Archive for the ‘पुस्तक’ Category

रुपये की पांचवी चवन्नी कहां है?

July 3, 2007

बिग बाजार पर किशोर बियाणी की किताब* ने विभिन्न प्रांतों मे लोगों की खुदरा खरीद की अलग-अलग आदतों पर प्रकाश डाला है. वह विवरण बहुत रोचक है. मैं उस अंश का मुक्त अनुवाद पेश करता हूं -

जैसे-जैसे हमने नये शहरों और नये लोगों को सेवा देनी प्रारम्भ की, हमें यह अहसास हो गया कि हम अपने हर स्टोर को एक से नियम या तरीके से नहीं चला सकते. खरीददारी स्थानीय अनुभव और आदत है. नुक्कड़ की दुकान से बड़े शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, सेल्फ सर्विस, आधुनिक आउटलेट में अपने को रूपांतरित करना इस बेसिक आदत में बदलाव मांगता है. यह बदलाव अलग-अलग समुदायों में अलग-अलग प्रकार से होता है. इसलिये हमारे लिये न केवल यह अनिवार्य हो जाता है कि हम हर समुदाय को समझें वरन अपने स्टोर के स्तर पर उस समझ के अनुसार निर्णय लें और फेरबदल करें.

उदाहरण के लिये हमने गुजरात में अपना स्टोर खोला भी न था कि हमें खुदरा व्यापार के स्थानीय मजाक से वाकिफ होना पड़ा. खुदरा व्यापारी वहां कहते हैं कि गुजराती ग्राहक यह सवाल पूछने का आदी है कि मेरे रुपये की पांचवीं चवन्नी कहां है? यही कारण है कि बहुत से खुदरा व्यापारी गुजरात को भारतीय रिटेल का वाटरलू मानते हैं. यह कहा जाता है कि अगर कोई गुजरात में सफल हो गया तो भारत में कहीं भी सफल हो जायेगा.

अपना स्टोर गुजरात में लॉंच करने पर हमने पाया कि गुजराती माणस न केवल जबरदस्त वैल्यू-कांशस है बल्कि उसकी खरीददारी की आदतें विलक्षण हैं जो भारत के और हिस्सों में नही मिलतीं. जहां अनाज खरीदने की बात हो, गुजराती आदमी/औरत साल भर की खरीद एक साथ करने में यकीन करते हैं. अनाज अट्टाल में संग्रह करने की प्रवृत्ति पूरे गुजरात में है. चूकि गुजराती महिला साल भर का अनाज एक साथ खरीदती है, वह चाहती है कि उसे पर्याप्त छूट मिले, सामान घर तक पंहुचाया जाये और बिक्री उधारी पर हो! जब वह साल भर का अनाज एक साथ खरीदने आती है तो चाहती है कि अनाज बिल्कुल वैसा ही हो या उसी खेत का हो जैसा पिछले साल उसने खरीदा था. यह सब रिटेल व्यापार के लिये काफी चुनौती भरा होता है. हमें सतत सृजनात्मकता का सहारा लेकर इस तरह की मांग को पूरा करना होता है. और जब हमने पाया कि हम इस चुनौती का सामना कर पाने में सफल हो रहे थे, तो हमें अपने सामने असीमित सम्भावनयें और विशाल बाजार नजर आने लगे.

लेकिन जैसे जैसे हम गुजरात से हट कर अन्य प्रांतों की तरफ जाते हैं, हमें स्पष्ट होता है कि हर जगह हर समुदाय की अपनी अलग मौलिकता है. बंगाल का ग्राहक व्यक्तिगत सम्बन्धों की अंतर्धारा की तलाश करता है और चल रही ब्राण्डों के प्रति बहुत अधिक प्रतिबद्ध है. इस लिये वहां एक नयी ब्राण्ड को खपाना कठिन काम है.

“इसके उलट पंजाब में ग्राहक के पास खर्च करने को बहुत अधिक इनकम है. इसके अलावा पंजाब बहुत थोड़े से प्रांतों मे है जहां बड़े पैमाने पर खर्च करने की वृत्ति के साथ किसी तरह का अपराध बोध लिपटा हुआ नहीं है. पर ग्राहक वहां किसी ब्राण्ड, उत्पाद या स्टोर के साथ घनिष्टता से चिपके नही हैं और बड़े पैमाने पर ब्राण्ड बदलने के प्रयोग करते हैं.

“इसलिये दोनो समुदाय अलग-अलग प्रकार से बेजोड़ सम्भावनायें और चुनौतियां पेश करते हैं.”

बस बाकी तो बियाणी अपने बिजनेस के तरीकों और रीटेल व्यवसाय के मॉडल की बात करने लगते हैं, जिसके लिये, आप चाहें तो सीधे किताब पढ़ सकते हैं.

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* It Happened In India by Kishore Biyani with Dipayan Baishya
Rupa & Co, Rs. 99.-

मुझे बिग-बाजार में क्या गलत लगता है?

June 26, 2007

मैं किशोर बियाणी की पुस्तक पढ़ रहा हूं इट हेपण्ड इन इण्डिया.* यह भारत में उनके वाल-मार्टिया प्रयोग का कच्चा चिठ्ठा है. कच्चा चिठ्ठा इसलिये कि अभी इस व्यवसाय में और भी कई प्लेयर कूदने वाले हैं. अंतत: कौन एडमण्ड हिलेरी और तेनसिंग बनेंगे, वह पता नहीं. पर बियाणी ने भारतीय शहरों में एक कल्चरल चेंज की शुरुआत तो कर दी है.

बिग बाजार के वातावरण का पर्याप्त इण्डियनाइजेशन हो गया है. वहां निम्न मध्यम वर्गीय मानस अपने को आउट-ऑफ-प्लेस नहीं पाता. वही नहीं, इस वर्ग को भी सर्विस देने वाला वर्ग – ड्राइवर, हैल्पर, घरमें काम करने वाली नौकरनी आदि, जिन्हे बियाणी इण्डिया-2 के नाम से सम्बोधित करते हैं भी बिग बाजार में सहजता से घूमता पाया जाता है. इस्लाम में जैसे हर तबके के लोग एक साथ नमाज पढ़ते हैं और वह इस्लाम का एक सॉलिड प्लस प्वॉइण्ट है; उसी प्रकार बिग बाजार भी इतने बड़े हेट्रोजीनियस ग्रुप को एक कॉम्प्लेक्स के नीचे लाने में सफल होता प्रतीत होता है.

पर मैं किशोर बियाणी का स्पॉंसर्ड-हैगियोग्राफर नहीं हूं. बिग-बाजार या पेण्टालून का कोई बन्दा मुझे नहीं जानता और उस कम्पनी के एक भी शेयर मेरे पास नही हैं. मैं बिग बाजार में गया भी हूं तो सामान खरीदने की नीयत से कम, बिग-बाजार का फिनामिनॉ परखने को अधिक तवज्जो देकर गया हूं.

और बिग-बाजार मुझे पसन्द नहीं आया.

मैं पड़ोस के अनिल किराणा स्टोर में भी जाता हूं. तीन भाई वह स्टोर चलाते हैं. हिन्दुस्तान लीवर का सुपरवैल्यू स्टोर भी उनके स्टोर में समाहित है. तीनो भाई मुझे पहचानते हैं और पहचानने की शुरुआत मैने नही, उन्होने की थी. अनिल किराणा को मेरे और मेरे परिवार की जरूरतें/हैसियत/दिमागी फितरतें पता हैं. वे हमें सामान ही नहीं बेंचते, ओपीनियन भी देते हैं. मेरी पत्नी अगर गरम-मसाला के इनग्रेडियेण्ट्स में कोई कमी कर देती है, तो वे अपनी तरफ से बता कर सप्लिमेण्ट करते हैं. मेरे पास उनका और उनके पास मेरा फोन नम्बर भी है. और फोन करने पर आवाज अनिल की होती है, रिकार्डेड इण्टरेक्टिव वाइस रिस्पांस सिस्टम की नहीं. मैं सामान तोलने की प्रॉसेस में लग रहे समय के फिलर के रूप में बिग-बाजार से उनके कैश-फ्लो पर पड़े प्रभाव पर चर्चा भी कर लेता हूं.

बियाणी की पुस्तक में है कि यह अनौपचारिक माहौल उनके कलकत्ता के कॉम्प्लेक्स में है जहां ग्राहक लाइफ-लांग ग्राहक बनते हैं और शादी के कार्ड भी भेजते हैं. (पुस्तक में नॉयल सोलोमन का पेज 89 पर कथन देखें – मैं अंग्रेजी टेक्स्ट कोट नहीं कर रहा, क्योंकि हिन्दी जमात को अंग्रेजी पर सख्त नापसन्दगी है और मैं अभी झगड़े के मूड में नहीं हूं). इलाहाबाद में तो ऐसा कुछ नहीं है. कर्मचारी/सेल्स-पर्सन ग्राहक की बजाय आपस में ज्यादा बतियाते हैं. ग्राहक अगर अपनी पत्नी से कहता है कि ट्विन शेविंग ब्लेड कहां होगा तो सेल्स-गर्ल को ओवर हीयर कर खुद बताना चाहिये कि फलानी जगह चले जायें. और ग्राहक बेचारा पत्नी से बोलता भी इस अन्दाज से है कि सेल्स-गर्ल सुनले. पर सेल्स-गर्ल सुनती ही नहीं! अनाउंसमेण्ट तो उस भाषा में होता है जो बम्बई और लन्दन के रास्ते में बोली जाती है इलाहाबाद और कोसी कलां के रास्ते नहीं.

परस्पर इण्टरेक्शन के लिये मैं अनिल किराना को अगर 10 में से 9 अंक दूंगा तो बिग बाजार को केवल 4 अंक. अनिल किराना वाला चीजों की विविधता/क्वालिटी/कीमतों मे किशोर बियाणी से कम्पीट नहीं कर पायेगा. पर अपनी कोर कम्पीटेंस के फील्ड में मेहनत कर अपनी सर्वाइवल इंस्टिंक्ट्स जरूर दिखा सकता है. ऑल द बेस्ट अनिल!

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It Happened In India

by Kishore Biyani with Dipayana Baishya

Roopa & Co, Rs. 99.

सिंगूर जैसी कशमकश और बढ़ेगी भविष्य में

June 11, 2007

सिंगूर और नन्दीग्राम, दिल्ली के पास के स्पेशल इकनॉमिक जोन, सरदार सरोवर … और भी कितने ऐसे प्रॉजेक्ट है जिनमें स्थानीय ग्रामीण/आदिवासी जनता का टकराव परिवर्तन की ताकतों से हो रहा है. अंतत: क्या होगा? देश अगर तरक्की करेगा तो व्यापक पैमाने पर औद्योगीकरण होगा ही. कृषि का मोड-ऑफ प्रोडक्शन ऐसा नहीं है जो विकास की गति को पर्याप्त ईन्धन प्रदान कर सके. अत: जिस प्रकर से सम्पत्ति सामान्यत: उस ओर जाती है जहां उसमें अधिकतम वृद्धि होती है, उसी प्रकार जमीन भी सामान्यत: उस ओर जायेगी, जिस ओर अधिकतम उत्पादन होगा.

मैं जानता हूं कि मेरे उक्त पैराग्राफ से बहुत से किसान/आदिवासी के पक्षधर अपना फन उठाने लगे होंगे. अत: मै स्वयम न लिख कर स्टीफन कोवी की कालजयी पुस्तक “The 8th Habit” के दूसरे अध्याय का सम्पादित अनुवाद प्रस्तुत करता हूं. इससे वर्तमान दशा की समझ में बड़ी अच्छी इनसाइट मिलेगी:

जब इंफ्रास्ट्रक्चर का रूप बदलता है, सब कुछ धसकने लगता है. स्टान डेविस.

हम विश्व इतिहास के एक बहुत महत्वपूर्ण संक्रमण के गवाह बन रहे हैं. इसपर पीटर ड्रकर ने कहा है: “….इतिहास में पहली बार बहुत से (और तेजी से बढ़ती संख्या में) लोगों के पास विविध विकल्प (च्वाइस) आते जा रहे हैं, और लोगों को आगे स्वयम अपना प्रबन्धन करना होगा. … लोग/समाज इसके लिये तनिक भी तैयार नहीं है.
हम उक्त कथन का महत्व समझने को सभ्यता के विकास की 5 अवस्थायें देखें :

  1. शिकारी/घुमंतू मानव
  2. कृषि पर निर्भर जीवन
  3. औद्योगिक समाज
  4. सूचना/नॉलेज वर्कर का युग
  5. बौद्धिक युग (भविष्य की अवस्था)

शिकारी से कृषि युग में मानव के परिवर्तन को लें. शिकारी मानव को अपार कष्ट हुआ होगा कृषक बनने में. उसने धरती खोद कर बीज डाले होंगे और कुछ नहीं हुआ होगा. वह दूसरे सफल कृषक को देख कर विलाप कर रहा होगा न मेरे पास औजार हैं, न दक्षता! धीरे धीरे उसने सीखा होगा. उसके बाद उसकी उत्पादकता 50 गुणा बढ़ गयी होगी. फिर कृषि पर निर्भरता ने 90% शिकारी मानवों की छुट्टी कर दी होगी.

ऐसा ही कृषि और औद्योगिक युग में ट्रांजीशन में हुआ. धीरे धीरे लोगों ने औद्योगिक युग की तकनीक – विशेषज्ञ होना, काम का बंटवारा, कच्चेमाल की प्रॉसेसिंग और असेम्बली लाइन के तरीके सीखने प्रारम्भ किये. इससे उत्पादकता कृषि उत्पादकता से 50 गुणा बढ़ जाती है. एक किसान क्या कहेगा? वह शायद असुरक्षा और ईर्ष्या से भर जाये. पर अंतत: वह नयी मनस्थिति और नये औजारों का प्रयोग सीखता है/सीखेगा. इस प्रक्रिया में 90% कृषक समाप्त हो जायेंगे. आज अमेरिका में केवल 3% लोग पूरे देश ही नहीं, दुनियां के बाकी हिस्सों के लिये भी अन्न का उत्पादन कर रहे हैं. कृषि में भी औद्योगिक युग की तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं वे.

उसी तरह सूचना/नॉलेज वर्कर औद्योगिक युग से 50 गुणा अधिक उत्पादन करेंगे. सूचना/नॉलेज वर्कर का यह हाल है कि नाथन माईहर्वोल्ड, माइक्रोसॉफ्ट के भूतपूर्व मुख्य तकनीकी अधिकारी कहते हैं एक दक्ष सॉफ्टवेयर डेवलपर औसत सॉफ्टवेयर डेवलपर से 10 नहीं, 100 नहीं, 1000 नहीं, 10,000 गुणा अधिक उत्पादक है!

आप अन्दाज लगा सकते हैं – सूचना/नॉलेज वर्कर औद्योगिक समाज के 90% कर्मियों की छुट्टी कर देंगे.

कितनी प्रचण्ड छटनी होगी कर्मियों की. अंतत: समाज को नया माइण्ड सेट, नया स्किल सेट, नया टूल सेट अपनाना ही होगा.

अर्नाल्ड टोयनबी इसे बड़े सटीक तरीके से बताते हैं अभूतपूर्व असफलता के बीज सफलता में निहित हैं. अगर आपके पास चुनौती है और आपका रिस्पांस उसके बराबर है तो आप सफल होते हैं. पर उसके बाद अगर नयी चुनौती आ जाये और आपका रिस्पांस पहले जैसा है तो आपकी असफलता लाजमी है.

समस्या यही है. हम तेजी से औद्योगिक और सूचना/नॉलेज वर्कर के युग में कदम रख रहे हैं पर हमारी मानसिकता कृषि युग की है. इस मानसिकता से पार पाना ही होगा.

(स्टीफन कोवी यह जिस अध्याय में लिखते है उसका शीर्षक है – प्रॉबलम – समस्या. अगला अध्याय सॉल्यूशन – समाधान का है. वह पढ़ने के लिये आप पुस्तक पर जायें. आपका पढ़ना व्यर्थ नही जायेगा.)

“काशी का अस्सी” के रास्ते हिंदी सीखें

May 12, 2007

कशीनाथ सिंह जी की काशी का अस्सी पढ़ने के बाद जो एक खुन्दक मन में निरंतर बनी है वह है मेरे पुरखों और मां-पिताजी ने भाषा तथा व्यवहार की इतनी वर्जनायें क्यों भर दीं मेरे व्यक्तित्व में. गालियों का प्रयोग करने को सदा असभ्यता का प्रतीक बताया गया हमारे सीखने की उम्र में. भाषा का वह बेलाग पक्ष जिन्दगी में आ ही नहीं पाया. और अगर काशी का अस्सी छाप भाषा अपने पास होती तो अकेले थोड़े ही होती? साथ में होती अलमस्त जीवन पद्यति. वह जो अस्सी/बनारस की पहचान है.

मुझे अपने कुली-जमादार नाथू की याद हो आती है. नाथू 60-70 कुलियों का सरगना था. स्टेशन पर पहुंचते ही मेरी अटैची ढ़ोने को जाने कहां से अवतरित हो जाता था. उसकी भाषा का यह हाल था कि वाक्य के आदि-मध्य-अंत में मानव के दैहिक सम्बन्धों का खुला वर्णन करने वाले शब्दों (अर्थात गाली) का सम्पुट अवश्य होता था. हमसे सम्प्रेषण में बेचारा बड़ी मुश्किल से उन शब्दों को अलग कर बात कर पाता था. पर ह्यूमेन क्वालिटी और लीडरशिप में अच्छे-अच्छे पढ़े-लिखे साभ्रांत पानी भरते नजर आयेंगे उसके सामने.

इसलिये मित्रों, अच्छी भाषा आपको अच्छा मनई बनाती हो; यह कतई न तो नेसेसरी कण्डीशन है, न सफीशियेण्ट ही. आप अच्छी भाषा से अच्छे ब्लॉगर भले ही बन जायें!

मैने अपनी पत्नी से (जिनकी पैदाइश बनारस की है) साफ-साफ पूछ लिया है कि क्या काशी का अस्सी की भाषा सही मायने में बनारस/अस्सी की रोजमर्रा की भाषा है? उन्होने कहा बिल्कुल. और यह भी जोड़ा कि लड़की होने पर भी यह सुनने में कुछ अटपटा नहीं लगता था. जो संस्कृति का अंग है सो है।


हंसी धीरे-धीरे खत्म हो रही है दुनिया से. पश्चिम के लिये इसका अर्थ रह गया है कसरत, खेल. क्लब, टीम, एसोसियेशन, ग्रुप बना कर निरर्थक, निरुद्देश्य, जबरदस्ती जोर-जोर से हो-हो-हा-हा करना. इसे हंसी नहीं कहते. हंसी का मतलब है जिन्दादिली और मस्ती का विस्फोट, जिन्दगी की खनक. यह तन की नहीं, मन की चीज है….
—– काशी का अस्सी के बैक कवर से.

बन्धुओं, अगर कुछ ब्लॉग केवल वयस्कों के लिये होते तो मैं काशी का अस्सी के अंश जरूर लिखता भले ही वह लिखना मुझे बुरी हिन्दी वाला केटेगराइज्ड कर देता. फिलहाल मैं अनुरोध ही कर सकता हूं कि 75 रुपये के राजकमल प्रकाशन के पेपरबैक में काशी का अस्सी पढ़ें। वैसे हार्ड बाउण्ड में भी बुरा सौदा नहीं है।

असली खुशी की दस कुंजियां

April 23, 2007

मैं रेलवे स्टेशन पर जीने वाले बच्चों पर किये गये एक सर्वेक्षण के आंकड़ों से माथापच्ची कर रहा था. उस पर लेखन रेलगाड़ी वाले ब्लॉग पर देखें.

जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा चौंकाया; वह थी कि 68% बच्चे अपनी स्थिति से संतुष्ट थे. बुनियादी जरूरतों के अभाव, रोगों की बहुतायत, पुलीस का त्रास, भविष्य की अनिश्चितता आदि के बावजूद वे अगर संतुष्ट हो सकते हैं, तो प्रसन्नता का विषय उतना सरल नहीं, जितना हम लोग मान कर चलते हैं.

अचानक मुझे याद आया कि मैने प्रसन्नता के विषय में रीडर्स डायजेस्ट में एक लेख पढ़ा था जिसमें कलकत्ता के अभाव ग्रस्त वर्गों में प्रसन्नता का इंडेक्स ऊंचा पाया गया था. मैने उस लेख का पावरप्वाइंट भी तैयार किया था. कम्प्यूटर में वह मैने ढूंढा और रविवार का सदुपयोग उसका हिन्दीकरण करने में किया.

फिलहाल आप, असली खुशी की दस कुंजियां की फाइल का अवलोकन करें. इसके अध्ययन से कई मिथक दूर होते हैं. कहीं-कहीं यह लगता है कि इसमें क्या नयी बात है? पर पहले पहल जो बात सरल सी लगती है, वह मनन करने पर गूढ़ अर्थ वाली हो जाती है. धन किस सीमा तक प्रसन्नता दे सकता है; चाहत और बुद्धि का कितना रोल है; सुन्दरता और सामाजिकता क्यों महत्वपूर्ण हैं; विवाह, धर्म और परोपकार किस प्रकार प्रभावित करते हैं और बुढ़ापा कैसे अभिशाप नहीं है यह आप इस डाउन लोड में पायेंगे।

(चिन्ह पर क्लिक कर डाउन लोड करे)

नमामि देवि नर्मदे – गंगा किनारे नर्मदा की याद

April 12, 2007

मैंने अपने जीवन का बहुमूल्य भाग नर्मदा के सानिध्य में व्यतीत किया है। रतलाम मे रहते हुये ओँकारेश्वर रोड स्टेशन से अनेक बार गुजरा हूँ। पर्वों पर ओंकारेश्वर के लिए विशेष रेल गाडियां चलाना और ओंकारेश्वर रोड स्टेशन पर सुविधाएं देखना मेरे कार्य क्षेत्र में आता था। नर्मदा की पतली धारा और वर्षा में उफनती नर्मदा – दोनो के दर्शन किये हैं। यहाँ नर्मदा के उफान को देख कर अंदाज लगा जाता था की ३६ घन्टे बाद भरूच में नर्मदा कितने उफान पर होंगी और बम्बई-वड़ोदरा रेल मार्ग अवरुद्ध होने की संभावना बनती है या नहीं।

रतलाम में अखबारों में नर्मदा का जिक्र किसी किसी रुप में होता ही रहता थाबाँध और डूब का मुद्दा, पर्यावरण के परिवर्तन, नर्मदा के किनारे यदा कदा मगरमच्छ का मिलनायह सब रोज मर्रा की जिंदगी की खबरें थीएक बार तो हमारे रेल पुल पर काम करने वाले कुछ कर्मचारी नर्मदा की रेती पर सोये थे, रात में पानी बढ़ा और सवेरे उन्होंने अपने को चारों ओर पानी से घिरे एक टापू में पायाउनका कुछ नुकसान नहीं हुआ पर उस दिन की हमारी अनयूजुअल पोजीशन में एक रोचक एंट्री के रुप में यह घटना छपी
(वेगड जी का नर्मदा तट का एक रेखाचित्र जो उनकी पुस्तक में है)

नर्मदा माई को दिल से जोड़ने का काम किया अमृतलाल वेगड जी की किताब – सौन्दर्य की नदी नर्मदा“* नें. यह पुस्तक बहुत सस्ती थी – केवल ३० रुपये में। पर यह मेरे घर में बहुमूल्य पुस्तकों में से एक मानी जाती है। इसके कुछ पन्ने मैं यदा-कदा अपनी मानसिक उर्वरता बनाए रखने के लिए पढ़ता रहता हूँ। पुस्तक में वेगड जी की लेखनी नर्मदा की धारा की तरह – संगीतमय बहती है। और साथ में उनके रेखाचित्र भी हैं – पुस्तक को और भी जीवन्तता प्रदान करते हुये।
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* मध्यप्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी, भोपाल द्वारा प्रकाशित

किस्सा पांडे सीताराम सूबेदार और मधुकर उपाध्याय – पुन: पोस्ट

April 10, 2007

बहुत पहले जब बीबीसी सुना करता था, मधुकर उपाध्याय अत्यंत प्रिय आवाज हुआ करती थी. फिर उनकी किताब किस्सा पांडे सीताराम सूबेदार की समीक्षा वर्ष २००० मे रतलाम में पढी समीक्षा इतनी रोचक लगी कि वह पुस्तक दिल्ली से फ्रंटियर मेल के कंडक्टर से मंगवाई

पहले बात मधुकर जी की कर ली जाये मधुकर जी से मैं व्यक्तिगत रुप से जान-पहचान नहीं रखता हूँ उनको बीबीसी पर सुनता था,वही परिचय है उनकी आवाज अत्यन्त मधुर है बीबीसी सुनना बंद हो गया तो उनसे भी कट गया उनके बीबीसी पर भारतीय स्वातंत्र्य के १५० वर्ष होने पर धारावाहिक शृंखला में बोलने और उनकी दांडी यात्रा पुन: करने के विषय में काफी सामग्री मैंने अखबार से काट कर रखी थी, जो अब इधर- उधर हो गयी है वर्ष २००३-०४ मे उन्हें टीवी चैनल पर समाचार पत्रों की समीक्षा में कई बार देखा था उनके व्यक्तित्व में ओढ़ी दार्शनिकता या छद्म-बौद्धिकता के दर्शन नही हुये, जो आम पढ़े-लिखे (और सफ़ल?) भारतीय का चरित्र है फिर पता चला कि मधुकर लोकमत समाचार के ग्रुप एडीटर हो गए हैं अभी व्हिस्पर न्यूज़ में था कि वहाँ से त्यागपत्र दे दिया है पता नही सच है या नही अखबारों में जो बाजार हथियाने की स्पर्द्धा चला रही है, वहा निश्चय ही तनाव देने वाली रही होगी खैर, पुस्तक पर छपे के अनुसार वे मेरे समवयस्क होंगे अगर ईश्वर अपना मित्र चुनने की आजादी देते हों तो मैं मधुकर उपाध्याय को चुनना चाहूँगा

किस्सा पांडे सीताराम सूबेदार (१७९७-१८८०) कम्पनी और फिर अंग्रेज सेना के एक सिपाही की आत्म कथा है जो सूबेदार बन कर पेंशन याफ्ता हुये सीताराम अवध के थे और उन्होने अपनी आत्म कथा अवधी में वर्ष १८६०-१८६१ मे लिखी इसका कालांतर में जेम्स नोर्गत ने अगेजी मे अनुवाद किया यह पुस्तक अत्यंत महत्वपूर्ण हैअंग्रेजों के शासन काल में ब्रिटिश सेना की नौकरी के इच्छुक लोगों के लिए यह अनिवार्य था कि वे यह पुस्तक पढ कर परीक्षा पास करें

सीताराम पांडे वास्तव में थे और उन्होंने यह पुस्तक अवधी में लिखी थी, यह मधुकर जी की पुस्तक की प्रस्तावना से स्पष्ट हो जाता है सन १९१५ में सर गिरिजाशंकर वाजपेयी ने अपने सिविल सेवा के इन्टरव्यू में यह कहा था कि सीताराम पांडे ने यह किताब उनके दादा को दी थी और उन्होने यह किताब पढी है पर उसके बाद यह पाण्डुलिपि गायब हो गयी और मधुकर जी काफी यत्न कर के भी उसे ढूढ़ नहीं पाये तब उन्होने इस पुस्तक को अवधी मे पुन: रचने का कार्य किया मेरे जैसे अवधी से कट गए व्यक्ति को अपनी जड़ों से जोड़ने में इस पुस्तक की बड़ी भूमिका है. मैं मधुकर जी की प्रस्तावना से अन्तिम वाक्यांश उधृत करना चाहूँगा – ‘…लाभ उन लोगों को भी हो सकता है जो इस क्षेत्र के तो हैं पर अपनी बोली से कट गए हैं उम्मीद है कि यह किताब आपको पसंद आयेगी

पुस्तक के आभार पृष्ठ से:
सीताराम सूबेदारकी कहानी मेरे लिए एक सपने की तरह थी जिसे लेकर मैं कई साल जिया।…..” – मधुकर उपाध्याय

किस्सा पांडे मुझे यह भी अहसास कराती है कि सोच-समझ या उत्कृष्टता पढे-लिखे बुद्धिजीवियों कि बपौती नहीं है मेरे गांव के छोटे किसान अवधबिहारी तिवारी जब यह कहते हैंभइया खेत-जमीन के लग्गे खड़ा होए पर जमीन खुदै फ़सल हाल कहथ‘; तब मुझे सीताराम पांडे जैसे चरित्र कि याद हो आती है. इस किताब में इसी तरह के विचार हैं जो सीतारामजी ने बिना लागलपेट के लिखे हैं

किस्सा पांडे का किस्सा शुरू होता है गांव से पांडे के पैदल आगरा जा कर सिपाही के रूप में भारती होने से रस्ते में ठगी प्रथा से रूबरू होने का चित्रण भी है पुस्तक में सीताराम पांडे की सात बड़ी लड़ाइयां और छः बार गम्भीर घायल होना भी है ग़दर में उनके अपने बेटे के बाग़ी के रुप में पकडे जाने और उसको गोली मरने के लिए पांडेजी को ही आदेशित होने का प्रसंग भी है ग़दर क्यों हुआइसपर पांडेजी के विचार भी है मैं पुस्तक के छोटे-छोटे अंश आपके समक्ष रखता हूं

ठगी का प्रसंग:
….रात मा जब हमरे सब रुकेन तौ हमैं इहै सोचि-सोचि कै बहुत देर तक नींद नहीं कि सब ठग हैं! हम जागै कै पूरी कोसिस किहेन लेकिन थोडी देर बाद सो गयन! कुछै देर बीता कि हमार आंख मुर्गा के बांग अस आवाज से खुलि गय! हम उठि के बैठ गयन तो देखेन कि मजदूरन मा से एक-दु मन हमरे लोगन के लगे हैं जे सोवत रहे! हम बहुत जोर से चिल्लायन और हमरे मामा तुरंतै तलवार कै उनकी ओर लपके! सब पलक झपकत भय लेकिन तब तक ठग देवनारायन के भा कै रेसम कै रस्सी से गट घोंटि चुका रहे और तिलकधारी का बेहोश दिहे रहे! मामा तिलकधारी के उपर खडे ठग का काट डारिन और तिलकधारी कै जान बचि गय! यतनी देर मा ठग हमरे मामा कै सोना वाली जंजीर चोरा लिहिन जेकर दाम अढा सौ रुपया रहा और तिलकधारी कै तमंचा लै उडै! वहि समय पहरा देय कै जिम्मेदारी तिलकधारी कै रही लेकिन वै सो गय रहे! ….

बेटे को गोली मरने का प्रसंग:
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एक दिन लखन के लगे एक घरे मा कयू जने पकरि लिहा ! वै सब सिपाही रहे! ओन्हैं पकरि कै, बान्हि कै हमरे रेजीमंट कै कमांडर के आगे पेस किहा गय और अगले रोज सबेरे आडर भय कि सबका गोली मारि दिही जाय! वहि समय फैरिंग पारटी हमरे जिम्मे रही! हम सिपहियन से ओनके नावं और रेजीमंट पूछेन! पांच-छह जने के बाद एक सिपाही वहि रेजीमंट कै नांव लिहिस जेहमा हमार बेटवा रहा! हम ओसे पुछेन कि का लैट कंपनी कै अनंती राम का जानत है कहिस कि वही कै नांव है! अनंती राम बहुत जने कै नांव होत है यहि मारे हम पहिले ज्यादा ध्यान नहिं दिहेन! दुसरे, हम पहिलेन मानि चुका रहेन कि हमार बेटउवा सिंध मा बुखार से मरि गय एहसे बात हमैं नहीं खटकी लेकिन जब कहिस कि ओकर गांव तिलो है तौ हमार करेजा हक्क से हो गय! का हमरै बेटवा रहा? यहि मा कौनौ सक नही रहि गय जब हमार नांव इकै कहिस कि वै हमरे बाबू आंय! फिर हमसे माफी मांगत हमरे गोडे पै गिरि परा! अपने रेजीमंट के बाकी सिपहियन के साथे गदर मा चला गय रहा और लखन गय रहा! एक दायं जौन होय रहा, हो गय; ओकरे बद का करत? अगर भगहूं चाहत तौ कहां जात?
ओन्हैं सब का संझा कै चार बजे गोली मारि जाय का रही अपने बेटवा का गोली मारै का काम हमहीं का करे का रहा! है किस्मत?……
(
खैर, पांडेजी को गोली नहीं मारनी पड़ी औरों की लाशें जंगल में फैक दी गईं पर वे अपने लडके का दाह संस्कार कर पाये वे अपने लडके से नाराज जरूर थे पर यह भी था कि बाग़ी होने पर भी उसे बेटा मान रहे थे।)

ग़दर के कारण पर विचार:
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गदर कै आग मुसलमान लगाइन और हिंदू भेडी यस ओनके पीछे-पीछे नदी मा चला ! बगावत कै असल कारन रहा कि सिपहिन का ताकत कै नसा हो गय रहा और अफसरन के लगे ओन्हैं रोकै कै ताकत नहीं रही! एसे सिपाही समझि लिहिन कि सरकार ओनसे डेरात है जबकि सरकार ओनपै भरोसा करत रही, यहि मारे कुछ नही कहत रही! लेकिन केहु के बेटवा बागी हो जाय तौ ओहका घरे से नहीं निकारि दीन जात! हमैं लागत है कि यहि गदर के लि बागी बेटवा का जौन सजा मिली है ओकर असर बहुत दिन तक रही …..

भ्रष्टाचार पर विचार:
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बरतानी अफसर सुनिकै बहुत गुस्सा हो जात हैं कि केहू घूस दिहिस है! ओसे पूछा जात है घूस काहे दिहिस! ओका सायद नहीँ पता होत कि मन इहै सोचि कै घूस देत है कि घूस कै कुछ पैसा साहब के लगे जात है! यही मारे साहब से कुछ कहत नही काहे कि चपरासी से इकै किलरक तक सब ओसे इहै कहत हैं कि इसा सहबौ गय है! हम यस कौनो दफ़्तर के बारे मा नहीं सुनेन जहां किलरक कहत होंय कि साहब घूस लेत हैं! वै चाहत हैं कि घूसखोरी चला करै काहे कि ओनकै तौ जिन्नगी यही से चलत है! हमरे गांव कै पटवारी एक रोज हमसे कहिस कि हमरै गलती रही हो जौन हम्मैं तरक्की नहीं मिली या यतनी देर से मिली!……

इसे बिलैती और हिंदुस्तानी सिपहियन मा खुब चलत है और घूस के मामला मा ओनमा कौनो फरक नहीं है! हम जानित है कि साहब लोग घूस नहीं लेते लेकिन हमसे ज्यादा पढा-लिखा कयू मन दावा से कहत हैं कि साहब लोग घूस लेत हैं! जब वै खुदै इहै काम करत हैं तौ और काव कहिहैं?…..
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क्या सीताराम पांडे आज की बात नहीं कर रहे? डेढ़ सदी बीत गयी पर भ्रष्ट आदमी का चरित्र नहीं बदला!)