामना कर पाने में सफल हो रहे थे, तो हमें अपने सामने असीमित सम्भावनयें और विशाल बाजार नजर आने लगे.

लेकिन जैसे जैसे हम गुजरात से हट कर अन्य प्रांतों की तरफ जाते हैं, हमें स्पष्ट होता है कि हर जगह हर समुदाय की अपनी अलग मौलिकता है. बंगाल का ग्राहक व्यक्तिगत सम्बन्धों की अंतर्धारा की तलाश करता है और चल रही ब्राण्डों के प्रति बहुत अधिक प्रतिबद्ध है. इस लिये वहां एक नयी ब्राण्ड को खपाना कठिन काम है.

“इसके उलट पंजाब में ग्राहक के पास खर्च करने को बहुत अधिक इनकम है. इसके अलावा पंजाब बहुत थोड़े से प्रांतों मे है जहां बड़े पैमाने पर खर्च करने की वृत्ति के साथ किसी तरह का अपराध बोध लिपटा हुआ नहीं है. पर ग्राहक वहां किसी ब्राण्ड, उत्पाद या स्टोर के साथ घनिष्टता से चिपके नही हैं और बड़े पैमाने पर ब्राण्ड बदलने के प्रयोग करते हैं.

“इसलिये दोनो समुदाय अलग-अलग प्रकार से बेजोड़ सम्भावनायें और चुनौतियां पेश करते हैं.”

बस बाकी तो बियाणी अपने बिजनेस के तरीकों और रीटेल व्यवसाय के मॉडल की बात करने लगते हैं, जिसके लिये, आप चाहें तो सीधे किताब पढ़ सकते हैं.

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* It Happened In India by Kishore Biyani with Dipayan Baishya
Rupa & Co, Rs. 99.-

एथेनॉल चलायेगा कार – आपकी जीत होगी या हार!

June 30, 2007

मुझे यह आशा है कि देर सबेर ब्राजील की तर्ज पर भारत में एथेनॉल का प्रयोग डीजल/पेट्रोल ब्लैण्डिंग में 20-25% तक होने लगेगा और उससे न केवल पेट्रोलियम पर निर्भरता कम होगी, वरन उससे पूर्वांचल/बिहार की अर्थव्यवस्था भी चमकेगी. अभी चार दिन पहले बिजनेस स्टेण्डर्ड में लीड स्टोरी थी कि कई बड़े स्टॉक मार्केट के बुल्स – राकेश झुनझुनवला सहित, बड़े पैमाने पर देश-विदेश में बायो-ईन्धन के स्टॉक्स में खरीद कर रहे हैं.

और परसों बिजनेस स्टेण्डर्ड में ही, उसके उलट है कि एथेनॉल का प्रयोग आपकी कार के लिये मारक हो सकता है – गलती से भी थोड़ा पानी मिल गया बायो-फ्यूल में तो आपकी कार नष्ट हो सकती है. अर्थात उस प्रकार की बात कि एक दिन किसी स्केंडेनेवियायी देश की रिपोर्ट को बैनर हेडलाइन के साथ छपा पायें कि चाकलेट खाकर आप 110 साल जी सकते हैं. और दूसरे दिन आप ढ़िमाकी लैब के डायरेक्टर के माध्यम से शोध से लाभांवित हों कि चॉकलेट स्वास्थ्य के लिये जहर हैं.

(एथेनॉल का ऑर्गेनिक सूत्र)

और देखें – यह आस्ट्रेलिया की रिपोर्ट – एथेनॉल मिक्सिंग 20 लाख आस्ट्रेलियायी कारों का बाजा बजाने वाली है. या फिर स्टॉनफोर्ड न्यूज का 18 अप्रेल का यह पन्ना जो कहता है कि एथेनॉल के वाहन मानव स्वास्थ्य पर काफी दुष्प्रभाव ड़ालते हैं.

लोग इस सोच से भी दुबले हो रहे हैं कि बायो फ्यूल की खेती से अन्न उत्पादन कम होगा और भुखमरी बढ़ेगी.

उक्त लिंक वाले लेख मैने पढ़े हैं और मेरे अपने निष्कर्ष निम्न हैं -

  1. एथेनॉल के बतौर बॉयो फ्यूल प्रयोग के रोका नहीं जा सकता. यह उत्तरोत्तर बढ़ेगा. खनिज तेल की कीमतें – डिमाण्ड-सप्लाई-लोभ के चलते देर सबेर स्काईरॉकेट करेंगी. और फिर कोई चारा नहीं होगा एथेनॉल ब्लैण्डिंग के विकल्प पर अमल करने के आलावा.
  2. भारत में जट्रोफा/कुरंज/रतनजोत/गन्ना का प्रयोग एथेनॉल बनाने में उत्तरोत्तर बढ़ेगा. वाहनों के इंजन बेहतर बनेंगे.
  3. एथेनॉल रिफाइनरी छोटे पैमाने पर अनेक स्थानों पर होंगी और उससे ईन्धन की यातायात जरूरतें भी कम होंगी.
  4. एथेनॉल ब्लैंडिंग 99.9% शुद्ध हो; बिना पानी मिलाये; यह सुनिश्चित करने के कठोर उपाय किये जायेंगे.
  5. स्वास्थ्य पर एथेनॉल के दुष्प्रभाव पर अभी अंतिम शब्द कहे नहीं गये हैं. इसी प्रकार वाहनों के ऊपर होने वाले दुष्प्रभाव उस तरह के लोगों की भविष्यवाणिंया हैं जो टिटिहरी ब्राण्ड सोच प्रसारित करते हैं.
  6. अर्थव्यवस्था या बाजार तय करेंगे कि भविष्य क्या होगा. पर्यावरणवादी अपनी आदत के अनुसार आपस में लड़ते रहेंगे.
  7. पर्यावरणवादी ही कहते हैं कि एथेनॉल वायु प्रदूषण से लड़ने का बहुत अच्छा उपाय है. इससे ग्लोबल वार्मिंग कम होती है, कार्बन मोनोक्साइड और कार्बन डाइआक्साइड के उत्सर्जन में 30% कमी आती है. इससे ज्वलनशील तत्व/जहरीले पदार्थ/ठोस पार्टीकल के उत्सर्जन में भी क्रमश: 12,30 व 25% की कमी आती है. (आप “ethanol fuel blending plus points” आदि के गूगल सर्च कर लें – ढ़ेरों लिंक मिलेंगे!)

मित्रों, मैं अपने बचपन से देखता आ रहा हूं. एक लॉबी एक कोण से लिखती है. दूसरी लॉबी दूसरे कोण से. मौका परस्त एक लॉबी कभी दूसरी लॉबी में तब्दील भी हो जाती है! अंतत: जो होना होता है वह होता है. एथेनॉल का विरोध करने वाले भविष्य में बायो-फ्यूल चलित कार में जायेंगे बायो-फ्यूल के खिलाफ प्रदर्शन करने को!

मुझे बिग-बाजार में क्या गलत लगता है?

June 26, 2007

मैं किशोर बियाणी की पुस्तक पढ़ रहा हूं इट हेपण्ड इन इण्डिया.* यह भारत में उनके वाल-मार्टिया प्रयोग का कच्चा चिठ्ठा है. कच्चा चिठ्ठा इसलिये कि अभी इस व्यवसाय में और भी कई प्लेयर कूदने वाले हैं. अंतत: कौन एडमण्ड हिलेरी और तेनसिंग बनेंगे, वह पता नहीं. पर बियाणी ने भारतीय शहरों में एक कल्चरल चेंज की शुरुआत तो कर दी है.

बिग बाजार के वातावरण का पर्याप्त इण्डियनाइजेशन हो गया है. वहां निम्न मध्यम वर्गीय मानस अपने को आउट-ऑफ-प्लेस नहीं पाता. वही नहीं, इस वर्ग को भी सर्विस देने वाला वर्ग – ड्राइवर, हैल्पर, घरमें काम करने वाली नौकरनी आदि, जिन्हे बियाणी इण्डिया-2 के नाम से सम्बोधित करते हैं भी बिग बाजार में सहजता से घूमता पाया जाता है. इस्लाम में जैसे हर तबके के लोग एक साथ नमाज पढ़ते हैं और वह इस्लाम का एक सॉलिड प्लस प्वॉइण्ट है; उसी प्रकार बिग बाजार भी इतने बड़े हेट्रोजीनियस ग्रुप को एक कॉम्प्लेक्स के नीचे लाने में सफल होता प्रतीत होता है.

पर मैं किशोर बियाणी का स्पॉंसर्ड-हैगियोग्राफर नहीं हूं. बिग-बाजार या पेण्टालून का कोई बन्दा मुझे नहीं जानता और उस कम्पनी के एक भी शेयर मेरे पास नही हैं. मैं बिग बाजार में गया भी हूं तो सामान खरीदने की नीयत से कम, बिग-बाजार का फिनामिनॉ परखने को अधिक तवज्जो देकर गया हूं.

और बिग-बाजार मुझे पसन्द नहीं आया.

मैं पड़ोस के अनिल किराणा स्टोर में भी जाता हूं. तीन भाई वह स्टोर चलाते हैं. हिन्दुस्तान लीवर का सुपरवैल्यू स्टोर भी उनके स्टोर में समाहित है. तीनो भाई मुझे पहचानते हैं और पहचानने की शुरुआत मैने नही, उन्होने की थी. अनिल किराणा को मेरे और मेरे परिवार की जरूरतें/हैसियत/दिमागी फितरतें पता हैं. वे हमें सामान ही नहीं बेंचते, ओपीनियन भी देते हैं. मेरी पत्नी अगर गरम-मसाला के इनग्रेडियेण्ट्स में कोई कमी कर देती है, तो वे अपनी तरफ से बता कर सप्लिमेण्ट करते हैं. मेरे पास उनका और उनके पास मेरा फोन नम्बर भी है. और फोन करने पर आवाज अनिल की होती है, रिकार्डेड इण्टरेक्टिव वाइस रिस्पांस सिस्टम की नहीं. मैं सामान तोलने की प्रॉसेस में लग रहे समय के फिलर के रूप में बिग-बाजार से उनके कैश-फ्लो पर पड़े प्रभाव पर चर्चा भी कर लेता हूं.

बियाणी की पुस्तक में है कि यह अनौपचारिक माहौल उनके कलकत्ता के कॉम्प्लेक्स में है जहां ग्राहक लाइफ-लांग ग्राहक बनते हैं और शादी के कार्ड भी भेजते हैं. (पुस्तक में नॉयल सोलोमन का पेज 89 पर कथन देखें – मैं अंग्रेजी टेक्स्ट कोट नहीं कर रहा, क्योंकि हिन्दी जमात को अंग्रेजी पर सख्त नापसन्दगी है और मैं अभी झगड़े के मूड में नहीं हूं). इलाहाबाद में तो ऐसा कुछ नहीं है. कर्मचारी/सेल्स-पर्सन ग्राहक की बजाय आपस में ज्यादा बतियाते हैं. ग्राहक अगर अपनी पत्नी से कहता है कि ट्विन शेविंग ब्लेड कहां होगा तो सेल्स-गर्ल को ओवर हीयर कर खुद बताना चाहिये कि फलानी जगह चले जायें. और ग्राहक बेचारा पत्नी से बोलता भी इस अन्दाज से है कि सेल्स-गर्ल सुनले. पर सेल्स-गर्ल सुनती ही नहीं! अनाउंसमेण्ट तो उस भाषा में होता है जो बम्बई और लन्दन के रास्ते में बोली जाती है इलाहाबाद और कोसी कलां के रास्ते नहीं.

परस्पर इण्टरेक्शन के लिये मैं अनिल किराना को अगर 10 में से 9 अंक दूंगा तो बिग बाजार को केवल 4 अंक. अनिल किराना वाला चीजों की विविधता/क्वालिटी/कीमतों मे किशोर बियाणी से कम्पीट नहीं कर पायेगा. पर अपनी कोर कम्पीटेंस के फील्ड में मेहनत कर अपनी सर्वाइवल इंस्टिंक्ट्स जरूर दिखा सकता है. ऑल द बेस्ट अनिल!

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It Happened In India

by Kishore Biyani with Dipayana Baishya

Roopa & Co, Rs. 99.

सिंगूर जैसी कशमकश और बढ़ेगी भविष्य में

June 11, 2007

सिंगूर और नन्दीग्राम, दिल्ली के पास के स्पेशल इकनॉमिक जोन, सरदार सरोवर … और भी कितने ऐसे प्रॉजेक्ट है जिनमें स्थानीय ग्रामीण/आदिवासी जनता का टकराव परिवर्तन की ताकतों से हो रहा है. अंतत: क्या होगा? देश अगर तरक्की करेगा तो व्यापक पैमाने पर औद्योगीकरण होगा ही. कृषि का मोड-ऑफ प्रोडक्शन ऐसा नहीं है जो विकास की गति को पर्याप्त ईन्धन प्रदान कर सके. अत: जिस प्रकर से सम्पत्ति सामान्यत: उस ओर जाती है जहां उसमें अधिकतम वृद्धि होती है, उसी प्रकार जमीन भी सामान्यत: उस ओर जायेगी, जिस ओर अधिकतम उत्पादन होगा.

मैं जानता हूं कि मेरे उक्त पैराग्राफ से बहुत से किसान/आदिवासी के पक्षधर अपना फन उठाने लगे होंगे. अत: मै स्वयम न लिख कर स्टीफन कोवी की कालजयी पुस्तक “The 8th Habit” के दूसरे अध्याय का सम्पादित अनुवाद प्रस्तुत करता हूं. इससे वर्तमान दशा की समझ में बड़ी अच्छी इनसाइट मिलेगी:

जब इंफ्रास्ट्रक्चर का रूप बदलता है, सब कुछ धसकने लगता है. स्टान डेविस.

हम विश्व इतिहास के एक बहुत महत्वपूर्ण संक्रमण के गवाह बन रहे हैं. इसपर पीटर ड्रकर ने कहा है: “….इतिहास में पहली बार बहुत से (और तेजी से बढ़ती संख्या में) लोगों के पास विविध विकल्प (च्वाइस) आते जा रहे हैं, और लोगों को आगे स्वयम अपना प्रबन्धन करना होगा. … लोग/समाज इसके लिये तनिक भी तैयार नहीं है.
हम उक्त कथन का महत्व समझने को सभ्यता के विकास की 5 अवस्थायें देखें :

  1. शिकारी/घुमंतू मानव
  2. कृषि पर निर्भर जीवन
  3. औद्योगिक समाज
  4. सूचना/नॉलेज वर्कर का युग
  5. बौद्धिक युग (भविष्य की अवस्था)

शिकारी से कृषि युग में मानव के परिवर्तन को लें. शिकारी मानव को अपार कष्ट हुआ होगा कृषक बनने में. उसने धरती खोद कर बीज डाले होंगे और कुछ नहीं हुआ होगा. वह दूसरे सफल कृषक को देख कर विलाप कर रहा होगा न मेरे पास औजार हैं, न दक्षता! धीरे धीरे उसने सीखा होगा. उसके बाद उसकी उत्पादकता 50 गुणा बढ़ गयी होगी. फिर कृषि पर निर्भरता ने 90% शिकारी मानवों की छुट्टी कर दी होगी.

ऐसा ही कृषि और औद्योगिक युग में ट्रांजीशन में हुआ. धीरे धीरे लोगों ने औद्योगिक युग की तकनीक – विशेषज्ञ होना, काम का बंटवारा, कच्चेमाल की प्रॉसेसिंग और असेम्बली लाइन के तरीके सीखने प्रारम्भ किये. इससे उत्पादकता कृषि उत्पादकता से 50 गुणा बढ़ जाती है. एक किसान क्या कहेगा? वह शायद असुरक्षा और ईर्ष्या से भर जाये. पर अंतत: वह नयी मनस्थिति और नये औजारों का प्रयोग सीखता है/सीखेगा. इस प्रक्रिया में 90% कृषक समाप्त हो जायेंगे. आज अमेरिका में केवल 3% लोग पूरे देश ही नहीं, दुनियां के बाकी हिस्सों के लिये भी अन्न का उत्पादन कर रहे हैं. कृषि में भी औद्योगिक युग की तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं वे.

उसी तरह सूचना/नॉलेज वर्कर औद्योगिक युग से 50 गुणा अधिक उत्पादन करेंगे. सूचना/नॉलेज वर्कर का यह हाल है कि नाथन माईहर्वोल्ड, माइक्रोसॉफ्ट के भूतपूर्व मुख्य तकनीकी अधिकारी कहते हैं एक दक्ष सॉफ्टवेयर डेवलपर औसत सॉफ्टवेयर डेवलपर से 10 नहीं, 100 नहीं, 1000 नहीं, 10,000 गुणा अधिक उत्पादक है!

आप अन्दाज लगा सकते हैं – सूचना/नॉलेज वर्कर औद्योगिक समाज के 90% कर्मियों की छुट्टी कर देंगे.

कितनी प्रचण्ड छटनी होगी कर्मियों की. अंतत: समाज को नया माइण्ड सेट, नया स्किल सेट, नया टूल सेट अपनाना ही होगा.

अर्नाल्ड टोयनबी इसे बड़े सटीक तरीके से बताते हैं अभूतपूर्व असफलता के बीज सफलता में निहित हैं. अगर आपके पास चुनौती है और आपका रिस्पांस उसके बराबर है तो आप सफल होते हैं. पर उसके बाद अगर नयी चुनौती आ जाये और आपका रिस्पांस पहले जैसा है तो आपकी असफलता लाजमी है.

समस्या यही है. हम तेजी से औद्योगिक और सूचना/नॉलेज वर्कर के युग में कदम रख रहे हैं पर हमारी मानसिकता कृषि युग की है. इस मानसिकता से पार पाना ही होगा.

(स्टीफन कोवी यह जिस अध्याय में लिखते है उसका शीर्षक है – प्रॉबलम – समस्या. अगला अध्याय सॉल्यूशन – समाधान का है. वह पढ़ने के लिये आप पुस्तक पर जायें. आपका पढ़ना व्यर्थ नही जायेगा.)

निजी सम्पत्ति – नन्दीग्राम – साम्यवाद – कार्पोरेट कल्चर

April 8, 2007

टाइटल में चार समूहों में शब्द हैं। ये चारों एक दूसरे से जुडे हैं। नन्दीग्राम का बवाल निजी सम्पत्ति को सरकार द्वारा कब्जा कर लेने के यत्न से उपजी किसानों की कुंठा का हिंसात्मक प्रदर्शन है। साम्यवाद निजी सम्पत्ति को अहमियत नहीं देता है। यह अलग बात है की चीन की संसद ने पिछले महीने यह तय किया है कि निजी सम्पत्ति को वैधानिक दर्जा दिया जाये और निजी सम्पत्ति सार्वजनिक सम्पत्ति के समतुल्य मानी जाये। यह कानून अक्तूबर से लागू होगा। इससे साम्यवादी अवधारणा, वस्तुत:, ध्वस्त हो जाती है। निजी सम्पत्ति का विचार ‘वेल्थ क्रियेशन’ की मूल अवधारणा है। अगर साम्यवादी सरकार बंगाल में किसानो और उद्योगपतियों को आपस में सौदा कराने देती और केवल फेसिलिटेटर का रोल अदा करती तो बवाल नहीं होता।

कई लोग साम्यवाद/समाजवाद बनाम कारपोरेट कल्चर की बहस छेड़े बैठे हैं। ये लोग बहुत पढे-लिखे है और बौद्धिकता के प्रसंग मे बहुत नेम-ड्रापिन्ग करते हैं। पर विद्वानों के नाम और कोटेशन भर से कुछ सिद्ध नहीं होता। वाहवाही भले मिल जाती हो। बावजूद इसके कि भारत में गरीबी हटाने के नारों पर कई चुनाव जीते गए है; उन नारों से समृद्धि नहीं बढ़ी। नारा देने वाले जरुर सम्पन्न हो गए। एक नुकसान यह हुआ की गरीब-किसान को सब्सिडी की बैसाखी थमा देने से वह पंगु हो गया। किसान को कर्ज दते समय; कर्ज वापस करना है – की अनिवार्यता नहीं समझाई जाती। जब कर्जा पटाने की बारी आती है तो आत्म हत्या के विकल्प के अलावा तैयारी नहीं होती। हो सकता है मेरा यह तर्क अति सरलीकृत हो – पर यह अंशत: सच तो है ही। उद्यम करने से से नहीं, समृद्धि के बंटवारे से खुशहाली आएगीयह समाजवादी सोच अपनी मौत स्वयं बुलाने का उपक्रम है कार्पोरेट कल्चर समृद्धि बढ़ाने को प्रतिबद्ध होती है। वह यह भी मान कर चलती है की समृद्धि बढने की संभावनाएं अनंत हैं।

मैं यह भी महसूस करता हूँ की कार्पोरेट कल्चर में भारत की परिस्थितियों के अनुसार नए प्रयोग होने चाहियें। हमारी संस्कृति की रिचनेस को देखते हुये बहुत संभावनाएं है। भारत में पारिवारिक कार्पोरेशन बहुत हैं। इनके लाभ भी है व नुकसान भी। इसपर बहस होनी चाहिये। कार्पोरेट कल्चर इस तरह की हो की मध्य वर्ग को बेहतर पनपने का मौका मिले और दलित मध्य वर्ग को (आरक्षण व सरकार की बैसाखी से नहीं, वरन एक सकारात्मक सोच से) नया जोश मिल पाये। मजदूरों की मध्य वर्ग में वर्टिकल एंट्री और तेज हो। पारदर्शिता के नए आयाम खुल पायें। भगवद्गीता और अन्य भारतीय ग्रंथों में प्रबंधन के अनेक तरीके हैं जो हमारी संस्कृति के ज्यादा अनुकूल हैं। उनपर कर्पोरेशनों में और प्रबंधन के संस्थानों मे नयी दृष्टि पड़नी चाहिये.

आगे होगा यही – लोग कार्पोरेट कल्चर से समृद्धि पाएंगे और बौद्धिक मनोविनोद के लिए (या अपने को बुद्धिजीवी प्रमाणित करने के लिए) गरीबी/साम्यवाद/समाजवाद से सम्बद्ध मुद्दों पर भागीदारी करेंगे। ऐसा करने वाले वे अकेले नहीं है। बहुत लोग समग्र रुप से यह आज कर भी रहे हैं।

धन पर श्री अरविन्द

March 25, 2007


भारतीय मनीषियों व दार्शनिकों ने धन पर बहुत सकारात्मक नहीं लिखा है. माया महा ठगिनी है यही अवधारणा प्रधान रही है. धन को साधना में अवरोध माना गया है. स्वामी विवेकानन्द ने तो अपने गुरु के साथ उनके बिस्तर के नीचे पैसे रख कर उनके रिस्पांस की परीक्षा ली थी.

धन के दैवीय होने की बात तो श्री अरविन्द ने ही की है.

श्री अरविन्द की छोटी सी, पर अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक है माता (The Mother). इसके चौथे अध्याय में धन पर चर्चा है. मैं इसका पहला पैरा आपके सामने रखता हूं:


धन एक विश्वजनीन शक्ति का स्थूल चिन्ह है. यह शक्ति भूलोक में प्रकट हो कर प्राण और जड़ के क्षेत्रों में काम करती है. बाह्य जीवन की परिपूर्णता के लिये इसका होना अनिवार्य है. इसके मूल और इसके वास्तविक कर्म को देखते हुये, यह शक्ति भगवान की है. परंतु भगवान की अन्यान्य शक्तियोंके समान यह शक्ति भी यहां दूसरों को सौप दी गयी है और इस कारण अध:प्रकृति के अज्ञानान्धकार में इसका अहंकार के काम में अपहरण हो सकता है अथवा असुरोंके प्रभाव में आकर विकृत होकर यह उनके काम आ सकती है. मानव अहंकार और असुर जिन तीन शक्तियों से सबसे अधिक आकर्षित होते हैं और जो प्राय: अनाधिकारियों के हाथ में पड़ जाती हैं तथा ये अनाधिकारी जिनका दुरुपयोग ही करते हैं, उन्ही आधिपत्य, धन और काम इन तीन शक्तियों में से एक शक्ति है धन. धन के चाहने या रखने वाले धन के स्वामी तो क्या होते हैं, अधिकतर धन के दास ही होते हैं…..

श्री अरविन्द की पुस्तक का यह अध्याय धन के विषय मे‍ हमारी कई रूढ़ियां दूर करता है. धन के प्रति आसक्ति और अरुचि दोनों ही अहंकारी या आसुरी स्वभाव हैं. हम दरिद्रता में हों तो वेदना न हो और भोग विलास में हों तो असंयम के दास न हों – जब यह सही एटीट्यूड रख कर धन का अर्जन ईश्वरीय कार्य के लिये करेंगे तभी श्रेयस्कर होगा.

आपने न पढ़ी हो तो कृपया यह पुस्तक पढें.

टाटा डकैत तो नहीं है

March 10, 2007

अज़दक जी बहुत बढ़िया लिखते हैं. हमें तो लिखने का एक महीने का अनुभव है, सो उनकी टक्कर का लिखने की कोई गलतफ़हमी नहीं है. लेकिन सोचने में फर्क जरूर है. अपने चिठ्ठे में अजदक ने सिंगूर में टाटा के प्लान्ट के लिये हो रहे जमीन के अधिग्रहण को बदनीयती, धांधली, “जनता का पैसा लुटा कर जनहित का नाटक”, जमीन का हड़पना (पढें – डकैती) आदि की संज्ञा दी है.

अब टाटा डकैत तो नहीं है.

पैसा कमाने के दो तरीके हो सकते हैं. एक है डकैती का. यह तरीका इस सिद्धान्त पर टिका है कि धन finite वस्तु है. अगर आपको पैसा चाहिये तो, वह जिनके पास है (व जो ताकतवर नही हैं), उनसे आपको बल पूर्वक छीनना होगा. अजदक के अनुसार यही हो रहा है. इस सिद्धान्त का प्रयोग चोर, पाकेटमार, डकैत, कालाबाजारी करने वाले और कई देश के नेता लोग (ज्ञात स्रोत से ज्यादा सम्पत्ति के मामले वाले लोग इसका उदाहरण हैं) करते है.
पैसा कमाने का दूसरा तरीका इस सिद्धांत पर टिका है कि पैसा असीमित है. उसी तरह जैसे प्रेम, दया, करुणा, प्रसन्न्ता आदि असीमित हैं. पैसा चाहिये तो वह करना होगा जिससे समग्र रूप से वह बढ़े. बिल गेट, टाटा और कई धनी इस सिद्धान्त से पैसा कमाते हैं.
समाजवाद मेरी समझ में नहीं आता. मान लीजिये आज आप पूरी दुनिया की सम्पदा सभी लोगों मे बराबर बांट दें. क्या होगा? कुछ समय के लिये आमोद-प्रमोद और सीधे consumption से जुडा व्यवसाय जूम कर जायेगा, पर दुनिया की समग्र अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आ जायेगी. दो साल बाद समग्र सम्पदा (जो आज की सम्पदा से कम होगी) फिर उसी अनुपात में बंट जायेगी, जिसमें आज है.
जरूरत धन के समाजवादी बंटवारे की नहीं, धन की समग्र मात्रा बढाने वालों की है. किसान को आप सशक्त बनायें पर टाटा को डकैत बता कर नहीं.
(डिस्क्लेमर – मैं टाटा के पे रोल पर नहीं हूं व टाटा मोटर्स के शेयर भी मेरे पास नहीं हैं. मैं मानवीय सहानुभूति किसानों से रखता हूं. पर उनका कल्याण किसमें है – इसका ब्लूप्रिन्ट मुझे स्पष्ट नहीं है.)

शेयर मार्केट धड़ाम

February 28, 2007

उधर चिदंबरम जी बजट भाषण की तैयारी कर रहे थे, इधर शेयर मार्केट दुबला हुआ जा रहा था. मुन्ना का कहना सही है – भैया, बहुत से दिन सांड़ों के होते हैं; कभी कभी तो भालुओं की भी चांदी कटनी चाहिये. मुन्ना धुर आशावादी है. मैं शेयर मार्केट के बारे में बात कर आशावाद का टानिक उससे लेता हूं. मेरा शेयर मार्केट में ज्यादा स्टेक नहीं है, सो थोडा बहुत तात्कालिक घाटा आशावाद के टानिक के लिये अच्छा है. मुन्ना से बात कर मैं अपने स्टॉक की नैसर्गिक मजबूती के बारे में आश्वस्त हो कर ’मस्त’ हो जाता हूं. बजट की चीर फाड़ की जहमत नहीं उठाता.
चीनी के शेयर अर्से से धडाम हैं. मुझे शरद पवार की सेहत की सलामती और एथेनाल की स्टोरी पर भरोसा है. मुझे यह भी भरोसा है कि देर सबेर पेट्रोल के दाम बढेंगे ही. चीनी भी कब तक कड़वी रहेगी. इसी तरह टाटा का कोरस का सौदा भी रंग लायेगा. हीरो होण्डा की बाइक बिकेगी. महाराष्ट्र स्कूटर की जमीन चमकेगी….
शेयर बाजार धड़ाम होता है, चढने के लिये. असली चीज आशावाद है. मैं मुन्ना का टानिक लेना छोड़ूंगा नहीं.
(फोटो – २८ फरवरी का गंगा तट पर आशावादी सवेरा)