Archive for the ‘विविध’ Category

नाई की दुकान पर हिन्दी ब्लॉगर मीट

June 25, 2007

पिछले तीन हफ्ते से हेयर कटिंग पोस्टपोन हो रही थी. भरतलाल (मेरा भृत्य) तीन हफ्ते से गच्चा दे रहा था कि फलाने नाई से तय हो गया है – वह घर आ कर सिर की खेती छांट देगा. वह नाई जब रविवार की दोपहर तक नहीं आया तो बोरियत से बचने को मैने एक ताजा पुस्तक पकड़ी और जा पंहुचा नाई की दुकान पर. रविवार की दोपहर तक सभी केण्डीडेट जा चुके थे. नाई अकेला बैठा मुझ जैसे आलसी की प्रतीक्षा कर रहा था. मैंने सीधे लांचपैड (नाई की ऊंची वाली कुर्सी) पर कदम रखा.

उसके बाद रुटीन हिदायतें – बाल छोटे कर दो. इतने छोटे कि और छोटे करने पर वह छोटे करने की परिभाषा में न आ सकें. ये हिदायत मुझे हमेशा देनी होती है – जिससे अगले 2-3 महीने तक हेयर कटिंग की जहमत न उठानी पड़े.

जब केवल नाई के निर्देशानुसार सिर इधर-उधर घुमाने के अलावा कोई काम न बचा तो मैने उसकी दुकान में बज रहे रेडियो पर ध्यान देना प्रारम्भ किया. कोई उद्घघोषक बिनाका गीतमाला के अमीन सायानी जैसी आवाज में लोगों के पत्र बांच रहे थे. पत्र क्या थे – लोगों ने अटरम-सटरम जनरल नॉलेज की चीजें भेज रखी थीं. … भारत और पाकिस्तान के बीच फलानी लाइन है; पाक-अफगानिस्तान के बीच ढिमाकी. एवरेस्ट पर ये है और सागर में वो … एक सांस में श्रोताओं की भेजी ढ़ेरों जानकारियां उद्घघोषक महोदय दे रहे थे. मुझे सिर्फ यह याद है कि उनकी आवाज दमदार थी और कर्णप्रिय. एक बन्दे की चिठ्ठी उन्होने पढ़ी – “मैं एक गरीब श्रोता हूं. ईमेल नहीं कर सकता ” (जैसे की सभी ईमेल करने वालों के पास धीरूभाई की वसीयत हो!). फिर उद्घोषक जी ने जोड़ा कि ईमेल क्या, इतने प्यार से लिखे पत्र को वे सीने से लगाते हैं … इत्यादि.

उसके बाद माइक उषा उत्थप को. जिन्होने मेरे ब्लॉग की तरह हिन्दी में अंग्रेजी को और अंग्रेजी में हिन्दी को औंटाया. कुछ देर वह चला जो मेरी समझ में ज्यादा नहीं आया. बीच-बीच में गानों की कतरनें – जो जब समझ में आने लगें तब तक उषाजी कुछ और बोलने लगतीं.

खैर मेरी हेयर कटिंग हो चुकी थी. तबतक उद्घोषक महोदय ने भी कार्यक्रम – पिटारा समाप्त करने की घोषणा की. और कहा - आपको यूनुस खान का नमस्कार.

यूनुसखान अर्थात अपने ज्ञान बीड़ी वाले ब्लॉगर! जो मेरे ब्लॉग पर अपनी आवाज जैसी मीठी टिप्पणी करते हैं और जिनके ब्लॉग पर मैं फिल्मों के गीत पढ़ने जाता हूं. वहां गीत तो नही सुने पर अब वे अपनी आवाज में कुछ कहेंगे तो सुनूंगा. हां, अब लगता है कि वे अपने ब्लॉग पर अपने कार्यक्रमों के समय जरूर दें जिससे कि घर पर रेडियो पर सुना जा सके.

मैने नाई को हेयरकटिंग के दस रुपये दिये और लौटते हुये सोचा – दस रुपये में हेयर कटिंग भी हो गयी और ब्लॉगर मीट भी!

ढेरों कैम्प, ढेरों रूहें और बर्बरीक

June 18, 2007

बर्बरीक फिर मौजूद था. वह नहीं, केवल उसका सिर. सिर एक पहाड़ी पर बैठा सामने के मैदान पर चौकस नजर रखे था.

ढेरों रूहों के शरणार्थी कैम्प, ढेरों रूहें/प्रेत/पिशाच, यातना/शोक/नैराश्य/वैराग्य/क्षोभ, मानवता के दमन और इंसानियत की ऊंचाइयों की पराकाष्ठा सब का स्थान और समय के विस्तार में बहुत बड़ा कैनवास सामने था. हर धर्म-जाति-वर्ग; आदिमानव से लेकर आज तक के आतंकवादी और निरीह मानवों की रूहों का प्रतिनिधित्व था उस मैदान में. बर्बरीक सब देख रहा था जैसे उसने महाभारत को देखा था.

बर्बरीक साक्षी था. बर्बरीक दृष्टा था समय और स्थान के अनंत से अनंत तक के विस्तार का. वह सत्य बता सकता था कि क्या हुआ और क्या हो रहा है. पर सब अपने में मशगूल थे. मायें बच्चों से मिल रही थीं. आतंकी रूहें अट्टहास करती घूम रही थीं. काइंया नेताओं के प्रेत शकुनि की तरह चालें सोच रहे थे. पर वहां किसी की कुटिलता से किसी और को फर्क नहीं पड़ रहा था वे सब रूहें जो थीं.

Barbareek is a mythological character in Mahabharata. He was the son of Ghatotkacha and grandson of Bhima. He wanted to participate in Mahabharata from the weaker side. Lord Krishna sensing that he was too powerful, removed him from the fight tactfully. He asked Barbareek his head in charity. Barbareek complied.

Krishna was pleased with the sacrifice and blessed him so that he could watch the whole battle from the hillock, where his head was placed.

The Talking Head (Barbareek) is a symbol for a less confined, more global perspective. All of us see the world, wars and annihilation limited by our prejudices, our experiences and expectations. And when Barbareek voices his opinions, we see it quite differently. When he speaks, we realize the Pandavas and Kauravas are tiny elements of a God’s greater canvas. The Mahabharata is not just about one kingdom, it is about cosmic order…

अच्छी और बुरी रूहें अलग अलग मशगूल थीं पर एक जगह उनमें वार्तालाप हो ही गया. बोस्निया की एक मां और चेचेन्या के एक आतंकी में दुआ-सलाम हो गयी. दोनो में एक सूत्र तो मिला कि दोने एक ही इलाके के थे. दोनो में बात चली कि कौन जीता इस हत्या और बर्बरता के खेल में. पास ही एक भारतीय भी खड़ा था. महाभारत काल का प्रेत. उसे अभी तक मुक्ति न मिल पायी थी. दोनो को सुन कर बोला कौन जीता? यह तो बर्बरीक ही बता सकता है. वह तो मेरे जमाने से दृष्टा रहा है सभी युद्धों, आतंकों, हत्याओं और त्रासदियों का. उसी से पूछो.

बोस्निया की मां और चेचेन्या का आतंकी बर्बरीक के पास गये. सवाल किया. दोनो को देख बर्बरीक का सिर हंसा वैसे ही जैसे महाभारत काल में हंसा था. फिर बोला एक ही छाया थी, हर जगह. इस ओर भी; उस ओर भी. जो मार रही थी और मर रही थी. वही तलवार बन रही थी और वही ढ़ाल भी बना रही थी. वही बच्चे को दूध पिलाने को आतुर थी और वही कोख फाड़ कर अजन्मे के दो टुकड़े भी कर रही थी.

फिर कुछ रुक कर बर्बरीक ने कहा जीतने और हारने का कोई मतलब ही नहीं है. वही एक छाया है जो हार भी रही है, जीत भी रही है और हार-जीत के परे भी है.

बर्बरीक ने दोनो को इस प्रकार देखा मानो कह रहा हो यह समझने के लिये उसकी तरह लम्बे समय तक देखते रहना पड़ता है.

अफसरी के ठाठ और आचरण नियमों की फांस

June 17, 2007

कल मैने अपनी मजबूरी व्यक्त की थी कि मै‍ ब्लॉग पर एक सीमा तक लिख सकता हूं, उसके आगे बोलने के लिये मुझे अपने रिटायरमेण्ट तक रुकना पड़ेगा. बहुत से लोगों ने टिप्पणियों में कहा कि वे मेरे डिस्क्लोजर के लिये मेरे रिटायरमेण्ट का इंतजार नहीं कर सकते. वैसे मुझे कोई मुगालता नहीं है – मेरी पोस्ट की शेल्फ-लाइफ लोगों की याददाश्त में कुछ दिन भर है – एक सप्ताह भी नहीं होगी!

प्रारम्भ आलोक पुराणिक जी ने किया. मेरे लटकाने को टीटीई का लटकाने के समतुल्य माना. टीटीई तो शायद कुछ और कंसीडरेशन से (जिस कंसीडरेशन की शिकायतें मैं नौकरी के प्रारम्भ से डील करता आया हूं और जो कन्सीडरेशन जनता सहर्ष करने को तत्पर होती है!) लटकाना समाप्त कर आपको यह अनुभूति करा देता हो :

सकल पदारथ हैं जग माहीं; बिन हेर-फेर नर पावत नाहीं.

पर मेरे पास वह कंसीडरेशन नहीं है. मैं सरकारी नौकरी के आचरण नियमों और व्यक्तिगत नैतिकता से बंधा हूं. पुराणिक जी ने मेरी पोस्ट पर एक जगह टिपेरा था कि उनकी लम्बी टिप्पणी बराबर लेख के उन्हे 2000 रुपये मिलते हैं. मेरे थोड़े से घटिया लेखन के अगर 1000 रुपये प्रति लेख भी मिलें तो मै इस नौकरी को बेहिचक छोड़ कर लेखन प्रारम्भ कर सकता हूं. और तब कई लोगों की कई बखिया उधेड़ कर कई चिन्दियां सिल सकूंगा. वर्ना अभी तो यह दशा है कि लिखे का 30% तो मन मार कर रोक लेना पड़ता है; कहीं सरकारी आचरण नियम का उल्लंघन न हो जाये!

The Conduct Rules which exist, need to undergo change as more and more accessibility to Internet as form of expression is available to people in general and Government Officials in particular. The personal diaries which we maintain are going to be increasingly on the net in which people can peep into. And there shall be progressive tendency in the Officials to speak out.
I think, in the years to come; some changes will do take place. Right To Information Act has started playing some role in opening up. Though initial Officials’ reaction is to cover-up.
With society opening up, salaries improving, corruption going down and privatisation/globalisation making headway; we are going to be in new set of working equations.

मसिजीवी जी ने बेनाम लेखन का ऑप्शन सुझाया है. बड़ा सीधा सा है. पर पेंच यही है कि भारत ने एक बुढ़ऊ पैदा किये थे, जिनका पोता अभी गुजरा है. उनका कहना था कि आप कम्पार्टमेंटलाइज्ड जीवन नहीं जी सकते. छ्द्म और बेबाक एक साथ नहीं हो सकते. उन बुढ़ऊ से ड़र लगता है क्योकि उस बुढ़ऊ की आवाज अपने अन्दर की आवाज है जिसे फ़ेस करना एक चैलेन्ज होता है. इसीलिये मैने अपने ब्लॉग को सेल्फ-एडवर्टाइजमेण्ट की सीमा तक खुला रखा है. उसमें अगर विरोधाभास हैं तो वे मेरे व्यक्तित्व के छेद हैं. जो मेरे सोच की गरीबी और फटेहाली बयान करते हैं. बेनाम लेखन से वह फटेहाली आसानी से छिप सकती है. और इंटेलेक्चुअल पाइरेसी कर तो बड़े मजे से अपने को बुद्धिजीवियों की कतार में लाया जा सकता है. मगर अंतत: क्या होगा सब ठाठ पड़ा रह जायेगा जब लाद चलेगा बंजारा.

मुझे हिन्दी लिखने का तात्कालिक जुनून अवश्य है पर रामकृष्ण परमहंस की दशा नहीं है कि कैवल्य प्राप्ति हो गयी हो और हांक लगा रहा होऊं कि आओ सुपात्रों मेरा रहस्य शेयर करो!

जो कुछ सरकारी नौकरी के कारण नहीं बोल सकता वह मानवों के छुद्र स्वभाव, साम्प्रदायिकता से निपटने का नीतिशास्त्र, राजनैतिक दखलन्दाजी और सरकारी नीतिगत मामलों से सम्बन्धित हैं. उनका क्या किया जाये? वे रहेंगे ही. अन्यथा मेरे लेखन से जीवनयापन भर को मिले तो नौकरी (नौकरी का सरकारी ताम-झाम छोड़ना बहुतों को रुलाई ला देता है!) छोड़ आलोक पुराणिक से जुगलबन्दी सहर्ष की जा सकती है!
(दोनो महानुभावों की फोटो उन्ही के ब्लॉग से उखाड़ी हैं. वहां फिर जम आयी होंगी. फिरभी, अगर उन्हे आपत्ति हो तो मैं वापस कर दूंगा.)

फिल्म ज्ञान पर क्रैश कोर्स की जरूरत

June 10, 2007

ब्लॉगरी लगता हैं चल नहीं पायेगी अगर मैं जल्दी से हिंदी फिल्म के बेसिक्स नहीं सीख लेता. और बेसिक्स सिखाने के लिए या तो हिंदी फिल्म्स फार डमीज जैसी किताब हो या फिर क्रैश कोर्स । सिनेमा प्रेमी माफ़ करें – मुझे तो लगता हैं की हिंदी फ़िल्में बनी ही डमीज के लिए हैं, सो हिंदी फिल्म्स फार डमीज जैसी किताब बेकार हैं। लिहाजा बचता हैं क्रैश कोर्स – जो आलोक पुराणिक के पर्व्यू में आता हैं।

बहुत ज़माने से मैंने अपने को हिंदी फिल्मों के छद्म संसार से काटे रखा। पहले जब पढता था (अब तो नौकरी की ऐसी शुद्ध कि पढ़ना ही छूट गया!) तब हिंदी फ़िल्में देखता था। उलूल-जुलूल और ऐसी कि तीन घंटे दिमाग बंद रखना अनिवार्य हो। तय किया की फिल्मों की ऐसी की तैसी। नहीं देखेंगे। अपने को फिल्मों से पूरी निर्दयता से काटा।**

सबसे काटा अपने आप को – अखबार में उनपर लेखन से भी। वैसे भी अखबार में फिल्मों के बारे में जो छपता हैं; वह किस हीरोइन की किस हीरो से अंतरंगता हैं यही भर बताता है; इससे ज्यादा नहीं. और कुछ होता भी हैं तो उसे भूसे के ढ़ेर में से सूई निकलने जैसा यत्न करना पडता हैं।

चलते-चलते : कल सुरेश चिपलूणकर की एक पोस्ट ने मुझे आश्वस्त कर दिया कि हिन्दी फिल्म परिदृष्य थोड़े से हेर-फेर के साथ वैसा ही है जैसा पहले था. लिहाजा मैने बहुत मिस नहीं किया है.

अब ब्लॉग लेखन के कारण सिचयुयेशन कुछ बदल गयी हैं। मैंने काकेश का कलम चूमने की बात की तो उन्होने शिल्पा की। वह तो भला हो कि जेड गूडी वाले प्रकरण के कारण मैं इस नाम से परिचित था। दो-तीन लोगों ने मुन्नाभाई की बात की तो पता चला की ये सज्जन सुनील दत्त के बेटे हैं, एक हथियार के मामले में सजा का इंतजार कर रहे हैं और गाँधी जी को इन्होने री-इनवेंट किया हैं। कुल मिलाकर लगता हैं कि आम जीवन पर लेखन भी फिल्म के दृष्टांतों के माध्यम से इतना हो रहा है कि उन्हे समझने को फिल्मों के बेसिक्स जानने ही पड़ेंगे।

क्या कोई ऑन लाइन क्रैश कोर्स हैं?

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**जीवन से कुछ विषयों को काटने की बात की है तो यह स्पष्ट कर दूं कि और भी कई विषय हैं जो मैने जीवन के नेपथ्य में डाल दिये हैं – गरीबी और लल्लूपने (मीकनेस) का महिमा मण्डन मुझे जबरी फटेहाली ओढ़ने जैसा लगता है. और ये जितने उनके हमदर्द हैं, वे अपने लिये पचमढ़ी में कॉटेज/बंगला या तो रखते हैं – या जुगाड़ने की तमन्ना रखते हैं. अपने को प्रोमोट करने के सभी हथकण्डे जानते हैं – माइक और कैमरा सामने आते ही धाराप्रवाह बोलते हैं. इनके पास समाधान नही हैं. बापू गरीबी के पक्ष में कहते थे तो श्रद्धा होती थी. अब वाले तो दिखावा हैं.

साम्यवाद में जब चीन ने अपने रंग बदल लिये, बर्लिन की दीवार इतिहास हो गयी और रूस का दूसरा मोर्चा बिला गया, तब अपने नक्सली तो केवल नक्शेबाज लगते हैं. लिहाजा साम्यवाद को दरकिनार कर दिया है.

राजनीति के कारण आलम यह है कि बच्चे स्कूल में बाबर – हुमायूं पढ़े जा रहे हैं (कर्टसी धर्मनिरपेक्षता) या फिर शिवाजी – राणाप्रताप (कर्टसी आर.एस.एस. ) . जबकि पढ़ना चाहिये नारायणमूर्ति/कलाम/नर्लीकर को. सो हिस्ट्री को भी हिस्टीरिया की तरह अलग कर दिया है.

पर इन विषयों पर क्रैश कोर्स की जरूरत नहीं है. उनमें हर साल नयी 18 साल की हीरोइन, पहले वाली को धकिया कर नहीं आ जाती!

ब्लॉगर मीट – यह कौन सा मीट है भाई!

June 9, 2007

“झुमरी तलैया में ब्लॉगर मीट” जैसे शीर्षक से पोस्ट छपती है और घंटे भर में उसकी टीआरपी रेटिंग स्काईरॉकेट कर जाती है. कौन सा मीट हैं यह भाई जिसके लिये लाइन लग जाती है!

ऐसा नहीं है कि मैं सामाजिकता नहीं समझता. स्वभाव से मैं अत्यंत संकोची और इंट्रोवर्ट हूं. पर लोगों के मिलने और उनके विचार विमर्श की अहमियत को बखूबी जानता हूं. लेकिन क्या ऐसा नहीं है कि यह मीट ज्यादा ही पक रहा है? लोग ज्यादा ही मिलनसार हो रहे हैं; वह भी गर्मी के मौसम में जब परिन्दा भी छाया में बैठना पसन्द करे बनिस्पत 25-50 मील चल कर ऐसे सम्मेलन में जाये.

अंतरमुखी व्यक्तित्व का तो यह आलम है कि मैं अपनी शादी में भी इसलिये गया था कि वहां प्रॉक्सी नहीं चलती. अन्यथा जितने निमंत्रण मिलते हैं; कोशिश यही रहती है कि अपने टोकन उपहार का लिफाफा कोई सज्जन लेकर जाने को तैयार हो जायें. मुझे मालुम है कि समारोह में अनेक लोग आयेंगे और हम जैसे कोने में गुम-सुम खड़े रहने वाले को कोई मिस नहीं करेगा.

भीड़ में भी रहता हूं वीराने के सहारे

जैसे कोई मन्दिर किसी गांव के किनारे

तन की थकान तो उतार ली है पथ ने

जाने कौन मन की थकान को उतारे

जैसा भी हूं वैसा ही हूं समय के सामने

चाहे मुझे नाश करे, चाहे ये संवारे

- रमानाथ अवस्थी

ब्लॉगर मीट के बारे में मेरी एक जिज्ञासा है – इंटरनेट पर आदमी की जो इमेज बनती है, वह प्रत्यक्ष मिलने पर अगर अलग होती होगी तो क्या प्रतिक्रिया होती होगी मन में? एक ब्लॉग पर ब्लॉगर मीट की फोटो देख कर एक सज्जन के बारे में लिखा है – वे ब्लॉग पर गरीबों के पक्षधर हैं पर मिलन की फोटो में “लाजपत नगर के किसी ताज़ा-ताज़ा सफल होतेव्यापारी की छविज्यादा पेश करते दीख रहे थे!”


अव्वल तो लोग अपना प्रोफाइल नेट पर कुछ डिसीविंग ही रखते हैं. हर आदमी/औरत वह होते नहीं जो प्रोजेक्ट करते हैं. हर आदमी अपना नाम भी चाहता हैं और बेनाम धुरविरोधी भी रहना चाहता है. हर आदमी शार्प/सफल/विटी/सम्वेदनशील/जिम्मेदार दीखना चाहता है. पर वह जो होता है, वह होता है.

क्या ब्लॉगर मिलन में लोग वह दिखते हैं जो होते हैं? वहां प्रत्यक्ष मिलने में जो प्रोफाइल पेश करते हैं, उसमें कोई छिपाव नहीं होता? यह प्रश्न एक प्रसन्नमन आत्मतुष्ट ब्लॉगर-मिलन में जाने वाले ब्लॉगर को उलूल-जुलूल लग सकता है. लोगों से मिलने बतियाने; गप सड़ाका करने; अपने फोन नम्बर एक्स्चेंज करने और चाय-पान-भोजन के बाद वापस आने में क्या गलत है? पर प्रश्न है तो क्या किया जाये?

एक सार्थक चीज वह हो सकती है कि लोग ब्लॉग पर अपने प्रोफाइल में आत्मकथ्य के रूप में हाइपरबोल में लपेट-लपेट कर लिखें. अपने बारे में तथ्यात्मक विवरण दें. अपने को तो महिमामण्डित करें और डीरेट. इसपर हिन्दी ब्लॉगर विचार कर सकते हैं. जब यहां कुनबा ही छोटा सा है तो डिसीविंग प्रोफाइल का क्या तुक?

मेरे जैसा व्यक्ति भीड़ में अकेला होता है और ब्लॉग पर लिखता इसलिये है कि अपने को जीवित/वाइब्रेण्ट होने का दस्तावेजी सबूत भर दे सके. उसको “झुमरी तलैया में ब्लॉगर मीट” के पोस्ट की टीआरपी रेटिंग स्काईरॉकेट करना एक अजीब फिनामिना लगता है.

यो यत श्रद्ध: स एव स: – जिसकी जैसी प्रवृत्ति है वह वैसा ही है. और वह लेखन से भी पता चलता है और प्रत्यक्ष भी.

नेगोशियेशन तकनीक : धीरे बोलो, हिन्दी बोलो

June 7, 2007

मैं अपनी बताता हूं. जब मैं आवेश में होता हूं भाषण देने या ऐसी-तैसी करने के मूड़ में होता हूं तो अंग्रेजी निकलती है मुंह से. धाराप्रवाह. और जब धीरे-धीरे बोलना होता है, शब्दों को तोल कर बोलना होता है तब हिन्दी के सटीक शब्द पॉपकॉर्न की तरह एक-एक कर फूट कर सामने आते हैं.

मेरे एक यूनियन नेता ने इस ऑब्जर्वेशन का अच्छा फायदा उठाया था नेगोशियेशन में. रेलवे में पर्मानेण्ट नेगोशियेशन मशीनरी (पी.एन.एम.) की बैठक यूनियन से दो माह में होती है. मुद्दों पर आवेश आना बहुधा हो जाता है. यूनियन नेता अगर कमजोर विकेट पर हों तो आपको आवेशित करने का यत्न भी करते हैं आवेश में आप कुछ अंट-शंट कहें और वे उसी का हो हल्ला कर बच जायें. एक कमजोर मुद्देपर उन्होने ऐसा ही किया। मुझे प्रोवोक किया। आवेश में मैंने धुंआधार भाषण झाड़ा – अंग्रेजी में. पिन-ड्रॉप साइलेंस में वे सारे सुनते रहे. मैने कोई स्लिप भी नहीं की, जिसका वे फायदा ले सकें. भाषण खतम कर विजयी मुद्रा में मैने देखा सब के हाव भाव से लगा कि शायद मैने प्वॉइण्ट स्कोर कर लिया है.

अब यूनियन नेता की बारी थी. बड़ी शालीनता से वह प्रारम्भ हुआ. शुद्ध हिन्दी में साहब, आप तो पढ़े-लिखे हैं. मैं तो आठवीं पास कर स्टीम इंजन का बॉयलर मैन भर्ती हुआ था. वैसे भी यह क्षेत्र (हिन्दी भाषी क्षेत्र) है. हमें तो अंग्रेजी आती नहीं. आप तो बहुत अच्छा बोल रहे थे, इसलिये मैने टोकना ठीक नहीं समझा. पर असली बात यह है कि आपने जो कहा हमें समझ में नहीं आया. न हो तो मेरे साथियों से भी पूछ लीजिये. पी.एन.एम. में 20 यूनियन वाले होते हैं. सबने मुण्डी हिलाई समझ में नहीं आया।

मेरा भाषण ध्वस्त हो गया. मैं कितना भी ओजस्वी बोला होऊं; नेगोशियेशन स्किल में हार गया. वह बन्दा अगर समझ नहीं आ रहा था तो बीच में रोक सकता था. पर बड़े धैर्य से उसने मेरी स्टीम निकाली. फिर जो माहौल बना, उसमें आप कितनी रिपीट परफार्मेंस देने की कोशिश करें हिन्दी में; वह समा बन ही नहीं सकता. नेगोशियेशन में समय का बड़ा महत्व है. वह मैने खो दिया था। नेता गुज्जर मसले की तरह उस मामले को आगे सराकाने में सफल रहा।

हमारे यूनियन नेता बहुत ही तेज होते हैं वक्तृता शक्ति और आर्ट आफ नेगोशियेशन में। एक उदहारण मेरे अंग्रेजीके ब्लॉग पर है.

बाद में मैने उस नेता को अकेले में पकड़ा- क्यों गुरू, अंग्रेजी नहीं आती? वह बोला साहब आपके तर्कों पर चर्चा कर मैदान हारना थोड़े ही था मुझे!

इस लिये मैने नसीहत गांठ बांध ली. अगला जब हिन्दी वाला हो और ऑफीशियली समझाना हो तो धीरे बोलो, हिन्दी बोलो.

क्या केवल जुनून काफी है जीने के लिये?

June 5, 2007

एक उमर थी जब इब्ने सफी, बी.ए. की जासूसी दुनियां सबेरे पहले पीरियड में शुरू करते थे और तीसरे पीरियड तक खतम हो जाती थी. किराये वाली दुकान से आधी छुट्टी में दूसरी लाते थे और स्कूल से लौटते समय तक वह भी समाप्त हो जाती थी. सातवीं-आठवीं कक्षा में जुनून था जासूसी उपन्यास का. फिर गुलशन नन्दा का जुनून आया. उसके बाद हाई स्कूल तक कविता का मन बना. पहले खुद लिखीं शृंगार की कवितायें. अधकचरी. किसी को सुना भी नहीं सकते थे. वह जुनून ज्यादा नहीं चला. उसके बाद कवि आये. हायर सेकेण्डरी में हिन्दी के पर्चे में खूब कोट किया कवियों को उत्तर देने में.

जुनूनों की परम्परा चलती रही. एक जुनून छूटता तो वापस नहीं आता. दूसरा आता. पर जुनून का वैक्यूम नहीं रहा.

अब ब्लॉगरी का जुनून है. यह कब तक चलेगा, कह नहीं सकते. जिन्दगी जुनून हॉपर की हो गयी है. इस जुनून से उस जुनून पर फुदकने की. यह एक एचीवर का ब्ल्यू-प्रिण्ट नहीं है. इस जुनून हॉपिंग से आप कुछ हद तक प्रतिष्ठा पा सकते हैं. पर आप नोबल पुरस्कार नहीं पा सकते/करोड़पति नहीं बन सकते/गान्धी-डार्विन-स्टीफन हॉकिंस-कलाम-रदरफोर्ड-पंत जैसी शख्सियत नहीं बन सकते. यह रियलाइजेशन अपने आप में पेनफुल है. पुनर्जन्म के सिद्धांत को छोड दें तो भगवान ने यही एक जिन्दगी तो दी है कर गुजरने के लिये.

जुनून हॉपिंग के कई वर्जिन फील्ड अभी बचे हैं. ब्रेन इंजरी पर हिन्दी में साइट का निर्माण उनमें से एक है. दो दिन पहले आलोक पुराणिक जी ने बताया है कि वे पांच किताबें साल भर में ठेलने वाले हैं। किताब ठेलना भी एक अच्छा जुनून हो सकता है (पुराणिक जी क्षमा करें,पुस्तक लेखन अपके लिए मिशन हो सकता हैं। जूनून वाली बात आप पर लागू नहीं होती). पर जुनून समय के टुकड़े को सार्थक कर सकता है; जिन्दगी सार्थक नहीं कर सकता.

मित्रों, जुनून एक तरफ; अगर चुनाव करना हो बनने का तो मैं एक गुड ब्लॉगर की बजाय एक पूअर गान्धी-डार्विन-स्टीफन हॉकिंस-कलाम-रदरफोर्ड-पंत बनना ज्यादा पसन्द करूंगा. गुड ब्लॉगर बनने में कुछ महीनों/सालों का टाइम फ्रेम है. पर पूअर गान्धी-डार्विन-स्टीफन हॉकिंस-कलाम-रदरफोर्ड-पंत बनने में तो जीवन भर की साधना चाहिये। लेकिन दोनों में कोई द्वंद्व भी हैं क्या?

केवल जूनून काफी नहीं है जीने के लिये!

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अनूप शुक्ला जी (एण्ड ऑल द ब्लॉगर्स ऑफ रेप्यूट), डू यू हैव अ कमेण्ट? एण्ड आइ वुड लाइक अ लॉंगिश कमेण्ट. यह मेरे बतौर ब्लॉगर चलते रहने के लिये और शायद अन्य ब्लॉगरों के लिये भी जरूरी होगा.

अज़दक, बुढ़ापा और ब्लॉगरी की मजबूरी

June 4, 2007

जबसे अज़दक जी ने बूढ़े ब्लॉगर पर करुणा भरी पोस्ट लिखी है, तब से मन व्यथित है. शीशे में कोई आपका हॉरर भरा भविष्य दिखाये तो और क्या होगा! इस तरह सरे आम स्किट्सोफ्रेनिया को बढ़ावा देने का काम अज़दक जैसे जिम्मेदार ब्लॉगर करेंगे तो हमारे जैसे इम्पल्सिव ब्लॉगर तो बंटाढ़ार कर सकते हैं. उनके खिलाफ कुछ कहना उचित नहीं लगता (करुणामय पोस्ट के जले पर नमक लगाना ब्लॉगरी के एथिक्स के खिलाफ है). लिहाजा, यह पोस्ट लिख कर ही अपनी मानसिक हलचल शांत कर लेते हैं.

पहली बात अगर आपने अज़दक जी की पोस्ट नहीं पढ़ी है तो पढ़ लें. उसका हाइपर लिंक उन्ही की पोस्ट से उड़ाई बाजू की फोटो में है. फोटो क्लिक करें. पोस्ट ज्यादा लम्बी नहीं है और समझने के लिये, मैं आश्वस्त करता हूं, कि आपको केवल तीन बार ही पढ़ना होगा प्रिंटाआउट ले कर नहीं पढ़ना पड़ेगा.

उसमें जो बूढ़ा ब्लॉगर है, उसमें मुझे अपना काल्पनिक भविष्य दीखता है. वैसे उसमें अज़दक जी का भी भविष्य होगा. वे तो दशक भर से पटखनी खाये पड़े हैं अत: हमारी बजाय उनके भविष्य का वह ज्यादा रियलिस्टिक चित्रण है. पता नहीं अज़दक जी का भरा-पूरा परिवार है या नहीं और उन्हें नहलाने को कोई डॉटर-इन-लॉ है या नहीं; अपने पास तो कोई कानूनी डॉटर नहीं है. अत: इस पक्ष को डिस्काउण्ट किये देते हैं. वैसे भी, प्रोस्ट्रेट ग्रंथि की मॉलफंक्शनिंग/बुड़बुड़ाने की आदत/हीनता/गठिया तो आम चीजें हैं जो जवानों में भी आती जा रही हैं. उनका क्या रोना रोयें.

फिर भी, बुढापे का अकेलापन और उसमें जवान ब्लॉगरों के ब्लॉग पर जा-जा कर टिपेरने की जो मजबूरी है वह मैं पूरी शिद्दत से महसूस करता हूं. आप जैसे-जैसे बुढ़ाते जायेंगे, आपकी ब्लॉग पोस्ट और टिप्पणिया उत्तरोत्तर आउट-ऑफ-सिंक होती जायेंगी. आपकी टिप्पणी भी वैलकम नहीं करेगा चिठेरा. कहेगा बुढ़ऊ को और कोई काम नहीं है; चले आते हैं सड़ल्ली सी बहादुरशाह ज़फर के जमाने की टिप्पणी करने!

यह तो अजदक जी की हाँ में हाँ वाली बात हो गयी जो प्वाइंट आफ डिस्प्यूट हैं वह यह कि ये बातें कह कर क्यों वे अपने सीक्रेट लीक कर रहे हैं और क्यों हम जैसे को बैठे ठाले नर्वस कर रहे हैं? क्या चाहते हैं की हम ब्लॉगरी बंद कर दें? बड़ी मुश्किल से जिंदगी के उत्तरार्ध में लिखने लगें हैं और अजदक जी के पास तो लिखने को अखबार का पन्ना भी हैं हमें कौन छपेगा अगर ब्लॉगरी बंद कर दें तो!

है कोई उपाय अज़दक जी? नहीं तो और कोई सज्जन बतायें!

अच्छा चलें. चलने के दो कारण हैं :

  • एक – आज दिल्ली बन्द है गुज्जर महासभा की ओर से. अभी तक तो दिल्ली पंहुचने वाली गाड़िया नहीं रोकी है उन्होने, पर क्या भरोसा कब रोक दें गाजियाबाद और फरीदाबाद में. फिर मेरे सिस्टम पर तीन दर्जन प्रेस्टीजियस गाड़ियो की लाइन लग जाये।
  • दूसरे, अज़दक जी वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनके पक्ष में उनकी बिरादरी लामबन्द हो गयी तो मुझे कवर (कब्र नही!) की तलाश कर रखनी होगी!

ब्लॉग लिखने के 10 टिप्स

June 1, 2007
मेरा 80% ध्यान राजस्थान के दंगों पर लगा है. बड़ी मुश्किल से नॉर्थ-साउथ का एक ट्रेन रूट चल रहा है. कल रात धोलपुर के पास हमला हुआ, इस बचे रूट को भी खण्डित करने का. हमला नाकाम कर दिया गया। पर परेशानी बरकरार है.

इसलिये एक फटाफट वाली पोस्ट प्रस्तुत करता छुट्टी पाता हूं अंग्रेजी से कबाड़ी हुई पोस्ट है यह.

ये फोटो में सज्जन हैं दर्रेन रोव्स. ये प्रोब्लॉगर डाट नेट नामक ब्लॉग लिखते हैं. उसमें हैं ब्लॉगरी की टिप्स. इन सज्जन की फोटो पर क्लिक कर आप लिंक की गयी पोस्ट पर जायें. उसमें ब्लॉग लिखने की 10 टिप्स हैं. अब अंग्रेज बता रहा है तो अच्छी टिप्स ही होंगी. आप क्लिक न करना चाहें तो मैं वो 10 टिप्स नीचे लिख दे रहा हूं:

  1. कम शब्दों में ब्लॉग में अपना मंतव्य स्पष्ट करें.
  2. अपनी पोस्ट में समान विषयक वेब पन्नों को दारुजोषित की नाईं लिंक करें. (उनके शब्द हैं लिंक लाइक क्रेजी. जिसके लिये मैने अपनी पिछ्ली पोस्ट में लिखा है लिंक लाइक मैड!)
  3. कम से कम लिखें.
  4. 250 शब्द काफी हैं ( यह मुझे बहुत पसन्द आता है. उससे ज्यादा अपनी क्षमता ही नहीं है!)
  5. हेडलाइन स्नैपी यानी सजीव बनायें.
  6. बुलेट प्वाइंट का प्रयोग करें चिठ्ठा खर्रे वाला न हो; पचाने योग्य फार्मेट में हो.
  7. वाक्य छोटे, पैराग्राफ कम और सब हैडिंग युक्त हों.
  8. अपने स्टाइल में निरंतरता बनाये रखें.
  9. सर्च के लिये पोस्ट में की-शब्दों को छितराये रखें.
  10. पब्लिश बटन दबाने से पहले आप पोस्ट का सम्पादन अवश्य करें.

बाकी, अंग्रेजी में पढ़ना हो तो फोटो पर क्लिक करें.

लिंक से लिंक बनाते चलो

May 31, 2007

काकेश; लगता हैं बड़े मंजे ब्लॉगर हैं। अरे वाह हम भी लिंक्ड हुई गवा नाम से एक बढ़िया पोस्ट लिखी हैं। यह रेखांकित करती है ब्लॉगिंग के मेन फन्डा को। आप को अगर पोस्ट पढ़वानी है तो लिन्क कीजियेलिंक लाइक मैडजितना अधिक आप लिंक करेंगे, जितना विस्तार आपकी लिंकिंग में होगा उतनी आपकी हिटास बुझेगी। अब यही परेशानी है की काकेश की (या किसी अन्य की) खुराफात (!) कुछ ऐसा लिंक न कर दे की वह रसायन शास्त्र ही नहीं दर्शन शास्त्र नजर आये!
जब मैं यह लिखता हूं कि लिंक लाईक ए मैड तो मैं यह अन्डरलाईन करना चाहता हूँ कि ब्लोगरी एकांत में लिखा जाने वाला लेखन नहीं हैं। इसलिए जो वह लिखते हैं जिसे केवल आइन्स्टीन पढ़ सकता हैं तो वह गफलत में रहते हैं। ब्लॉग लेखन एक-एक कड़ी की तरह बढ़ता है – जैसे एक व्यक्ति कहानी का एक पैरा सोचे और दूसरा अपनी कल्पना से आगे बढ़ाये, तीसरा और आगे… ब्लोगारी ओर्गेनिक केमिस्ट्री की तरह हैं – कार्बन-हाइड्रोजन बॉण्ड लिंक से लिंक बनाते विशालकाय अणु बन जाते हैं। अंतत: जो पदार्थ सामने आता हैं उसकी लिंक बनाने की प्रक्रिया प्रारम्भ करते समय कल्पना भी नहीं की गयी होती। अब देखिए न – काकेश अब तक लिंक का उल्लेख कर सफ़ाई दे रहे थे की वे नारी नहीं नर हैं और शादी शुदा हैं। कल बहुत संभव हैं की वे रसायन शास्त्र के गुण-दोष की चर्चा करने लगें। परसों अगर कोई और मैड लिंकर किसी और विज्ञान/शास्त्र को जोड़ बैठा तो बात किसी और तरफ मुड़ जायेगी।
काकेश लिंक मिल रहा हैं न!