Archive for the ‘Surroundings’ Category
July 8, 2007
हरिकेश प्रसाद सिन्ह मेरे साथ जुड़े इंस्पेक्टर हैं. जो काम मुझे नहीं आता वह मैं एच पी सिन्ह से कराता हूं. बहुत सरल जीव हैं. पत्नी नहीं हैं. अभी कुछ समय पहले आजी गुजरी हैं. घर की समस्याओं से भी परेशान रहते हैं. पर अपनी समस्यायें मुझसे कहते भी नहीं. मैं अंतर्मुखी और वे मुझसे सौ गुणा अंतर्मुखी. राम मिलाये जोड़ी…
एक दिन मैने पूछ ही लिया – जमीन है, कौन देखता है?
बोले – यहां से करीब 20-25 किलोमीटर दूर गंगा के कछार में उनकी जमीन है. करीब 40 बीघा. कहने को तो बहुत है पर है किसी काम की नहीं. खेती होती नहीं. सरपत के जंगल बढ़ते जा रहे हैं.
पूरे चालीस बीघा बेकार है?
नहीं. लगभग 10 बीघा ठीक है पर उसमें भी खेती करना फायदेमन्द नहीं रहा.
क्यों?
मर खप के खेती करें पर जंगली जानवर – अधिकतर नीलगाय खा जाते हैं. नीलगाय को कोई मारता नहीं. पूरी फसल चौपट कर देते हैं.
नीलगाय तो हमेशा से रही होगी?
नहीं साहब, पहले आतंक बहुत कम था. पहले बाढ़ आती थी गंगा में. ये जंगली जानवर उसमें मर बिला जाते थे. अब तो दो दशक हो गये बाढ़ आये. इनके झुण्ड बहुत बढ़ गये हैं. पहले खेती करते थे. रखवाली करना आसान था. अब तो वही कर पा रहा है जो बाड़ लगा कर दिन-रात पहरेदारी कर रहा है. फिर भी थोड़ा चूका तो फसल गयी.
मुझे लगा कि बाढ़ तो विनाशक मानी जाती है, पर यहां बाढ़ का न होना विनाशक है. फिर भी प्रश्न करने की मेरी आदत के चलते मैं प्रश्न कर ही गया – वैसा कुछ क्यों नहीं बोते जो नीलगाय न खाती हो?
एच पी सिन्ह चुप रहे. उनके पास जवाब नहीं था.
मैने फिर पूछा – जट्रोफा क्यों नहीं लगाते? रेलवे तो लाइन के किनारे जट्रोफा लगा रही है. इसे बकरी भी नहीं चरती. अंतत: बायो डीजल तो विकल्प बनेगा ही.
हरिकेश की आंखों में समाधान की एक चमक कौन्धी. बोले – दुर्वासा आश्रम के पास एक सभा हुई थी. जट्रोफा की बात हुई थी. पर कुछ हुआ तो नहीं. लगा कि उन्हे इस बारे में कुछ खास मालुम नहीं है.
लेकिन मुझे समाधान दिख गया. सब कड़ियां जुड़ रही हैं. गंगा में पानी उत्तरोत्तर कम हो रहा है. कछार जंगल बन रहा है सरपत का. नील गाय बढ़ रहे हैं. जट्रोफा की खेती से जमीन का सदुपयोग होगा. खेती में काम मिलेगा.
जट्रोफा के बीजों का ट्रांसस्ट्रेटीफिकेशन ट्रांसएस्टेरीफिकेशन के लिये छोटे-छोटे प्लाण्ट लगेंगे. उनमें भी रोजगार होगा. बायोडीजल के लाभ होंगे सो अलग. हरिकेश की पूरे 40 बीघा जमीन उन्हे समृद्ध बनायेगी. वह जमीन जहां आज उन्हे कुछ भी नजर नहीं आ रहा.
गंगा में पानी कम हो रहा है तो कोसना और हताशा क्यों? उपाय ढ़ूंढ़े. फिर मुझे लगा कि मैं ही तो सयाना नहीं हूं. लोग देख-सोच-कर रहे होंगे….भविष्य में व्यापक परिवर्तन होंगे. एच पी सिन्ह की जमीन काम आयेगी.
देखें, आगे क्या होता है.
आप जरा जट्रोफा पर जानकारी के लिये यह साइट देखें.
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July 5, 2007
अमुक हमारा कम्पिटीटर है. बस चलाता है. बनारस-इलाहाबाद से नागपुर. हमारा कम्पिटीटर यानी रेलवे का कम्पीटीटर. ट्रेन में जगह न मिले तो बनारस स्टेशन से उसके चेले यात्री को उसकी बस में बिठाने ले आते हैं. उसे एक ही कष्ट है कि रेलवे किराया क्यों नहीं बढ़ाती. किराया बढ़ाये तो वह भी अपनी बस का किराया अनुपात में बढ़ा दे.
रोड ट्रांसपोर्ट में अमुक की पैठ है. थाने-आर.टी.ओ. से कभी कोई तकलीफ नहीं. मंत्री की रिश्तेदारी में शादी-वादी अटेण्ड कर आता है. पत्रकार सम्मेलन भी कर लेता है. लोकल टीवी में बस-ट्रांसपोर्ट एसोसियेशन की ओर से बोलते भी पाया जाता है. सन 2015 तक एम.एल.ए. और 2020 तक मंत्री बनने का लक्ष्य है. कुल मिला कर कैल्कुलेटेड तरीके से चल रहा है. कभी-कभी हमसे भी मिल लेता है. हमसे कभी काम नहीं पड़ा, पर उसके नेचर में मेल-जोल रखना है, सो अपना धर्म निभाता है. यदा-कदा नेम-ड्रापिंग के लिये हमारे नाम का प्रयोग करता है, बस. हमें भी वह पसन्द है क्योंकि मिलते ही चरण-स्पर्श करता है.
नागपुर जाता है तो बस से ही. रिजर्वेशन के लिये भी तंग नहीं करता. बस से क्यों जाता है – पूछने पर काम की बात बताई. बोला – “भैया, ये बस के ड्राइवर-कण्डक्टर जब रूट पर चलते हैं तो पनीर की सब्जी ही खाते हैं. अमिषभोजी हुये तो चिकन के नीचे नहीं उतरते. सभी ढ़ाबे वालों से सेटिंग है. जहां रोकेंगे वहां इनकी खातिरदारी तय है. अब मैं साथ जाऊं तो मेरे लिये भी वही ठाठ रहेगा कि नहीं!”
उसने और बताया – “बस का ड्राइवर जब तक बस चलाता है तब तक डनहिल से नीचे की सिगरेट नहीं पीता. और जब बस से उतार देता हूं तो सिगरेट के टोटे बीन कर पीता है.” मुझे अपने ट्रेन में चलने वाले रेल-कर्मियों की याद आयी. उन्हें दण्डित करने को अगर उनका पास/प्रिविलेज टिकेट या एक आध इंक्रीमेण्ट बन्द कर दो तो सेहत पर कोई असर नहीं होता. पर अगर ट्रेन से उतार दो तो हफ्ते भर में मुंह पर मक्खियां भिनभिनाने लगती हैं. ट्रेन में चलने का रुआब बड़ी चीज है. ठीक बस के ड्राइवर की तरह.
मैने उससे कहता हूं कि कभी हमें भी साथ ले चले. घर में अरहर की दाल और नेनुआ खाते बहुत हो गया. कुछ चेंज हो जाना चाहिये. वह तुरंत हां कर देता है. फिर ऐसा गायब होता है कि महीनों नहीं दिखता.
बस अकस्मात, यदा कदा वह अवतरित हो जाता है – चरण धूलि लेने को! आज के जमाने में जब ‘स्वारथ लाइ करहि सब प्रीती’ ब्राण्ड के हैं तो बिना स्वार्थ के चरण छूने वाला वही भर है. न वह मेरा काम करता है न मैं उसका.
बस वह सदा यही कहता पाया जाता है – भैया किराया-भाड़ा बढ़ाते क्यों नहीं. जैसे की रेल बज़ट बनाने का काम मेरे ही जिम्मे हो!
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July 1, 2007
मेरे एक मित्र हैं. सारी टिप्स लेने और सारी गणना करने के बाद एक शेयर खरीदते है. फिर पांच मिनट बाद उसकी वैल्यू चेक करते हैं. अगर पांच पैसे बढ़ गयी तो दस लोगों को बताते हैं कि उनकी स्टॉक रिसर्च कितनी जबरदस्त है. उनका सेंस आफ टाइम कितना एक्यूरेट है.
ये जितने ब्लॉगर हैं, पोस्ट लिखते ही नारद चेक करते हैं कि फीड एग्रीगेटर ने पकड़ी की नहीं. समय बीतता है और बेताबी बढ़ती है. कुछ कर नहीं सकते – सिवाय बार-बार चेक करने और अंगूठा चूसने के. अचानक पोस्ट नारद के पन्ने पर आ जाती है तो जैसे कमोड पर पेट हल्का हो जाता है. बस उसके बाद स्टैटकाउण्टर की रीडिंग देखने लगते हैं. कई बार अन्देशा होता है कि कहीं स्टैटकाउण्टर वाले की साइट में स्नैग तो नहीं आ गया. वर्ना इतनी धांसूं पोस्ट पर भी रीडिंग बढ़ नही रही!
मेरे पिताजी पुराने जमाने के हैं. वे कम्प्यूटर नहीं देखते. वे घर के बिजली/पानी के मीटर को देखते हैं. ज्यादातर बिजली का मीटर – उसकी डिस्क कितनी तेजी से भाग रही है. चश्मा लगा कर बिजली की यूनिट का काउण्टर पढ़ने का यत्न करते हैं. नहीं पढ़ पाते तो किसी को बुला कर पढ़वाते हैं. अगर काउण्ट आशानुरूप हुआ तो ठीक, वर्ना एक-आध पंखा-बत्ती का बटन टीप देते हैं.
मेरी पत्नीजी बार-बार कहती रहीं कि घण्टों ब्लॉगरी करते हो पर उससे धेले भर की भी तो आमदनी नहीं है. उनकी नैगिंग से परेशान हो कर मैने गूगल-एडसेंस के विज्ञापन चस्पां कर दिये हैं ब्लॉग पर. अब पत्नीजी का एक महत्वपूर्ण काम यह पता करना है कि एडसेंस एकाउण्ट में कितने पैसे आये. पाठक लोग इतने मिरचुक हैं कि कोई विज्ञापन क्लिक ही नहीं करता. इस रेट से तो 3 साल लगेंगे 100 डॉलर कमाने में. पर जब देखो तब वे एडसेंस एकाउण्ट चेक करती रहती हैं. एकाउण्ट चेक करने में ही आमदनी से ज्यादा खर्चा होता होगा!
भरतलाल (मेरा बंगलो-पियुन) दिनमें तीन बार बगीचे की नेनुआ-लौकी नाप आता है. नेनुओं की संख्या बताता है और लौकी के बारे में यह जानकारी देता है कि बस दो-तीन इंच और बढ़ गयी तो लौकी का कोफ्ता बन सकेगा.
मैं टीवी नहीं देखता पर एक बार की याद है. दो-तीन दिन तक पूरा देश बार-बार टीवी खोल कर देख रहा था और बता रहा था कि प्रिंस अभी गढ्ढ़े में ही है. बाहर निकलने में बस थोड़ा टाइम और लगेगा.
हर आदमी कुछ न कुछ देख रहा है. तकनीकी विकास ने देखने के संसाधन बढ़ा दिये हैं. इस देखने से कोई छोटी-बड़ी क्रांति हो रही हो –ऐसा कतई नहीं है. पर समय है, उसे गुजारना है तो बस; देखो!
बार-बार देखो, हजार बार देखो, देखने की चीज है ये समय दिलरुबा.
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June 26, 2007
मैं किशोर बियाणी की पुस्तक पढ़ रहा हूं – “इट हेपण्ड इन इण्डिया.”* यह भारत में उनके वाल-मार्टिया प्रयोग का कच्चा चिठ्ठा है. कच्चा चिठ्ठा इसलिये कि अभी इस व्यवसाय में और भी कई प्लेयर कूदने वाले हैं. अंतत: कौन एडमण्ड हिलेरी और तेनसिंग बनेंगे, वह पता नहीं. पर बियाणी ने भारतीय शहरों में एक कल्चरल चेंज की शुरुआत तो कर दी है.
बिग बाजार के वातावरण का पर्याप्त इण्डियनाइजेशन हो गया है. वहां निम्न मध्यम वर्गीय मानस अपने को आउट-ऑफ-प्लेस नहीं पाता. वही नहीं, इस वर्ग को भी सर्विस देने वाला वर्ग – ड्राइवर, हैल्पर, घरमें काम करने वाली नौकरनी आदि, जिन्हे बियाणी इण्डिया-2 के नाम से सम्बोधित करते हैं – भी बिग बाजार में सहजता से घूमता पाया जाता है. इस्लाम में जैसे हर तबके के लोग एक साथ नमाज पढ़ते हैं – और वह इस्लाम का एक सॉलिड प्लस प्वॉइण्ट है; उसी प्रकार बिग बाजार भी इतने बड़े हेट्रोजीनियस ग्रुप को एक कॉम्प्लेक्स के नीचे लाने में सफल होता प्रतीत होता है.
पर मैं किशोर बियाणी का स्पॉंसर्ड-हैगियोग्राफर नहीं हूं. बिग-बाजार या पेण्टालून का कोई बन्दा मुझे नहीं जानता और उस कम्पनी के एक भी शेयर मेरे पास नही हैं. मैं बिग बाजार में गया भी हूं तो सामान खरीदने की नीयत से कम, बिग-बाजार का फिनामिनॉ परखने को अधिक तवज्जो देकर गया हूं.
और बिग-बाजार मुझे पसन्द नहीं आया.
मैं पड़ोस के अनिल किराणा स्टोर में भी जाता हूं. तीन भाई वह स्टोर चलाते हैं. हिन्दुस्तान लीवर का सुपरवैल्यू स्टोर भी उनके स्टोर में समाहित है. तीनो भाई मुझे पहचानते हैं – और पहचानने की शुरुआत मैने नही, उन्होने की थी. अनिल किराणा को मेरे और मेरे परिवार की जरूरतें/हैसियत/दिमागी फितरतें पता हैं. वे हमें सामान ही नहीं बेंचते, ओपीनियन भी देते हैं. मेरी पत्नी अगर गरम-मसाला के इनग्रेडियेण्ट्स में कोई कमी कर देती है, तो वे अपनी तरफ से बता कर सप्लिमेण्ट करते हैं. मेरे पास उनका और उनके पास मेरा फोन नम्बर भी है. और फोन करने पर आवाज अनिल की होती है, रिकार्डेड इण्टरेक्टिव वाइस रिस्पांस सिस्टम की नहीं. मैं सामान तोलने की प्रॉसेस में लग रहे समय के फिलर के रूप में बिग-बाजार से उनके कैश-फ्लो पर पड़े प्रभाव पर चर्चा भी कर लेता हूं.
बियाणी की पुस्तक में है कि यह अनौपचारिक माहौल उनके कलकत्ता के कॉम्प्लेक्स में है जहां ग्राहक लाइफ-लांग ग्राहक बनते हैं और शादी के कार्ड भी भेजते हैं. (पुस्तक में नॉयल सोलोमन का पेज 89 पर कथन देखें – मैं अंग्रेजी टेक्स्ट कोट नहीं कर रहा, क्योंकि हिन्दी जमात को अंग्रेजी पर सख्त नापसन्दगी है और मैं अभी झगड़े के मूड में नहीं हूं). इलाहाबाद में तो ऐसा कुछ नहीं है. कर्मचारी/सेल्स-पर्सन ग्राहक की बजाय आपस में ज्यादा बतियाते हैं. ग्राहक अगर अपनी पत्नी से कहता है कि ट्विन शेविंग ब्लेड कहां होगा तो सेल्स-गर्ल को ओवर हीयर कर खुद बताना चाहिये कि फलानी जगह चले जायें. और ग्राहक बेचारा पत्नी से बोलता भी इस अन्दाज से है कि सेल्स-गर्ल सुनले. पर सेल्स-गर्ल सुनती ही नहीं! अनाउंसमेण्ट तो उस भाषा में होता है जो बम्बई और लन्दन के रास्ते में बोली जाती है – इलाहाबाद और कोसी कलां के रास्ते नहीं.
परस्पर इण्टरेक्शन के लिये मैं अनिल किराना को अगर 10 में से 9 अंक दूंगा तो बिग बाजार को केवल 4 अंक. अनिल किराना वाला चीजों की विविधता/क्वालिटी/कीमतों मे किशोर बियाणी से कम्पीट नहीं कर पायेगा. पर अपनी कोर कम्पीटेंस के फील्ड में मेहनत कर अपनी सर्वाइवल इंस्टिंक्ट्स जरूर दिखा सकता है. ऑल द बेस्ट अनिल!
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It Happened In India
by Kishore Biyani with Dipayana Baishya
Roopa & Co, Rs. 99.
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June 26, 2007
मेरा लोगों से अधिकतर इण्टरेक्शन ज्यादातर इण्टरकॉम-फोन-मीटिंग आदि में होता है. किसी से योजना बना कर, यत्न कर मिलना तो बहुत कम होता है. पर जो भी लोग मिलते है, किसी न किसी कोण से रोचक अवश्य होते हैं.
अधिकतर लोग मेरे मुख्यालय में सोमवार की महाप्रबन्धक महोदय की रिव्यू मीटिंग में मिलते हैं. ये होते हैं 20 से तीस साल तक की अवधि सिविल/इंजीनियरिंग सेवा में गुजारे हुये विभागाध्यक्ष लोग. इनमें से प्रत्येक व्यक्ति कम से कम 5000 रेल कर्मियों पिरामिड के शीर्ष पर होते हैं. सामान्य जन-अवधारणा से अलग, अपनी प्रतिभा और अपनी मेहनत से उपलब्धियां पाये और उन उपलब्धियों से – एक ब्लॉगर की तरह ही आत्म-मुग्ध लोग हैं ये. मै इनमें से कुछ सज्जनों के विषय में बिना नाम लिये लिखने का यत्न करता हूं.
एक सज्जन हैं; जो सबसे ज्यादा इम्पेशेण्ट दीखते हैं. अगर उनके अपने विभाग की बात न हो तो दूसरों को समस्या का समाधान सुझाने में पीछे नहीं रहते. और कोई दूसरा भला आपकी बिन मांगी सलाह क्यों हजम करने लगा? परिणाम द्वन्द्व में होता है – अक्सर. मजे की बात यह हुई की किसी ने मुझे बताया कि ये बम-ब्लास्टिया सज्जन “परम-शांति” नामक शीर्षक से एक ब्लॉग भी लिखते हैं. मैने ब्लॉग देखा. बिना चित्रों के, अंगेजी के एक ही फॉंण्ट में, ब्लैक एण्ड ह्वाइट रंग में था वह. फुरसतिया जी की पोस्टों से दूने लम्बे लेख थे उसमें. वास्तव में परम शांति थी. कौन पढ़े! एक पोस्ट पर एक कमेण्ट दिखा तो उसे पढ़ने का मन हुआ. वह निकला उन्ही के किसी कर्मचारी का जो न जाने किस मोटिव से ऐसी प्रशंसा कर रहा था जैसे कि वह पोस्ट-लेखन 10 कमाण्डमेण्ट्स के बाद सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज हो!
दूसरे सज्जन हैं जो वानप्रस्थ आश्रम की उम्र में चल रहे हैं पर कुंवारे हैं. कविता करते हैं. फाइलों पर अनिर्णय की बीमारी है – उनके हस्ताक्षर लेना चक्रव्युह भेदने से कम नहीं है. एक बार पूंछा गया कि ये हस्ताक्षर क्यों नहीं करते? बढ़िया कमेण्ट था – हस्ताक्षर करना आता होता तो निकाह न हो गया होता?
तीसरे सज्जन हैं – जो सरनेम नहीं लगाते. पर जब भी किसी से पहली बार मिलते हैं तो येन-केन-प्रकरेण अपना जाति-गोत्र स्पष्ट कर देते हैं; जिससे कोई उन्हें अनुसूचित वर्ग का न समझ ले. विद्वान हैं, अत: जो भी पढ़ते हैं, उसे सन्दर्भ हो चाहे न हो, मीटिंग के दौरान बोल जरूर देते हैं. यानि ब्लॉगरों को जबरी लिखने की बीमारी होती है; उन्हे जबरी विद्वत्व प्रदर्शन की! कौन क्या कर लेगा!
चौथे सज्जन हैं – जो हर चीज का तकनीकी हल तलाशते हैं. उनके घर में अच्छी खासी प्रयोगशाला और जंक मेटीरियल का कबाड़खाना है. रेलवे में गलत फंसे हैं. किसी कम्पनी में होते जो मेवरिक सोच को सिर माथे पर लेती तो उनकी वैल्यू हीरे की तरह होती. पर यहां तो जैसे ही वे कोई समाधान सुझाते हैं – चार लोग तड़ से ये बताते हैं कि ये फलाने कोड/मैनुअल/रूल के तहद परमिसिबल नहीं है! फिर भी, मानाना पड़ेगा कि वे अधेड़ उम्र में भी (रेलवे जैसे ब्यूरोक्रेटिक सेट-अप में) इतने सतत विरोध के बावजूद तकनीकी इनोवेशन की उर्वरता खो नहीं बैठे!
ऊपर जो लिखा है उन सज्जनों के रोचक पक्ष है. उनकी दक्षता और मानवीय उत्कृष्टता के पक्ष अधिक महत्वपूर्ण हैं. पर उन पक्षों के लिये मुझे बहुत अधिक लिखना पड़ेगा. इसके अलावा कुछ सज्जन और हैं, जिन पर फिर कभी मन बना तो लिखूंगा.
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June 8, 2007
सुबोध पाण्डे मेरे सीनियर थे रेल सेवा में. जब मैने रेलवे ज्वाइन की, तब वे पश्चिम रेलवे में मुम्बई मण्डल के वरिष्ठ परिचालन अधीक्षक थे. बाद में विभिन्न पदों पर वे मेरे अधिकारी रहे.
मैं यहां उनके सनिध्य को बतौर रेल अधिकारी याद नहीं कर रहा. रिटायरमेण्ट के बाद वे अभी कहां पर हैं, यह भी मुझे पता नहीं. उन्हें एक अच्छे व्यक्ति के रूप में स्मरण कर रहा हूं. उनसे मै रेलवे के इतर अनेक प्रकार के मामलों पर बात कर लेता था. वे एक प्रतिभावान परिवार से थे. उनके बड़े भाई श्री विनोद चन्द्र पाण्डेय भारत के कैबिनेट सेक्रेटरी रह चुके थे जो कालांतर में बिहार और अरुणांचल के राज्यपाल रहे. अपने बड़े भाई की तरह सुबोध भी विस्तृत ज्ञान के व्यक्ति थे. मैं जो भी पुस्तक उनसे चर्चा के लिये उठाता था वह उन्होने या तो पहले ही पढ़ी होती थी या उसकी विषयवस्तु से वे अपने अध्यन की गहराई के माध्यम से काफी परिचित होते थे. मुझे एक बार लगा कि मैं शायद इन्टरनेट के बारे में उनसे बेहतर परिचय रखता हूं और उसपर अगर बात करूं तो मैं हमेशा की तरह उनसे जानकारी लेने की बजाय इसबार उन्हे कुछ बता सकूंगा. मेरा सोचना नितांत गलत निकला. बात प्रारम्भ की ही थी कि उन्होनें मुझे उनके प्रिय विषय इतिहास पर दर्जनों साइट बता ड़ालीं – इस आग्रह के साथ कि मैं उन्हे अवश्य देखूं. मैं अपने ही लासे में फंस गया!
Subodh Pande is a person with knowledge spread in varied fields. History was his pet. But you could discuss Big Bang theory with equal ease with him. He used to ask me to send dry Neem leaves to him to Bombay because he had vast collection of books. To save books from worms in humid Bombay climate he wanted to make layers of Neem leaves before placing them. He had sound knowledge of Astrology too, though he never flashed his knowledge.
It is not easy to find such people in daily life so near and so interactive with you!
एक समय सुबोध मेरे मण्डल रेल प्रबन्धक थे कोटा में. मैं वरिष्ठ मण्डल परिचालन प्रबन्धक था. रेलगाड़ी परिचालन की व्यस्तता से 11 बजे तक निवृत्त होता था. सवा इग्यारह बजे उनका फोन आता था – चले आओ. मुझे उनके ज्ञान वर्धक प्रवचन की तलब होती थी और उन्हे शायद एक ट्यूंड-फ्रीक्वेंसी वाले शिष्य की! मै उनके पास जाते समय उनकी दो-तीन नोटिंग्स वाली फाइलें साथ ले जाता था. उनकी हस्तलिपि इतनी खराब थी कि उन्ही से पूछना पड़ता था कि उन्होने क्या लिखा है. कई बार तो अपनी हैण्डराइटिंग से वे स्वयम जूझते थे और हार कर नयी नोटिंग लिखते थे. उनके साथ मैने कोटा के अनेक म्यूजियम, पुरानी पुस्तकों के संग्रह, बून्दी की हवेलियां आदि देखे जो शायद अकेले मैं कभी न देख पाता. अंग्रेजों की कब्रों पर उन्होने बड़ा अध्ययन किया था. उनके इंक्रिप्शंस से वे यह जानने का यत्न करते थे कि विभिन्न समय पर किस-किस प्रकार के अंग्रेज भारत में थे.
गजब के जुनून वाले आदमी थे सुबोध. मैं सोचता हूं कि अब भी उनमें वही इंक्विजिटिव मनुष्य जिन्दा होगा. अभी वे 65 वर्ष के होंगे.
इतना विशद अध्ययन, इतने सरल और जीवन में उत्साह से भरे सुबोध पाण्डे – वे कई अर्थों में मेरे रोल माडल हैं.
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June 7, 2007
मैं अपनी बताता हूं. जब मैं आवेश में होता हूं – भाषण देने या ऐसी-तैसी करने के मूड़ में होता हूं तो अंग्रेजी निकलती है मुंह से. धाराप्रवाह. और जब धीरे-धीरे बोलना होता है, शब्दों को तोल कर बोलना होता है तब हिन्दी के सटीक शब्द पॉपकॉर्न की तरह एक-एक कर फूट कर सामने आते हैं.
मेरे एक यूनियन नेता ने इस ऑब्जर्वेशन का अच्छा फायदा उठाया था नेगोशियेशन में. रेलवे में पर्मानेण्ट नेगोशियेशन मशीनरी (पी.एन.एम.) की बैठक यूनियन से दो माह में होती है. मुद्दों पर आवेश आना बहुधा हो जाता
है. यूनियन नेता अगर कमजोर विकेट पर हों तो आपको आवेशित करने का यत्न भी करते हैं – आवेश में आप कुछ अंट-शंट कहें और वे उसी का हो हल्ला कर बच जायें. एक कमजोर मुद्देपर उन्होने ऐसा ही किया। मुझे प्रोवोक किया। आवेश में मैंने धुंआधार भाषण झाड़ा – अंग्रेजी में. पिन-ड्रॉप साइलेंस में वे सारे सुनते रहे. मैने कोई स्लिप भी नहीं की, जिसका वे फायदा ले सकें. भाषण खतम कर विजयी मुद्रा में मैने देखा – सब के हाव भाव से लगा कि शायद मैने प्वॉइण्ट स्कोर कर लिया है.
अब यूनियन नेता की बारी थी. बड़ी शालीनता से वह प्रारम्भ हुआ. शुद्ध हिन्दी में – “साहब, आप तो पढ़े-लिखे हैं. मैं तो आठवीं पास कर स्टीम इंजन का बॉयलर मैन भर्ती हुआ था. वैसे भी यह ‘क’ क्षेत्र (हिन्दी भाषी क्षेत्र) है. हमें तो अंग्रेजी आती नहीं. आप तो बहुत अच्छा बोल रहे थे, इसलिये मैने टोकना ठीक नहीं समझा. पर असली बात यह है कि आपने जो कहा हमें समझ में नहीं आया. न हो तो मेरे साथियों से भी पूछ लीजिये.” पी.एन.एम. में 20 यूनियन वाले होते हैं. सबने मुण्डी हिलाई – समझ में नहीं आया।
मेरा भाषण ध्वस्त हो गया. मैं कितना भी ओजस्वी बोला होऊं; नेगोशियेशन स्किल में हार गया. वह बन्दा अगर समझ नहीं आ रहा था तो बीच में रोक सकता था. पर बड़े धैर्य से उसने मेरी स्टीम निकाली. फिर जो माहौल बना, उसमें आप कितनी रिपीट परफार्मेंस देने की कोशिश करें हिन्दी में; वह समा बन ही नहीं सकता. नेगोशियेशन में समय का बड़ा महत्व है. वह मैने खो दिया था। नेता गुज्जर मसले की तरह उस मामले को आगे सराकाने में सफल रहा।
हमारे यूनियन नेता बहुत ही तेज होते हैं वक्तृता शक्ति और आर्ट आफ नेगोशियेशन में। एक उदहारण मेरे अंग्रेजीके ब्लॉग पर है.
बाद में मैने उस नेता को अकेले में पकड़ा- क्यों गुरू, अंग्रेजी नहीं आती? वह बोला – साहब आपके तर्कों पर चर्चा कर मैदान हारना थोड़े ही था मुझे!
इस लिये मैने नसीहत गांठ बांध ली. अगला जब हिन्दी वाला हो और ऑफीशियली समझाना हो तो धीरे बोलो, हिन्दी बोलो.
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May 31, 2007
परसों रात में मेरा केन्द्रीय-कंट्रोल मुझे उठाता रहा. साहब, फलाने स्टेशन पर गुज्जरों की भीड़ तोड फोड कर रही है. साहब, फलने सैक्शन में उन्होने लेवल क्रासिंग गेट तोड दिये हैं. साहब, फलानी ग़ाड़ी अटकी हुयी है – आगे भी दंगा है और पीछे के स्टेशन पर भी तोड़ फोड़ है…. मैं हूं उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में पर समस्यायें हैं राजस्थान के बान्दीकुई-भरतपुर-अलवर-गंगापुर सिटी-बयाना के आस-पास की। यहाँ से गुजरने वाली ट्रेनों का कुछ भाग में परिचालन मेरे क्षेत्र में आता है. राजस्थान में गुज्जर अन्दोलन ट्रेन रनिंग को चौपट किये है. रेल यात्रियों की सुरक्षा और उन्हें यथा सम्भव गंतव्य तक ले जाना दायित्व है जिससे मेरा केन्द्रीय-कंट्रोल और मैं जूझ रहे हैं.
पिछली शाम होते-होते तो और भी भयानक हो गयी स्थिति. कोटा-मथुरा रेल खण्ड पर अनेक स्टेशनों पर तोड़-फोड़. अनेक जगहों पर पटरी से छेड़-छाड़. दो घण्टे बैठ कर लगभग 3 दर्जन गाड़ियों के मार्ग परिवर्तन/केंसिलेशन और अनेक खण्डों पर रात में कोई यातायात न चलाने के निर्णय लिये गये. अपेक्षा थी कि आज रात सोने को मिल जायेगा. जब उपद्रव ग्रस्त क्षेत्रों से गाड़ियां चलायेंगे ही नहीं तो व्यवधान क्या होगा?
पर नींद चौपट करने को क्या उपद्रव ही होना जरूरी है? रात के पौने तीन बजे फिर नींद खुल गयी. पड़ोस में झोपड़ीनुमा मकान में कच्ची घानी का तेल पिराई का प्लांट है. उस भाई ने आज रात में ही तेल पिराई शुरू कर दी है. हवा का रुख ऐसा है कि नाक में तेल पिराई की गन्ध नें नींद खोल दी है.
जिसका प्लांट है उसे मैं जानता नहीं. पुराने तेल के चीकट कनस्तरों और हाथ ठेलों के पास खड़े उसे देखा जरूर है. गन्दी सी नाभिदर्शना बनियान और धारीदार कच्छा पहने. मुंह में नीम की दतुअन. कोई सम्पन्न व्यक्ति नहीं लगता. नींद खुलने पर उसपर खीझ हो रही है. मेरे पास और कुछ करने को नहीं है. कम्प्यूटर खोल यह लिख रहा हूं. गुज्जर आन्दोलन और तेल पिराई वाला गड्ड-मड्ड हो रहे हैं विचारों में. हमारे राज नेताओं ने इस तेल पिरई वाले को भी आरक्षण की मलाई दे दी होती तो वह कच्ची घानी का प्लाण्ट घनी आबादी के बीच बने अपने मकान में तो नहीं लगाता. कमसे कम आज की रात तो मैं अपनी नींद का बैकलाग पूरा कर पाता.
आरक्षण की मलाई लेफ्ट-राइट-सेण्टर सब ओर बांट देनी चाहिये. लोग बाबूगिरी/चपरासी/अफसरी की लाइन में लगें और रात में नींद तो भंग न करें.
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May 23, 2007
नौटियाल जी (विश्व के सारे नौटियाल क्षमा करें; यह छ्द्म नाम से वास्तविक चरित्र पर पोस्ट है और वास्तविक सज्जन नौटियाल नही हैं) पिछली रात ऑफीसर्स क्लब में दारू के काउण्टर पर ही जमे थे. वैसे वे सामान्यत: क्लब में वहीं पाये जाते थे. अगले दिन मण्डल रेल प्रबन्धक ने उन्हे काम में अपडेट न रहने पर भरी सभा में खूब धोया. बेचारे को थोड़ा हैंगओवर बचा था. सूरत दयनीय सी थी.
नौटियाल जी अगर आपके साथ यात्रा पर हों तो उनका भोजन/चाय आपके जिम्मे होता था. और तो और सैलून में उनकी अटैची भी नहीं होती थी. पैण्ट की पीछे की जेब में अपना टूथ ब्रश ले कर चलते थे. पैंट-कमीज और अधोवस्त्र जो पहने होते थे वही वे शाश्वत पहने रह सकते थे. टूथ-पेस्ट और साबुन देना आपके जिम्मे होता था. दाढ़ी उनकी ज्यादा बढ़ती नहीं थी।
प्रोमोशनल अनुरोध : कृपया शिवकुमार मिश्र और ज्ञानदत्त पाण्डेय का ब्लॉग भी देखने का कष्ट करें। हम इसे रोचक जुगल बंदी बनाने का यत्न करेंगे।
ब्रेन इतना शार्प था कि थोड़ा कुछ मालुम हो तो विशुद्ध गोली और मासूमियत से अपना काम चला लेते थे. पर उसदिन हैन्गओवर के चलते डीरेल हो गये.
मैं उन्हे अपने कमरे में ले आया. चाय का आदेश दिया. चूंकि वे उस समय अर्जुन-विषाद योग से ग्रस्त लग रहे थे,
मैने भग्वद्गीता पर प्रवचन प्रारम्भ कर दिया. स्थितप्रज्ञ दर्शन पर मैं धाराप्रवाह अंग्रेजी में बोलने लगा. नौटियाल जी उपयुक्त प्रकार से सिर हिला रहे थे. मैं और जोश में बोलने लगा. मेरा प्रवचन 15-20 मिनट चला होगा. इस बीच मैने और इम्प्रेस करने को अपने ब्रीफ केस से गीताप्रेस वाली भग्वद्गीता की प्रति निकाल कर 3-4 श्लोक भी कोट कर दिये.
एक सफल वक्ता की तरह मैने सोचा कि आज मैने एक विषाद युक्त जीव का भला किया है. नौटियाल जी जाने लगे तो बोले – “बॉस, ये किताब बड़ी अच्छी मालुम पड़ती है. जरा इसका ऑथर और पब्लिशर बताना. मेरे डैड किताबें पढ़ते हैं. उन्हे बताऊंगा.”
मेरे समाज-सुधारक/वक्ता/मोटीवेशनल लीडरपने की अचानक कैसे फूंक निकल गयी; मुझे आभास तक नहीं हुआ. मुझमें इतनी ताकत नहीं बची थी कि कहता – “वैशम्पायन व्यास ने लिखी है. कृष्ण नाम के व्यक्ति के सरमंस हैं इसमें. और पब्लिशर्स तो हजारों हैं.”
मेरा मुंह अवाक खुला का खुला था. नौटियाल जी मेरे कमरे से जा चुके थे.
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May 19, 2007
मैं दफ्तर जाते समय ड्राइवर को टेप/रेडियो बजाने की इजाजत नहीं देता. उस समय मुझे अखबार पढ़ना होता है. अंग्रेजी का अर्थ जगत का अलग से रंग का अखबार. उसमें गला रेत कर हत्या के अवसाद मूलक समाचार नहीं होते. सर्र-सर्र चलती कार में बिजनेस स्टेण्डर्ड का वाचन करते बड़ी अभिजात्य साहबी अनुभूति होती है.
पर शाम को वापस लौटते समय धुन्धलका होता है और अखबार या पुस्तक नहीं पढ़ी जा सकती. ड्राइवर यह जानता है और अपना टेप/रेडियो फुल वाल्यूम पर रखता है. कभी भोजपुरी (श्लीलाश्लील) गाने सुनाता है.
कभी ऑल इण्डिया रेडियो का “आपकी फरमाइश – फोन इन कार्यक्रम”. मुझे गानों में रुचि कम है, उसका मैं बन्धुआ श्रोता होता हूं. पर आपकी फरमाइश की बात-चीत बहुत एम्यूज़ करती है.
बेचारे श्रोता घंटों से फोन नम्बर घिस रहे होते हैं. फोन लगने पर उनकी खुशी केवल छलकती नहीं, बहती दीखती है. ऐसी खुशी नये-नये ब्लॉगरी में आये व्यक्ति को होती है जिसे समीर जी (या उनके जैसे जोश बढ़ाऊ टिपेरे) ने टिप्पणी दे कर कृतार्थ किया हो.
“जी मेर नाम सपना; माफ करें प्रीती है … वो जी सपना स्कूल का नाम है; प्रीती घर का … मेरी ये दोस्त रिंकी भी आप से बात करना चाहती है … बड़ी देर से ट्राई कर रहे थे … फोन लगने पर इत्ता अच्छा लग रहा है … जी वो फलानी फिल्म का ढिमाका गाना सुनना है … जी मेरी मम्मी भी आ गयी हैं … वे भी बात करेंगी … आपको रोज सुनते हैं …”
“मेरा नाम गब्बर सिघ है जी … मुझे तो आप पहचानती ही होंगी … ये अजब इतिफाक है जी कि मैं जब भी फोन मिलाने में सफल होता हूं, आपकी ही ड्यूटी होती है (गब्बर के यह लपेटने पर उद्घोषिका लिपिड़ियाती है, वह उसकी नौकरी है. गली में यह डायलॉग बोलते गब्बर तो कहती – लगाऊं हरामी के पिल्ले दो चप्पल?) …जी वो 2-3 साल पहले फलाने जी प्रोग्राम पेश करते थे, बतायेंगी वे आजकल कहां हैं … उन्हे मेरी नमस्ते कहियेगा”
बिल्कुल हिन्दी ब्लॉगरी जैसा माहौल. यहां गदहा सम्मेलन की चर्चा किये चले जाते हैं अरुण जी. शादी का ब्लॉग-पत्र (ई-निमंत्रण) होता है चिठ्ठों पर. पुत्र-रत्न प्राप्ति की खबर होती है. प्राउड ताऊ जी भतीजे का फोटो पेश करते हैं. ये ही क्यों, हम भी भरतलाल की सगाई या कुल्फी लेकर उपस्थित रहते हैं. केवल कुछ ही हंसी को तलाक दिये ब्लॉगर हैं, जो विद्वतापूर्ण लिखते हैं और डिक्शनरी से लैस उनके बन्धुआ/पट्टीदार पाठक टिपेरते हैं.
बस इन विद्वतजनों को छोड़ दें तो हिन्दी ब्लॉगरी बहुत मस्त चीज है – बिल्कुल फोन इन प्रोगाम की तरह! यहाँ माहौल देसी है, अंग्रेजी ब्लॉगरी की तरह फार्मल नहीं।
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