Archive for the ‘राजनीति’ Category

बहुत अच्छा कहा खालिद मसूद जी!

June 16, 2007

पाकिस्तान में श्री खालिद मसूद, चेयरमैन, काउंसिल ऑफ इस्लामिक आइडिय़ॉलाजी ने कहा है कि हड़पी जमीन पर बनाये गये मदरसे और मस्जिदें शरीया के खिलाफ़ हैं. वहां की गयी प्रार्थना स्वीकार नहीं की जायेगी. कितने नेक विचार हैं. भारत में हर नुक्कड़-गली में हनुमान जी के मन्दिर, शिवजी की पिण्डी, पीर बाबा की मज़ार सार्वजनिक स्थल के अतिक्रमण के टाइम टेस्टेड फार्मूला हैं. अगर यहां भी देवबन्द वाले और वीएचपी वाले कह दें कि सार्वजनिक स्थल का अतिक्रमण कर बनाया धर्म स्थल खुदा/भगवान जी को स्वीकार्य नहीं होगा और वहां की गयी इबादत/पूजा केवल कुफ/आसुरिक होगी तो यातायात और रिहायश की धर्मनिरपेक्ष और बड़ी समस्यायें हल हो जाये!

The news item in Expressindia quoted in above Hyper Link:
‘Mosques on encroached land un-Islamic’
Islamabad, June 15: A top Islamic organisation in Pakistan has said mosques and madrassas, including Jamia Hafsa that has been involved in a stand-off with the government over its attempt to forcefully implement Sharia, built on encroached land were considered illegal in Islam and ‘prayers offered there would not be accepted’.
Khalid Masud, Chairman of the Council of Islamic Ideology (CII), said all mosques and madrassas (seminaries), including Jamia Hafsa, built on encroached land were un-Islamic, and ‘prayers offered there are not accepted’.

हनुमान जी शरीफ से देवता हैं. किसी कोने में टिका दो – बेचारे स्थापित हो कर वरदान बांटने लगते हैं. शिव लिंग और उसके ऊपर मटकी से गिरता पानी जुंये भरे बालों वाले गंजेडियों की पनाह/अड्डा बन जाता है. पीर बाबा की मजार पर चादर चढ़ने लगती है. लोबान जलने लगता है. अजीबो-गरीब पोशाक में एक बन्दा मुरछल घुमाते हुये लोगों को अभुआ कर (हिस्टिरिकल बना कर) जिन्न उतारने लगता है. इस प्रक्रिया में जमीन का बेशकीमती टुकड़ा दब जाता है धार्मिक उन्माद की भेंट!
यहां भारत में भी एक नेक खालिद मसूद की दरकार है – और उनके हिन्दू क्लोन की भी!

मैं आपको अपना अनुभव सुनाता हूं.
स्टेशन के सामने व्यापक मॉडीफिकेशन हो रहा था. तोड़-फोड़ करने में एक मजार निकल आई और एक हनुमान जी का मन्दिर. मजार कोने पर थी. पड़ी भी रहती तो हम अपना प्लान बदल कर काम चला सकते थे. पर हनुमान जी तो बीच सड़क में आ रहे थे. लिहाजा मेरे जिम्मे काम आया कि मैं दोनो समुदायों से समझौता वार्ता कर समाधान निकालूं. मैं जब मौके पर पंहुचा तो मेरे आने का समाचार सुन हनुमान चालिसा का पाठ माइक पर तेज हो गया. पहले मैं मजार के पास गया तो एक बन्दा वज्रासन जैसी मुद्रा में झूम-झूम कर कपड़े में लिपटी किसी किताब को खोल कर उसमें से पढ़ने लगा. मैं जितना नजदीक पंहुचा, उसका धड़ और ज्यादा स्विंग करने लगा. अनेक मुसलमान मजार पर आते-जाते नजर आ रहे थे. एक आदमी मेरे पास आ कर पीर बाबा का विवरण देने लगा तो मेरे साथ का स्टेशन मैनेजर बुदबुदाया – “पिछले दस साल से यहां हूं मै. अबतक तो मेरे घर की चार दीवारी में यह कब्र थी. पहले बताते थे कि अंग्रेज स्टेशन मास्टर की रखैल की है, और अब तोड़ने की बारी आयी तो पीर बाबा की हो गयी! आजतक किसी ने दिया तक नहीं जलाया और अब भीड़ चली आ रही है!”
हनुमान जी के पास तो और बड़ा नाटक था. ज्यादा से ज्यादा जमीन घेरने को बड़ी कनात लगा कर श्रद्धालु जै – श्रीराम की अनवरत नारे बाजी कर रहे थे. कुछ लोग तो रिपीटेड हनुमान चालिसा पढ़ रहे थे. दृष्य ऐसा था कि हनुमान जी तो क्या, उनकी पूंछ भी नहीं सरकाई जा सकती थी.
हिन्दू और मुसलमान – दोनो में गजब का उन्माद और गजब की श्रद्धा थी. यह श्रद्धा एक दूसरे समाज पर प्वाइण्ट स्कोर करने, मौके की जमीन दबाने और आने वाले चुनाव के लिये मुद्दा क्रियेट करने के लिये थी.
आगे का नेगोशियेशन कैसे चला वह मैं ही जानता हूं. दस साल बाद, अगर रिटायर होने पर ब्लॉगरी करता रहा तो बताऊंगा.

गुज्जर आन्दोलन,रुकी ट्रेनें और तेल पिराई की गन्ध

May 31, 2007

परसों रात में मेरा केन्द्रीय-कंट्रोल मुझे उठाता रहा. साहब, फलाने स्टेशन पर गुज्जरों की भीड़ तोड फोड कर रही है. साहब, फलने सैक्शन में उन्होने लेवल क्रासिंग गेट तोड दिये हैं. साहब, फलानी ग़ाड़ी अटकी हुयी है आगे भी दंगा है और पीछे के स्टेशन पर भी तोड़ फोड़ है…. मैं हूं उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में पर समस्यायें हैं राजस्थान के बान्दीकुई-भरतपुर-अलवर-गंगापुर सिटी-बयाना के आस-पास की। यहाँ से गुजरने वाली ट्रेनों का कुछ भाग में परिचालन मेरे क्षेत्र में आता है. राजस्थान में गुज्जर अन्दोलन ट्रेन रनिंग को चौपट किये है. रेल यात्रियों की सुरक्षा और उन्हें यथा सम्भव गंतव्य तक ले जाना दायित्व है जिससे मेरा केन्द्रीय-कंट्रोल और मैं जूझ रहे हैं.

पिछली शाम होते-होते तो और भी भयानक हो गयी स्थिति. कोटा-मथुरा रेल खण्ड पर अनेक स्टेशनों पर तोड़-फोड़. अनेक जगहों पर पटरी से छेड़-छाड़. दो घण्टे बैठ कर लगभग 3 दर्जन गाड़ियों के मार्ग परिवर्तन/केंसिलेशन और अनेक खण्डों पर रात में कोई यातायात न चलाने के निर्णय लिये गये. अपेक्षा थी कि आज रात सोने को मिल जायेगा. जब उपद्रव ग्रस्त क्षेत्रों से गाड़ियां चलायेंगे ही नहीं तो व्यवधान क्या होगा?

पर नींद चौपट करने को क्या उपद्रव ही होना जरूरी है? रात के पौने तीन बजे फिर नींद खुल गयी. पड़ोस में झोपड़ीनुमा मकान में कच्ची घानी का तेल पिराई का प्लांट है. उस भाई ने आज रात में ही तेल पिराई शुरू कर दी है. हवा का रुख ऐसा है कि नाक में तेल पिराई की गन्ध नें नींद खोल दी है.

जिसका प्लांट है उसे मैं जानता नहीं. पुराने तेल के चीकट कनस्तरों और हाथ ठेलों के पास खड़े उसे देखा जरूर है. गन्दी सी नाभिदर्शना बनियान और धारीदार कच्छा पहने. मुंह में नीम की दतुअन. कोई सम्पन्न व्यक्ति नहीं लगता. नींद खुलने पर उसपर खीझ हो रही है. मेरे पास और कुछ करने को नहीं है. कम्प्यूटर खोल यह लिख रहा हूं. गुज्जर आन्दोलन और तेल पिराई वाला गड्ड-मड्ड हो रहे हैं विचारों में. हमारे राज नेताओं ने इस तेल पिरई वाले को भी आरक्षण की मलाई दे दी होती तो वह कच्ची घानी का प्लाण्ट घनी आबादी के बीच बने अपने मकान में तो नहीं लगाता. कमसे कम आज की रात तो मैं अपनी नींद का बैकलाग पूरा कर पाता.

आरक्षण की मलाई लेफ्ट-राइट-सेण्टर सब ओर बांट देनी चाहिये. लोग बाबूगिरी/चपरासी/अफसरी की लाइन में लगें और रात में नींद तो भंग न करें.

मायावती जीती हैं. क्या दलित भी जीता है?

May 22, 2007

डेढ़ साल पहले मैं बनारस में पोस्टेड था. छोटी सी खबर थी हिन्दी के अखबार में एक मुसहर ठण्ड से मर गया था गॉव में. गॉव का नाम मेरे ससुराल का था. मैने अपने साले से फोन पर पूछा तो खबर सही निकली. समाजसेवी तो हूं नहीं, अत: मेरे पास सम्वेदना व्यक्त करने का कोई जरीया नहीं था. मैने 500 रुपये देकर अपने एक कर्मचारी से 5 सस्ते वाले कम्बल मंगवाये और अपने साले के पास भेज दिये कि उन्हे मुसहरों में बंटवा दें. कम से कम पांच मुसहर तो ठण्ड झेल जायेंगे बिना मरे.

मित्रों, हमारे पास सम्वेदना है, समाधान नहीं है. अपनी रोजी-रोटी में ही ऐसे फंसे हैं कि समाज की क्या देखें. पता लगा कि मुसहरों के पास कुछ भी सम्पत्ति नहीं है. पता नहीं वोट भी है या नहीं. जमीन तो मड़ई बनाने को भी नहीं है. इधर-उधर डेरा बना लेते हैं, वहां से कभी भी दुरदुरा कर अलग कर दिये जाते हैं. सबसे जरूरी है कि इन्हें जमीन का हक मिले. मायावती अकेले दम पर जीती हैं क्या यह हक मिलेगा?

यह जानने को मैं पुन: अपने साले जी की शरण में गया. वह गांव में रहता है. अब ग्राम प्रधान भी है. इस बार चुनाव में उसे सांसदी का टिकट मिलते-मिलते रह गया. जमीनी हकीकत जानता है. उसने बताया उसके क्षेत्र में दलितों के पास जमीन हो गयी है. गलीचा बुनकर कुछ ने खरीद ली है. कुछ को सरकार ने समय-समय पर पट्टे दिये हैं. करीब 40-50% के पास जमीन/पट्टे हैं. पर आगे और जमीन बांटने को है ही नहीं. कुल मिला कर इस इलाके में 50-60% व पूरी यूपी में इससे कहीं ज्यादा दलितों के पास जमीन/पट्टे नहीं हैं. ये दलित गांव मे रहेंगे. ओवरनाइट शहरी नहीं होंगे. कहां से मिलेगी जमीन? कैसे होगा उनका एम्पावरमेण्ट?


उत्तर प्रदेश चुनाव विषयक एक व्यंग पोस्ट जो मेरे छोटे भाई शिव कुमार मिश्र ने लिखी हैं, कृपया यहाँ देखें : उत्तरप्रदेश में आम आदमी जीता हैं क्या?

एक और पेंच है. जिस जमीन के केवल पट्टे मिले हैं, वह जमीन अगर वास्तव में दी गयी तो बसपा से जो सवर्ण जीते हैं; उनमें और दलितों में भी तनातनी होगी. सवर्ण जमीन शायद दे दें वह जमीन इतनी नहीं है कि उससे सरकार में होने वाली मलाई छोड़ दी जाये. पर जमीन का मामला मूंछ की ऐंठ से जुड़ा होता है. उस ऐंठ का क्या होगा?

मुझे लगता है मायावती जीतना चाहती थीं; सो अपनी अदम्य इच्छा शक्ति के चलते उन्होने वह जीत हासिल कर ली. पर उससे दलित जीता नहीं टेक्टिकल लड़ाई हार गया है. समय के साथ दलित सेगमेंटेशन या दलित कार्ड सॉफ्ट होता जायेगा. आपने अडवानी के जिन्ना वाले स्टेटमेंट से देख ही लिया है. उनके हिन्दू सेगमेंटेशन या हिन्दू कार्ड सॉफ्ट करते ही अधोगति प्रारम्भ हो गयी भाजपा की. अडवानी शार्प पॉलिटीशियन हैं. वे भी कोई सोशल इंजीनियरिंग ले कर आ सकते हैं. पर अब अडवानी के जीतने से क्या हिन्दू जीतने वाला है?

उसी तरह मायावती जी के जीतने से (शायद) दलित जीता नहीं है. बाकी तो समय बतायेगा…


हुसैन और चन्द्रमोहन दोनो एक ही केटेगरी में आते हैं

May 17, 2007

ढ़ाई आखर में क्या ये खजुराहो को उड़ायेंगे है. उसमें नसीरुद्दीन जी ने तालिबानियों की खबर ली है:

तालिबानियों को लगा कि बामियान के बुद्ध को नष्ट कर, वे प्रसिद्धि के शिखर पर चले जायेंगे। शिखर पर तो गये पर हमेशा की बदनामी के कलंक के साथ। इतिहास हमेशा उन्हें अतिवादी कठमुल्लों के रूप में याद करेगा। और बामियान के बुद्ध का क्या बिगाड़ा…. वे तो स्मृतियों में थे और स्मृतियों में जिंदा रहेंगे।
……. नसीरुद्दीन

बस, अब वे उसी तर्ज पर, मुस्लिम काल में भारत में हजारों मूर्तियों/मन्दिरों के भंजन को भी, उसी स्पिरिट में, अनुचित ठहरा दें। बड़ी कृपा होगी। अपने को उस विरासत से अलग करलें, तो साफ लगेगा की वे केवल हुसैन को बचने को तालिबान की क़ुरबानी नहीं दे रहे वरन सैद्धांतिक बात कर रहे हैं।

पर हुसैन जी फिर भी धतकरम वाले रहेंगे। उनके साथ एक और नाम जुड़ गया है – चन्द्र मोहन का। सायाजी विश्व विद्यालय मे उनके कारण बवाल चल रहा है। मानवाधिकार वाले मोर्चा सम्भाले हैं।

आइए हाथ उठाएं हम भी में लाल्टू जी उसे सेनसेशनलाइज करते हैं : हमला कलाकारों पर है. अभी तक किसी को मारा नहीं है.

पर चन्द्र मोहन के बारे में पॉयोनियर में लिखा है : इस कलाकार नेकमोड पर नग्न ईसा मसीह के गिरते वीर्यऔरबच्चा जनती नग्न औरतजिसका कैप्शन थादुर्गा माताजैसे अश्लील चित्र बनाये

अगर पायोनियर का लिखा पढ़ें तो ये कलाकार कुत्सित और बजारू प्रतीत होते हैंआप पायोनियर का लेख पढ़ाने की कृपा करें उसके बाद ही अपना खेमा, यदि तय करना चाहते हों, तो करें।

हुसैन और चन्द्रमोहन दोनो एक ही केटेगरी में आते हैं. हिन्दू जैसा नाम कोई कंशेसन नहीं होता अपने आप में!
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और एक बात। खजुराहो या हिंदू साहित्य में नग्नता का घिसा रिकार्ड न बजायें, कृपया। उस के बारे में पहले ही मैं भी लिखा चुका हूँ हुसैन क्यों फंसे हैं में।

माया मेमसाहब की सोशल इंजीनियरिंग का जवाब नही!

May 13, 2007

अपन तो सत्तर के दशक में इंजीनियरिंग पढ़े थे. तब प्रागैतिहासिक काल की टेक्नॉलॉजी हुआ करती थी. फोर्ट्रान फोर में आखें फोड़ कर प्रोग्रामिंग करते थे और कम्प्यूटर दन्न से सिंटेक्स एरर बताते हुये एक पन्ने का प्रिंट-आउट हमारे मुंह पर फैंक देता था. अब तो नये-नये फील्ड आ गये हैं. बायोटेक्नॉलाजी में पडोस की लड़की ऐरे-गैरे कॉलेज से इंजीनियरिंग पढ़ हमारी वर्तमान सेलेरी से ज्यादा कमाने जा रही है.

पर वह सब माया मेमसाहब की सोशल इंजीनियरिंग के सामने फेल है…

छिपकली कल तक काक्रोच को खाने को लपकती थी. अब माया मेम साहब ने काक्रोच का सिर ही छिपकली पर फिट कर दिया है.

छिपकली डायनासोरों के विलुप्त हो जाने के बाद भी जीवंत है. और काक्रोच तो हार्डेण्ड एनीमेट ऑब्जेक्ट है. तरह-तरह के जल-थल-वायु-प्रदूषण के बावजूद भी जिन्दा प्राणी. आप समझ सकते हैं कि इन दोनो का फ्यूज़न कर क्या गदर सोशल इंजीनियरिंग की है माया मेम साहब ने.

सोशल इंजीनियरिंग है क्या बला?

कम्प्यूटर के जमाने में सोशल इंजीनियरिंग के मोटे तौर पर मायने है कि कोई भेदिया सीना तान के आपका मित्र/अन्दरी/जेन्युइन पोज करे और आपके सारे भेद ले कर चलता बने. माया मेमसाहब इस मायने में सोशल इंजीनियर नहीं हैं. वे ब्राह्मणों के भेद (वोट) ले कर सरकने वाली नही हैं. तय हो गया है कि दिल्ली की कुर्सी उनका लक्ष्य है. पर ब्राह्मण सोशल रिमिक्सिंग/फ्यूज़न को तैयार होंगे? शायद नहीं. इसी कारण से मैं सोशल इंजीनियरिंग का ही प्रयोग कर रहा हूं. अंतत: यह क्या निकलेगा सामाजिक परिवर्तन/सोशल रीमिक्सिंग/पोलिटिकल इंजीनियरिंग/मॉयोटिक्स (माया-पॉलिटिक्स) या कुछ और यह समय ही बतायेगा. नया शब्द समय ही गढ़ेगा.

बायो या सोशल फील्ड में इंजीनियरिंग का एक ही भय होता है. पार्ट अगर एक दूसरे के साथ एक्लेमेटाइज कर पाये तो प्रयोग फेल हो जाता है और जीव का राम नाम सत्त. अब वही देखना है क्या होता है आगे.

पर माया मेम साहब ने सोशल इंजीनियरिंग का एक फण्डा दे कर जितने भी रजनीति मे घुसे चुगद हैं, उनकी ट्यूब लाइटें जला दी हैं. आगे देखते जाइये एक से एक फेण्टाबुलस प्रयोग होंगे सोशल इंजीनियरिंग में. बस, आपमें अगर बिजनेस सेंस है तो बिना देर किये संस्था पंजीकृत करा लें संत कूड़ादास मेमोरियल इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल टेक्नॉलाजी एण्ड साइंस.

बहुत चलेगी यह संस्था!

हुसैन क्यों फंसे हैं?

May 10, 2007

हुसैन ने हिन्दू देवी-देवताओं के नग्न चित्र बनाये हैं. यह बड़ा रोचक होगा देखना कि भारत का सहिष्णु समाज उन्हें अंतत: कैसे छोड़ देगा. अल्पसंख्यक कार्ड उनके पक्ष में जाता है.

यह अवश्य है कि मेरे मन में अगर इरोटिका का भाव होता (जो नहीं है) और मैं चित्रकार होता (जो बिल्कुल नहीं है), तब अगर मैं खजुराहो या अन्य मन्दिरों की तर्ज पर कोई चित्र बनाता तो उस पर बवाल नहीं होता. अगर मेरी श्रद्धा प्रतिष्ठित है, तो मुझे विश्वास है कि हिन्दू धर्म में काम के लिये स्पेस है. हिन्दू धर्म में इरोटिका को नैसर्गिक भावना के रूप में लिया जाता है. भगवान कृष्ण के जीवन में ही इसके अनेक उदाहरण हैं. उनकी रास लीलाओं और राधा के प्रति अद्भुत प्रेम के बावजूद ( या उसके समग्र) वे हमारे आराध्य पूर्ण-पुरुषोत्तम हैं.

फिर हुसैन क्यों फंसे हैं?

रसखान अगर कवि के साथ-साथ चित्रकार होते और उन्होंने अगर कुछ न्यूड चित्र बनाये होते तो हम उसे सहिष्णुता से लेते. शायद एक कदम आगे बढ़कर उन्हें हिन्दुत्व में शरीक भी कर लेते. हुसैन फंसे इसलिये हैं कि उनमें हिन्दू धर्म के प्रति आदर भाव नहीं है. वे मात्र विवादित चित्र बना कर अपनी दुकान चलाना चाहते हैं. यह घोर कर्म है और अत्यंत निन्दनीय है.

हुसैन चित्र बना कर वह काम कर रहे हैं जो बर्बर आक्रंताओं नें हिन्दू मूर्तियों का भंजन कर किया था. वे हिन्दू आस्था पर चोट कर रहे हैं. ऐसा ही काम तालिबानियों ने बामियान में बुद्ध की प्रतिमाओं के भंजन से किया था.

विचारों का रखना, लेखन, चित्र बनाना, मूर्तियां बनाना या तोड़ना यह सब भावों की अभिव्यक्ति के माध्यम हैं. महत्वपूर्ण है भाव. हुसैन के क्या भाव हैं हिन्दू श्रद्धा पर? अगर वे ऐसे चित्र बनाते हैं तो इस प्रश्न का उत्तर जानने का अधिकार समाज को बनता है. और यह उत्तर उनके पूरे व्यवहार से परिलक्षित होगा, केवल बयान भर से नहीं.

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जो कानूनी प्रक्रिया चल रही है, उससे हुसैन कतराये क्यों फिर रहे हैं? उन्हें कोर्ट ने सम्मन भेजे हैं जिनकी उन्होने सतत अवज्ञा की. तभी कुर्की प्रकरण हुआ. उन्हें अदालत में उपस्थित होना चाहिये. फिर वे वहां जो कहें, उसे सुना जाये.

वंजारा कहते हैं – रणभेरी बज चुकी है

May 7, 2007

गुजरात में पुलीस के अधिकारी एक व्यक्ति और उसकी पत्नी के छ्द्म-एनकाउंटर के मामले में पकड़ लिये गये हैं. उनमें से प्रमुख, डीजी वंजारा ने कहा है बैटल लाइंस आर ड्रान. बैटल लाइन वास्तव में खिंच गयी है.

पुलीस, राजनेता, अपराधी, मीडिया और आम जनता इस रणभेरी में सभी गड्ड-मड्ड हैं. यह केवल सादी सी निरीह नागरिक और निर्दय पुलीस की कथा नहीं है. आखिर सोहराबुद्दीन कई मामलों में लिप्त अपराधी था, जिसकी तलाश की जा रही थी. और इसपर चर्चा भी ब्लैक एण्ड ह्वाइट चरित्रों को लेकर नहीं होगी. यह एक जटिल विषय का हिस्सा है और इसपर परिदृष्य भी जटिल ही बनेगा भविष्य में.

मुझे तो पूर्वांचल दिखता है. सिवान, गाजीपुर, मऊ, बनारस, इलाहाबाद, गोरखपुर, आजमगढ़ … सब जगह माफियागिरी और दबंगई का आलम है. इन तत्वों के खिलाफ कानूनी लड़ाई जीतना सम्भव प्रतीत नहीं होता. कानून में जो गवाही और अंतिम सीमा तक अकाट्य प्रमाण के तत्व मौजूद हैं, उनका पूरे संज्ञान में पैसे व लाठी की ताकत वाले अपने पक्ष में दुरुपयोग करते हैं. न्याय या तो मिल नहीं पाता या फिर उसमें अत्यंत देरी होती है. कानून को कानून के नियमों का (दुरु)प्रयोग कर ये तत्व अंगूठा दिखाते रहते हैं. यही कारण है कि एनकाउण्टर (या फेक-एनकाउण्टर) इस प्रकार के तत्वों से निपटने का सरल और वैकल्पिक माध्यम बन जाते हैं. फिर एनकाउण्टर का दुरुपयोग भी चल निकलता है.

आतंकवादी/नक्सली/रंगदारी/अपहरणकर्ताओं और माफिया से इण्डियन पीनल कोड या क्रिमिनल प्रोसिडियर कोड के बल पर निपटा जा सकना सन्दिग्ध है. क्या आप मानते हैं कि पंजाब में शांति इन कानूनों के बल पर आई थी? इन कानूनों को सुधारने का महत्वपूर्ण काम होना चाहिये. एनकाउण्टर पर, धर्म और राजनीति के निरपेक्ष, एक सुस्पष्ट सोच विकसित होनी चाहिये.

पर वह अपनी जगह है. अभी तो बैटल लाइन खिंच गयी है. खुदाई की जा रही है. उसमें और बहुत कुछ निकलेगा जो हमारी सोच में भी बदलाव लायेगा.

बाबूभाई कटारा की तरफदारी (?) में एक पोस्ट

April 30, 2007

मुझे भाजपा और कटारा पर तरस आ रहा है. जब मैं रतलाम में था तो झाबुआ-पंचमहल-दाहोद कांग्रेस के गढ़ हुआ करते थे. मैं आदिवासियों से पूछ्ता था कि देश का प्रधानमंत्री कौन है? तब या तो वे सवाल समझ नहीं पाते थे, या वेस्ता पटेल, कंतिलाल भूरिया अथवा सोमाजी डामोर जैसे स्थानीय कांग्रेसी का नाम लेते थे. उन गरीबों के लिये दुनियां में सबसे बड़े वही थे.

फिर आर.एस.एस.वालों ने वनवासी विकास संघ जैसे प्लेटफार्म से आदिवासियों में पैठ बनाई. मिशनरियों का वर्चस्व कुछ सिमटा. उस क्षेत्र से भाजपा जीतने लगी चाहे मध्यप्रदेश हो या गुजरात.

और अब कटारा ने लोढ़ दिया है! बेचारे आर.एस.एस. के कमिटेड वर्कर मुंह पिटा रहे होंगे. कटारा परमजीत कौर को ले जा रहे थे; सो तो ठीक; शिलाजीत(? – देसी वियाग्रा) काहे को ले जा रहे थे जब पत्नी साथ नहीं जा रही थी? पैसे के लिये भ्रष्ट आचरण तो खास बात नहीं है वह तो चलता है! पकड़े गये, वही गड़बड़ हो गया. पर खांटी दैहिक वासना का भ्रष्टाचार यह अति हो गयी.

मुझमें यह वक्र सोच क्यों है, यह मैं नहीं जानता. जनता कबूतरबाजी-कबूतरबाजी की रट लगाये है और मुझे खोट देसी वियाग्रा में नजर आ रहा है.

एक बाबू रिश्वत ले कर मकान बना लेता है, बच्चों को डाक्टरी/इंजीनियरी पढ़ा देता है. लड़की की ठीक से शादी कर देता है, सुबह शाम मन्दिर हो आता है, सुन्दर काण्ड का पाठ और भागवत श्रवण कर लेता है. यह मानक व्यवहार में फिट हो जाता है.

पर अगर वह पैसा पीटता है, दारू-मुर्गा उड़ाता है, रेड़ लाइट एरिया के चक्कर लगाता है, इधर-उधर मुंह मारता है; तब गड़बड़ है. कटारा देसी वियाग्रा के कारण दूसरे ब्रैकेट में लग रहे हैं. आगे क्या निकलेगा, भगवान जाने.

कैश और क्वैरी या कबूतरबाजी छोटा गुनाह है. उसपर तो सांसद निकाल बाहर किये गये. बड़ा गुनाह है माफियागिरी, औरत को मार कर जला देना, आई.एस.आई. से सांठ-गांठ, मधुमिता शुक्ला जैसे मर्डर, पोलिटिकल दबंगई के बल पर देह/असलाह/नशा आदि के व्यापार चलाना. ऐसे गुनाह करने वाले ज्यादातर छुट्टा घूम रहे हैं. उनकी नेतागिरी बरकरार है या चमक रही है.

ब्लॉगर भाई तलवारें तान सकते हैं. कह सकते हैं कि सरकारी नौकर है, रिश्वत को जस्टीफाई (?) कर रहा है. जरूर चक्कर है. पर ब्लॉगरी का मायने ही यह है कि (मर्यादा में रहते हुये) जो जंचे, लिखा जाये.

बहुजन समाज पार्टी ने शिव जी का आशिर्वाद लिया

April 26, 2007

गौतम बुद्ध, अम्बेडकर, महामाया रोड/नगर/पार्क/क्रासिंग आदि का जमाना शायद पुराना हो गया है. वोट बैंक के गणित का तकाजा ऐसा हुआ कि बसपा ने शंकर जी का आशिर्वाद सेंक्शन करा लिया.

सवेरे घूमने जाती मेरी मां ने खबर दी कि शिव कुटी के एतिहासिक मन्दिर पर बहुजन समाज पार्टी का झण्डा फहरा रहा है. चित्र देखें:

(शिव कुटी में कोटेश्वर महादेव मंदिर का कंगूरा – आयत में बसपा का ध्वज)

शिव कुटी का कोटेश्वर महादेव का मन्दिर उस स्थान पर है जहां वनवास जाते समय भगवान राम ने गंगा पार कर शिवलिंग की स्थापना कर पूजा की थी. तुलसी ने उस विषय में लिखा है:

मुदित नहाइ किन्हि सिव सेवा। पूजि जथाबिधि तीरथ देवा।

राम का शिवलिंग का कोटेश्वर महादेव के रूप में पूजन उनके एक महत अभियान का संकल्प था.

अब जब कोटेश्वर महादेव के पुरी-पुजारी गण; मुफ्त में बंटे बाटी-चोखा और अन्य माल से तृप्त; बसपा का झण्डा शिव मन्दिर पर फहरा रहे हैं, तो समय बदला जानिये मित्रों! बहन जी ने सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की वकालत कर एक मुद्दा तो झटक ही लिया है. आगे, जैसी सरकार बनाने में जरूरत पड़े, राम मन्दिर बनाने का मुद्दा भी वे भजपा से हड़प लें तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिये. क्या पता टेण्ट में बैठे राम लला का परमानेण्ट निवास बनाने की निमित्त बसपा बन जाये।

कौन कहता है गिरगिट ही रंग बदल सकता है
सियासी दलों को तबियत से निहारो यारों.

शिक्षा के क्षेत्र में देश बैक फुट पर है.

April 25, 2007

सन 2005 में विश्वबैंक ने पड़ताल की थी. उसमें पता चला था कि हमारे देश में 25% प्रतिशत प्राइमरी स्कूल के अध्यापक तो काम पर जाते ही नहीं हैं. बाकी, जो जाते हैं उनमें से आधे कुछ पढ़ाते ही नहीं हैं. तनख्वाह ये पूरी उठाते हैं. यह हालत सरकारी स्कूलों की है. आप यहां पढ़ सकते हैं इस पड़ताल के बारे में. ऐसा नहीं है कि सन 2005 के बाद हालत सुधर गये हों.

मेरे काम में शिक्षकों से वास्ता नहीं पड़ता. पर समाज में मैं अनेक स्कूली अध्यापकों को जानता हूं, जिनके पास विचित्र-विचित्र तर्क हैं स्कूलों में न जाने, न पढ़ाने और पूरी तनख्वाह का हकदार होने के. उनके सामान्य ज्ञान के स्तर पर भी तरस आता है. अच्छा है कि कुछ नहीं पढ़ाते. अज्ञान बांटने की बजाय स्कूल न जाना शायद बेहतर है!

उच्च शिक्षा का भी कोई बहुत अच्छा हाल नहीं है. सामान्य विश्वविद्यालयों को छोड़ दें, तकनीकी शिक्षा के स्तर भी को भी विश्वस्तरीय नहीं कहा जा सकता. द न्यू योर्कर में छपा यह लेख आंखें खोलने वाला है. भारत में 300 से ज्यादा विश्वविद्यालय हैं पर उनमें से केवल दो ही हैं जो विश्व में पहले 100 में स्थान पा सकें. इंफोसिस वाले महसूस करते हैं कि भारत में स्किल्ड मैनपावर की बड़ी किल्लत है. पिछले साल तेरह लाख आवेदकों में से केवल 2% ही उन्हें उपयुक्त मिलें. अमेरिकी मानक लें तो भारत में हर साल 170,000 ईंजीनियर ही पढ़ कर निकलते हैं, न कि 400,000 जिनका दावा किया जाता है. कुकुरमुत्ते की तरह विश्वविद्यालय और तकनीकी संस्थान खुल रहे हैं. उनकी गुणवत्ता का कोई ठिकाना नहीं है. आवश्यकता शायद 100-150 नये आईआईटी/आईआईएम/एआईआईएमएस और खोलने की है और खुल रहे हैं संत कूड़ादास मेमोरियल ईंजीनियरिंग/मेडीकल कॉलेज! उनमें तकनीकी अध्ययन की बुनियादी सुविधायें भी नहीं हैं!

छिद्रांवेषण या दोषदर्शन के पचड़े में फंसना उचित नहीं होगा. पर समाज को बांट कर शिक्षा के क्षेत्र में राजनीति चलाने की बजाय प्राईमरी-सेकेण्डरी-उच्च सभी स्तरों पर शिक्षा में गुणवत्ता और संख्या दोनो मानकों पर बेहतर काम की जरूरत है. वर्ना अर्थ व्यवस्था की आठ-दस प्रतिशत की वृद्धि दर जारी रख पाना कठिन होगा. एक तरफ बेरोजगारों की कतार लम्बी होती चली जायेगी और दूसरी तरफ कम्पनियों को काम लायक लोग नहीं मिलेंगे.