Archive for the ‘Techniques’ Category

माइज़र कार्यक्रम देगा प्लास्टिक कचरे से डीजल

July 4, 2007

मित्रों, पेण्टागन 11 करोड़ का फण्ड दे रहा है माइज़र (MISER) कार्यक्रम के लिये. अगर यह शोध कार्यक्रम सफल रहा तो प्लास्टिक के कचरे का समाधान निकल आयेगा. आप तो जानते ही हैं कि प्लास्टिक बायो-डीग़्रेडेबल नहीं है. उसका कचरा हम आने वाली पीढ़ियों को पर्यावरण की बदसूरती की विरासत के रूप में निर्मित कर रहे हैं. यह कार्यक्रम आशा की किरण जगाता है कि भविष्य की पीढ़ियां हमें स्वार्थी के रूप में याद नहीं करेंगी.

यह कार्यक्रम है क्या? पॉलिटेक्निक यूनिवर्सिटी, ब्रुकलेन, न्यूयॉर्क में प्रोफेसर डा. रिचर्ड ग्रास मोबाइल इण्टीग्रेटेड सस्टेनेबल इनर्जी रिकवरी (MISER) प्रोग्राम के नाम से एक शोध कार्य कर रहे हैं. वे बॉयो-तेल (जैसे सोया तेल) से प्लास्टिक बना रहे हैं. यह प्लास्टिक आज के खनिज तेलों से बने प्लास्टिक जैसा ही है. इसके प्रयोग से जो कचरा बनेगा, वह आज के प्लास्टिक के कचरे की तरह कालजयी दैत्य नहीं होगा! उसे अगले 500 वर्षों तक सभ्यता को ढ़ोना नहीं पड़ेगा. वरन उस कचरे की चिन्दियां कर, उसके खमीरीकरण से उत्पन्न होगा डीजल जो ऊर्जा भी प्रदान करेगा.

पेण्टागन को इसमें रुचि इसलिये है कि उसे विषम स्थलों पर प्लास्टिक युक्त रसद भेजनी पड़ती है और उन जगहों पर उसकी इन्धन की भी जरूरतें होती हैं. उस रसद का कचरा अगर इन्धन भी उपलब्ध करा दे तो क्या कहने!

(डा. रिचर्ड ग्रास, बायो तेलों से बने बायो-प्लास्टिक की शीट दिखाते हुये)

आप यह समझने के लिये निम्न 2 स्थितियों की तुलना करें:

  • स्थिति 1. खनिज तेल -> प्लास्टिक -> प्लास्टिक के उत्पाद -> उपयोग के बाद नष्ट न होने वाला धरती और समुद्र को नर्क बनाने वाला कचरा.
  • स्थिति 2. बायो-तेल -> बायो-प्लास्टिक (प्लास्टिक के सभी गुणों से युक्त) -> प्लास्टिक के उत्पाद -> उपयोग के बाद कचरा -> कचरे की श्रेडिंग -> गुनगुने पानी में चिन्दी के रूप में कचरे का खमीरीकरण -> 3-5 दिन चली प्रक्रिया के बाद घोल पर उत्पन्न डीजल ऊपर तैरने लगता है.

स्थिति 2 में यूरेका की अनुभूति होती है. और यह स्थिति प्रयोगशाला स्तर पर कारगर हो चुकी है.खमीरीकरण की प्रक्रिया में कुछ ऊर्जा व्यय होती है पर उससे उत्पन्न डीजल कहीं अधिक ऊर्जा युक्त होता है. कुल मिला कर बायो-प्लास्टिक कचरा रूपांतरित हो कर ऊर्जा स्रोत बनेगा. डा. ग्रास का शोध अभी वाणिज्यिक तौर पर लांच करने की अवस्था में नहीं आया है. पर जब पेण्टागन इसमें अपनी रुचि जता रहा है, तो मामला यूं ही नहीं है.

आप याद कर सकते हैं कि बहुत सी जीवनोपयोगी खोजें विश्व युद्ध और अंतरिक्ष विज्ञान के अनुसन्धान से ही हमें मिली हैं. क्या पता यह पर्यावरणीय विकट समस्या का समाधान हमें पेण्टागन के माध्यम से मिले.

आप पूरी खबर के लिये न्यूयार्क टाइम्स के इस पन्ने का अवलोकन करें.

एथेनॉल चलायेगा कार – आपकी जीत होगी या हार!

June 30, 2007

मुझे यह आशा है कि देर सबेर ब्राजील की तर्ज पर भारत में एथेनॉल का प्रयोग डीजल/पेट्रोल ब्लैण्डिंग में 20-25% तक होने लगेगा और उससे न केवल पेट्रोलियम पर निर्भरता कम होगी, वरन उससे पूर्वांचल/बिहार की अर्थव्यवस्था भी चमकेगी. अभी चार दिन पहले बिजनेस स्टेण्डर्ड में लीड स्टोरी थी कि कई बड़े स्टॉक मार्केट के बुल्स – राकेश झुनझुनवला सहित, बड़े पैमाने पर देश-विदेश में बायो-ईन्धन के स्टॉक्स में खरीद कर रहे हैं.

और परसों बिजनेस स्टेण्डर्ड में ही, उसके उलट है कि एथेनॉल का प्रयोग आपकी कार के लिये मारक हो सकता है – गलती से भी थोड़ा पानी मिल गया बायो-फ्यूल में तो आपकी कार नष्ट हो सकती है. अर्थात उस प्रकार की बात कि एक दिन किसी स्केंडेनेवियायी देश की रिपोर्ट को बैनर हेडलाइन के साथ छपा पायें कि चाकलेट खाकर आप 110 साल जी सकते हैं. और दूसरे दिन आप ढ़िमाकी लैब के डायरेक्टर के माध्यम से शोध से लाभांवित हों कि चॉकलेट स्वास्थ्य के लिये जहर हैं.

(एथेनॉल का ऑर्गेनिक सूत्र)

और देखें – यह आस्ट्रेलिया की रिपोर्ट – एथेनॉल मिक्सिंग 20 लाख आस्ट्रेलियायी कारों का बाजा बजाने वाली है. या फिर स्टॉनफोर्ड न्यूज का 18 अप्रेल का यह पन्ना जो कहता है कि एथेनॉल के वाहन मानव स्वास्थ्य पर काफी दुष्प्रभाव ड़ालते हैं.

लोग इस सोच से भी दुबले हो रहे हैं कि बायो फ्यूल की खेती से अन्न उत्पादन कम होगा और भुखमरी बढ़ेगी.

उक्त लिंक वाले लेख मैने पढ़े हैं और मेरे अपने निष्कर्ष निम्न हैं -

  1. एथेनॉल के बतौर बॉयो फ्यूल प्रयोग के रोका नहीं जा सकता. यह उत्तरोत्तर बढ़ेगा. खनिज तेल की कीमतें – डिमाण्ड-सप्लाई-लोभ के चलते देर सबेर स्काईरॉकेट करेंगी. और फिर कोई चारा नहीं होगा एथेनॉल ब्लैण्डिंग के विकल्प पर अमल करने के आलावा.
  2. भारत में जट्रोफा/कुरंज/रतनजोत/गन्ना का प्रयोग एथेनॉल बनाने में उत्तरोत्तर बढ़ेगा. वाहनों के इंजन बेहतर बनेंगे.
  3. एथेनॉल रिफाइनरी छोटे पैमाने पर अनेक स्थानों पर होंगी और उससे ईन्धन की यातायात जरूरतें भी कम होंगी.
  4. एथेनॉल ब्लैंडिंग 99.9% शुद्ध हो; बिना पानी मिलाये; यह सुनिश्चित करने के कठोर उपाय किये जायेंगे.
  5. स्वास्थ्य पर एथेनॉल के दुष्प्रभाव पर अभी अंतिम शब्द कहे नहीं गये हैं. इसी प्रकार वाहनों के ऊपर होने वाले दुष्प्रभाव उस तरह के लोगों की भविष्यवाणिंया हैं जो टिटिहरी ब्राण्ड सोच प्रसारित करते हैं.
  6. अर्थव्यवस्था या बाजार तय करेंगे कि भविष्य क्या होगा. पर्यावरणवादी अपनी आदत के अनुसार आपस में लड़ते रहेंगे.
  7. पर्यावरणवादी ही कहते हैं कि एथेनॉल वायु प्रदूषण से लड़ने का बहुत अच्छा उपाय है. इससे ग्लोबल वार्मिंग कम होती है, कार्बन मोनोक्साइड और कार्बन डाइआक्साइड के उत्सर्जन में 30% कमी आती है. इससे ज्वलनशील तत्व/जहरीले पदार्थ/ठोस पार्टीकल के उत्सर्जन में भी क्रमश: 12,30 व 25% की कमी आती है. (आप “ethanol fuel blending plus points” आदि के गूगल सर्च कर लें – ढ़ेरों लिंक मिलेंगे!)

मित्रों, मैं अपने बचपन से देखता आ रहा हूं. एक लॉबी एक कोण से लिखती है. दूसरी लॉबी दूसरे कोण से. मौका परस्त एक लॉबी कभी दूसरी लॉबी में तब्दील भी हो जाती है! अंतत: जो होना होता है वह होता है. एथेनॉल का विरोध करने वाले भविष्य में बायो-फ्यूल चलित कार में जायेंगे बायो-फ्यूल के खिलाफ प्रदर्शन करने को!

आपको कौन लिंक कर रहा है?

June 28, 2007

यह कई बार होता है कि आप वहां नहीं पहुंचते जहां आपके ब्लॉग को लिंक कर कुछ कहा जा रहा हो. आपको ट्रिगर ही नहीं मिलता. उदाहरण के लिये मैने यूनुस पर एक पोस्ट लिखी – नाई की दुकान पर हिन्दी ब्लॉगर मीट. उनके ब्लॉग को लिंक किया. प्रतीक्षा की कि यूनुस देखने आयेंगे और ज्ञान-बीड़ी का सुट्टा लगायेंगे. उस पोस्ट पर टिपेरे आये और (मेरे स्टेण्डर्ड से) थोक में आये. पर नही आये तो यूनुस जिनपर पोस्ट लिखी थी!

जब यूनुस ने मेरी किसी और पोस्ट पर टिप्पणी की तो मैने उन्हे ई-मेल कर चेताया कि सही पोस्ट पर टिप्पणी करो जनाब. और फिर जो टिप्पणी यूनुस ने की वह बहुत ही अच्छी है. अंश नीचे प्रस्तुत है:

यूनुस जी की टिप्पणी:
अरे अरे ज्ञान जी, पता नहीं कैसे आपकी इस ज्ञान बिड़ी का सुट्टा मारना भूल ही गया था । इसमें तो वो धूम्रपान निषेध का प्रतिबंध भी नहीं है । मुझसे भूल हो गयी जो इस पोस्‍ट को नज़र अंदाज़ कर दिया । तो आखिरकार आपने नाई की दुकान पर हमसे मुलाक़ात कर ही ली । ………
पर आपका लिखा बहुत अच्‍छा लगा । इसी तरह हमें ज्ञान बिड़ी पिलाते रहिये । जबलपुरिया हैं ज्ञान बिड़ी पीने के पुरानी आदत है । ये वो लत है जो हमसे छूटती नहीं ।……..

यूनुस की बात तो बतौर दृष्टांत है. असली सवाल है कि आप हाई-टेक ब्लॉगर गण सवेरे कुल्ला-मुखारी कर जब अपना कम्प्यूटर खोल कर ब्लॉग खंगालते हैं तो कैसे मालूम करते हैं कि आप पर किस-किस ने लिंक बना कर तीर चलाये हैं? इसके निश्चय ही कई तरीके होंगे. मैं आमंत्रण देता हूं कि आप टिपेरकर लोगों को अपना तरीका बतायें. अगर आपका तरीका ज्यादा मस्त हुआ तो मैं भी वह अपना लूंगा. अन्यथा मैं अपना तरीका बताने की हिम्मत जुटाऊंगा.

हमारे जैसे तो पुरनिया ब्राण्ड के ब्लॉगर हैं. न हमारा घेट्टो है न जवान ब्लॉगरों की जमात हमारे साथ है. पत्रकार या तकनीकी विशेषज्ञ भी नहीं है. रेलवे के तो लोग भी हिन्दी ब्लॉगरी में नही हैं जो हमें पट्टीदारी के लिहाज से लिंक करें. अत: हमें तो ज्यादा फायदा नहीं है अपने लिंक जानने की तकनीक का. पर मैं निश्चित ही चाहूंगा कि अगली बार यूनुस ज्ञान बीड़ी का सुट्टा लगाना भूल न जायें कि उन्हें ई-मेल करनी पड़े! इसी तरह आप लोगों पर भी कभी कंटिया फंसाऊं तो आप भी ओवरलुक न कर पायें!

फ्री-सॉफ्टवेयर : एक नियामत है मोजिल्ला फॉयरफॉक्स

June 22, 2007

भगवान ने फ्री फण्ड में नियामतें दी हैं वायु, जल, धरती…. इसी तरह सॉफ्टवेयर में मिला है फॉयरफॉक्स. जब कल श्रीश जी ने कहा कि फॉयरफॉक्स में शब्दकोश का सर्च इंजन उसपर चिपकाया जा सकता है (देखें मेरे ब्लॉग पर कल की गयी उनकी टिप्पणी) तो मैने देखा कि वह मैने पहले ही डाउनलोड कर रखा है. फ्री की चीज पर नजर जाती नहीं. यही दो चार डालर दे कर लिया होता तो घिस कर इस्तेमाल करते.

फॉयरफॉक्स जमाने से प्रयोग करता हूं और यह मुझे सबसे बढ़िया ब्राउजर लगता है. खुलता दन्न से है. गूगल सर्च टूल बार इण्टरनेट एक्स्प्लोरर की गूगल टूल बार से बेहतर है. इसके अलावा ऐड-ऑन सॉफ्टवेयर की बड़ी च्वाइस है. हिन्दी में कई ब्लॉग बढ़िया दिखते है, पर कुछ में मुझे एक्स्प्लोरर पर जाना होता है. इस को लेकर ज्यादा परेशानी नहीं है. अपने 90% काम के लिये मैं फॉयरफॉक्स का प्रयोग करता हूं. कोई आश्चर्य नहीं कि लगभग 24% ब्राउजर यातायात फॉयरफॉक्स के पास है.

स्टैटकाउण्टर वाले मुझे यह भी बताते हैं कि लोग कौन से ब्राउजर से मेरे ब्लॉग पर पहुंचते हैं. यह देख कर मुझे आश्चर्य होता है कि मोजिल्ला फॉयरफॉक्स प्रयोग करने वाले भी 20-22% ऐसे हैं जो उसके पुराने संस्करण से काम चला रहे हैं. मोजिल्ला फॉयरफॉक्स का 2.0 सीरीज का ब्राउजर उपलब्ध है पर काफी लोग मोजिल्ला फॉयरफॉक्स 1.5 या 1.0.7 का प्रयोग कर रहे हैं. गूगल वाले अपनी टूल बार के साथ मोजिल्ला फॉयरफॉक्स के लेटेस्ट संस्करण को डाउनलोड की सुविधा देते हैं. उसका उपयोग करने में बुद्धिमानी है. ऐसा फॉयरफॉक्स रेफरल ऐडवर्टिजमेंट हमने भी बाजू में अपने ब्लॉग पर लगा रखा है यह बताने को कि हम फॉयरफॉक्स के मुरीद हैं. वैसे फ्री-फण्ड के सॉफ्टवेयर में कई बार चोट हो गयी है जब उसके साथ वायरस/स्पाईवेयर उपहार में मिल जाते हैं. पर गूगल-फॉयरफॉक्स के साथ उसका खतरा नहीं.

सी-नेट रिव्यू में इण्टरनेट एक्स्प्लोरर 7 तथा फॉयरफॉक्स 2 का तीन जजों द्वारा तुलनात्मक आकलन किया गया है. कुल 5 मुद्दों पर आकलन है :

  • इंस्टॉलेशन की दिक्कतें
  • लुक एण्ड फील फैक्टर तथा बढ़ते प्रयोग कर्ता
  • टैब में ब्राउजिंग
  • अपग्रेडिंग और नये फीचर
  • सिक्यूरिटी और परफार्मेंस

तीनो जजों ने इन सभी मुद्दों पर फॉयरफॉक्स को बेहतर पाया है. अत: आपके पास अगर फॉयरफॉक्स नहीं है तो अजमायें, बढ़िया लगेगा. और साथ में श्रीश का शब्दकोश वाला सर्च जरूर डाउनलोड कर लीजियेगा.

मैं जानता हूं कि यह लिख कर मैं ई-पण्डित के कार्य क्षेत्र में अनावश्यक दखल दे रहा हूं. पर कभी-कभी सामान्य ज्ञान वाला भी विशेषज्ञों वाले टॉपिक पर (दोयम दर्जे का ही सही) लिख तो सकता है वह भी तब जब आप वास्तव में “फील-गुड़-फैक्टर” महसूस करते हों!

स्टैटकाउण्टर, ओधान कलेन और बिजनेस वीक

June 10, 2007

भग्वद्गीता और रामचरित मानस के बाद पिछले 3 महीने में जो सतत ध्यान से देखा है वह है स्टैटकाउण्टर! और जब स्टैट काउण्टर वाले ने पिछले हफ्ते फ्री में लॉग साइज 100 से 500 कर दिया तो मैं धन्य पा रहा था अपने को.

आज जब ओधान कलेन का ई-मेल आया तो वैसा ही था जैसे हिन्दी ब्लॉगर थोक में भेजते हैं जरा मेरी फलानी वाली पोस्ट पढ़ लीजिये. लेकिन उसमें अनुरोध था बिजनेस वीक के अवार्ड के लिये वोट देने का. जब बिजनेस वीक पर गया और पता चला कि योरोप के 25साल से कम के बिजनेस ऑंत्रेपिन्योर के लिये वोट देना है और स्टैटकाउण्टर का ओधान कलेन उसमें से एक है तो अजीब फीलिंग हुई. पहली तो यह कि वाह! क्या बन्दा है! चौबीस की उम्र और यंग ऑंत्रेपिन्योर के लिये नॉमिनेशन. वह भी बिजनेस वीक के अवार्ड के लिये!

दूसरी फीलिंग जो कुछ समय बाद आयी; वह थी क्या पण्डितजी (अपने आप को सम्बोधन) तुमने तो जिन्दगी भर घास ही खोदी!

ओधान कलेन अपने को जन्मजात ऑंत्रेपिन्योर कहता है. बारह की उम्र में उसने रिज्यूमे टाइपिंग बिजनेस सेट-अप किया. फिर वेब साइट डिजाइन में हाथ अजमाया. उसी से विचार बना स्टैटकाउण्टर का. यह कम्पनी उसने 16 साल की उम्र में लांच की (उस उम्र में हमारा मुख्य ध्येय था कि कक्षा में एक सवाल अंग्रेजी में पूछ सकें!).

ओधान कलेन का स्टैटकाउण्टर 14 लाख ग्राहकों के 20 लाख वेब साइट्स को काउण्टर प्रदान करता है. यह कम्पनी 9000,000,000 वेब पेज-व्यू ट्रैक करती है प्रति माह. रोज 1500 नये ग्राहक जोड़ रही है अपने साथ. और प्रॉफिट में तो है ही यह कम्पनी.

वाह! 14 लाख ग्राहकों में से कम से कम आधे तो अधोहन कल्लेन को वोट देंगे ही. मैने भी दे दिया.

बन्धु, उत्कृष्टता में उम्र तो कोई फैक्टर है ही नहीं.

अलवा-पलवा लेखन – ब्रेन इंजरी – मां सरस्वती का विधान

May 26, 2007

मेरी पत्नी मेरे हिन्दी ब्लॉग लेखन को अपने भदोहिया-बनारसी अन्दाज में अलवा-पलवा लेखन कहती हैं. अलवा-पलवा लेखन माने अण्ट-शण्ट/निठल्ला/यूंही/ उल्टे-सीधे बल्ले (या फिर हॉकी स्टिक से, और वह भी न मिले तो कपड़ा कचारने वाले पिटना) से बैटिंग नुमा लेखन ….
मित्रों, यह अलवा-पलवा लेखन मेरे काम आ गया ब्रेन इंजरी रिसोर्स सेंटर से कंटेण्ट प्रयोग की इजाजत लेने में.
मैने मार्च के अंत में ‘अच्छा मित्रों राम-राम’ कर ली थी. फिर लगा कि उसमें कंट्राडिक्शन है. मैं अगर हिन्दी में ब्रेन इंजरी पर वेब साइट की बात करता हूं; और हिन्दी में लिखने से मना करता हूं तो उसमें ईमानदारी नहीं है. इसलिये मैं टॉम एण्ड जैरी के टॉम की तरह अपनी पूंछ टुर्र से नीचे करते हुये फिर लिखने लगा था – रोज 200-250 शब्द का अलवा-पलवा लेखन!
जब ब्रेन इंजरी वाले मिलर जी ने मेरे हिन्दी वेब स्पेस के क्रिडेंशियल पूछे, तो अपने अलवा-पलवा लेखन से मैं अपने आप को हिंदी ब्लॉगर सबित कर पाया. अगर ‘अच्छा मित्रों राम-राम’ पर अड़ा रहता तो मिलर जी को क्या दिखाता?
इस लिये जब सुकुल जी लिखते हैं – जेहि पर जाकर सत्य सनेहू, मिलहि सो तेहि नहिं कछु सन्देहू। तब लगता है कि मां सरस्वती अपने प्रकार से शृजन कराती हैं – शांत, एक ध्येय के साथ और जो लगता ही नहीं कि होने जा रहा है. सब अपने विधान से कराती हैं. आगे भी शायद ऐसे ही होगा – उन्हीं के प्रकार से. मां काली के पदाघात सा नहीं होगा. पदाघात तो लग चुका है.
समीर जी कहते हैं – पुकारा तो नहीं गया मगर इतने सुंदर प्रयास में कुछ योगदान कर पाऊँ तो मेरा सौभाग्य….
यह जरूरी है स्पष्ट करना कि मैने पिछ्ली पोस्ट में नाम वह लिये थे जिनसे इस विषय में पहले किसी प्रकार की बात चीत हो चुकी थी.
यज्ञ में सभी का सहयोग मांगना और लेना अनिवार्य है…. और लगभग सभी यज्ञार्थी आ चुके हैं. जो नहीं ,वे भी रास्ते में ही होंगे.
और अरुण जी। वे तो मेरी तरह भुक्त भोगी निकले।
यज्ञ के अध्वर्यु जीतेंद्र जी के निर्देशन की प्रतीक्षा हैं अब। उन्हें कल मैंने ईमेल किया हैं। आज देखते हैं अध्वर्यु क्या टीम बनाते हैं और क्या टास्क तय करते हैं। रेलवे में अपने तरीके से काम करते कभी इन्फर्मल टीम का सदस्य बन कर काम नहीं किया। यहाँ तो निर्देश देने और कम्प्लायेंस लेने का प्रशासनिक माहौल होता हैं। उससे हट कर काम का आनंद मुझे मिलाने जा रहा हैं – भले ही जिंदगी में देर से ही सही!

ब्रेन-इंजरी पर वेब साइट – आइये मित्रों !

May 25, 2007

मैने ब्रेन-इंजरी पर वेब साइट बनाने के लिये सहयोग मांगा था। आप में से बहुतों ने अपनी संवेदनायें और सहयोग की तत्परता व्यक्त की थी. तदुपरंत परिचर्चा में भी उस विषय पर कुछ विचार हुआ था पर बात अटक कर रह गयी थी अथॉरिटेटिव मैडीकल कन्टेन्ट के अभाव पर. सहयोग करने वाले सभी इंफर्मेशन तकनीक के जगत के थे या हिन्दी के मेरे जैसे जनरल फील्ड के. मैने यह भाव अपनी पिछले दिनों की पोस्ट में भी व्यक्त किये थे.
अब, मां सरस्वती ने प्रार्थना सुन ली है।
मैने ब्रेन इंजरी रिसोर्स सेंटर से अप्रेल के प्रारम्भ में सम्पर्क किया था। उसके मैनेजिंग डायरेक्टर श्री कॉंस्टेंस मिलर ने कुछ दिन पहले मुझसे मेरे क्रिडेंशियल्स पूछे। बतौर ब्लॉगर अपने लेखन और आप सबके सहयोग की बात मने उनसे कही. श्री कॉंस्टेंस मिलर ने आज मुझे ई-मेल कर अपनी वेब साइट के मैटीरियल को उदार (और मेरे द्वारा ही व्यक्त की गयी शर्तों पर) तरीके से प्रयोग करने की अनुमति प्रदान कर दी है. कृपया उनका ई-मेल देखें.

श्री कॉंस्टेंस मिलर, एम.डी., ब्रेन इंजरी रिसोर्स सेंटर का ई मेल:
Dear Gyandutt;
Thank you for contacting Brain Injury Resource Center concerning your translation of material from our web and posting it on a blog in India. As you stated you will translate the material in “Hindi only for the web site I propose to build for the benefit of Hindi population predominantly in India? I shall quote your source wherever I use it and will not claim any right on the material or translation.”
I am agreeable to your proposal, as stated, concerning the use of said information.
Please credit Brain Injury Resource Center, http://www.headinjury.com/, as the source of this material
Again, thank you for contacting Brain Injury Resource Center, I
trust that you have been helped by the information provided. 206-621-8558
Sincerely,
Constance Miller , MA
Brain Injury Resource Center
PO Box 84151
Seattle WA 98124-5451
brain@headinjury.com


अब गेंद हम सब के पाले में है। इस विषय से जुड़ाव करते सभी मित्रगण; अगर हम ब्रेन इंजरी रिसोर्स सेंटर की वब साइट का पूअर क्लोन भी हिन्दी में बना पाये तो वह हिन्दी जगत की महती सेवा होगी. और हम सब के हिन्दी उत्साह को देख कर तो नहीं लगता कि हम पूअर क्लोन ही बना पायेंगें.
आवश्यकता अब है टीम बनाने की, एक्टीविटी आइडेण्टीफाई करने की और काम करने की। आप लोगों ने रामचरित मानस को नेट पर उपलब्ध कराया है. अब एक जमीनी, संवेदनात्मक और उपयोगी मसले पर काम करने का अवसर है.
हैलो; नितिन व्यास, मिर्ची सेठ, श्रीश, अनूप शुक्ल, नीरज रोहिल्ला, जीतेन्द्र चौधरी, आशीष श्रीवास्तव, शृजन शिल्पी, योगेश समदर्शी, महाशक्ति, राजीव, अमित और अन्य नये लोग —- आप सुन रहे हैं न!

कौन से “स्पैमर” से डर लगता है जी?

May 14, 2007

हरिराम जी से विनम्र निवेदन किया कि वे वर्ड-वेरीफिकेशन वाला चक्कर बंद करवा दें अपने चिठ्ठे पर. पचास की उम्र के बाद अंग्रेजी के आड़े-तिरछे शब्द पढ़ उसे टाइप करना आंखों पर जोर डालता है. पर उन्होने नजर अन्दाज कर दिया.

वैसे भी हिन्दी में टिपेरना कठिन काम है. रोमन में करें तो उड़न तश्तरी वाला आप गदहा लेखक हैं… जैसा कंफ्यूजन का खतरा होता है. प्योर अंग्रेजी में टिपेरने पर अमित (बच के रहना रे!) और ई-पण्डित से इमोशनल रार मोल लेनी होती है. ऊपर से वर्ड-वैरीफिकेशन की वैतरणी पार करना… बड़ा ही झमेला है टिप्पणी करना! केवल समीर लाल और घुघूती बासूती जी जैसे ही हैं जो सारी विघ्न-बाधाओं के बावजूद भी सरल/सटीक टिप्पणी किये मिलते हैं. कभी-कभी तो लगता है कि चिठेरा चिठ्ठा बाद में लिखता है, उसके मनोभाव पढ कर समीर लाल जी की उड़न तश्तरी टिप्पणी पहले कर देती है. खैर, यह तो विषयांतर हो गया.

मुद्दे की बात यह है कि ये वर्ड-वेरीफिकेशन काहे को? हिन्दी में कौन स्पैमर है जो आपके चिठ्ठे पर कम्प्यूटर जेनरेटेड गन्द उंडेलने को तत्पर है? क्या किसी सज्जन ने स्पैमर देखा अपने हिन्दी चिठ्ठे पर? (अगर यह समस्या हो यो कृपया ज्ञान वर्धन करने का कष्ट करें.)

और अगर आपने वर्ड-वेरीफिकेशन की वैतरणी पार कर टिप्पणी भेज देने पर लम्बी सांस ले भी ली तो कई चिठ्ठों पर मॉडरेशन की स्टिक आपको धवांस देती है. जाओ बेटा, आधे घण्टे बाद आकर चिठ्ठे का स्टैट-काउण्टर फिर बढ़ाना और देखना कि चिठ्ठाधिपति ने आपकी टिप्पणी को कृतार्थ किया या नहीं?

अपने समीर लाल जी या अनामदास जी जैसे लिख्खाड़ चिठ्ठाकार मॉडरेशन करें तो बुरा नहीं लगता. पर नये-नये दुधमुंहे, टिप्पणी के तरसते चिठेरे जब वर्ड-वेरीफिकेशन और मॉडरेशन का जंजाल फैलाते हैं, तो जी जल-भुन जाता है.

वर्डप्रेस और इण्डिपेण्डेण्ट डोमेन वाले ब्लॉग्स पर एक और झमेला है. ब्लॉगस्पॉट के लिये अगर आपके कम्प्यूटर पर गूगल आईडी स्थापित है तो आप दन्न से क्लिक कर टिपेरदें. वर्डप्रेस और इण्डिपेण्डेण्ट डोमेन पर आप को अपना नाम-गांव-गोत्र सब भरना पडता है. तभी आप टिप्पणी प्रेषित कर सकते हैं.

आखिर अपन टिप्पणी करने का धर्म निर्वहन कर रहे हैं कोई बन्धुआ मजदूरी थोड़े ही कर रहे हैं!

मित्रों, इन सब विघ्न-बाधाओं के खिलाफ एक चिठ्ठा सुधार आन्दोलन चलाने की आवश्यकता है? है कोई लीडर?

पैसे ले कर चलना खतरनाक है

May 8, 2007

मेरे पड़ोस में एक अकाउण्टेण्ट रहता है. रिलायंस की किसी फ्रेंचाइज़ी में काम करता था. एक कर्मचारी को उसने बैंक में कैश जमा करने भेजा. उसे देर होने लगी तो उसने दो-तीन बार मोबाइल पर फोन किया. हुआ यह था कि उस कर्मचारी को रास्ते में किन्ही बदमाशों ने गोली मार कर उसके पास से 8 लाख रुपया छीन लिया था.

अकाउण्टेण्ट खुद पैसा जमा करने बैंक क्यों नहीं गया? बार-बार फोन क्यों किया? जैसे सवालों को लेकर इस व्यक्ति को जिरह के लिये पुलीस ने 3-4 दिन अपनी कस्टुडी में रखा. पुलीस की पड़ताल नें इसको तोड़ दिया है मानसिक रूपसे. डेढ़ महीने से काम पर नहीं जा रहा है. दूसरी नौकरी खोज रहा है.

मेरे मन में सवाल आ रहा है, बढ़ते तकनीकी विकास के बावजूद हमारे देश में ज्यादातर ट्रांजेक्शन कैश में क्यों होता है? कैश ट्रांजेक्शन असुरक्षित तो है ही, अरुचिकर भी है. जेब में 100ग्राम का पर्स ले कर हमेशा चलना, सड़े-गले नोटों को लेकर अनिच्छा का भाव मन में आना, खुल्ले पैसे के बदले जबरन हाजमोला की गोली आपको स्वीकारने को बाध्य होना यह सब रोज अनुभव किया जाता है.

तकनीकी समाधान क्या है? द मेकेंजी क्वाटर्ली में एक लेख है “Developing a new rural payments system in China”. (लेख पढ़ने को आपको द मेकेंजी क्वाटर्ली” की फ्री मेम्बरसिप लेनी पड़ सकती है.) इसमें ग्रामीण चीन में कैश ट्रांजेक्शन के बदले तकनीकी समाधान के लिये पीपुल्स बैंक ऑफ चाईना की कोशिश की बात है. वहां पाया गया कि प्रणाली बदलने में 2 अरब डालर लगेंगे अगर एटीएम या प्वाइंट-ऑफ-सेल टर्मिनल की शृंखला कायम की जाये. पर यही काम मोबाइल फोन की एसएमएस अर्धारित पेमेण्ट व्यवस्था से 4 से 6 करोड़ डालर में हो जायेगा.

मोबाइल फोन भारत में भी तेजी से बढ़ रहे हैं. चनाचबैना बेचने वाला भी रख रहा है. इसका प्रयोग अगर आर्थिक आदान प्रदान में भी सम्भव हो तो कितना अच्छा हो जायेगा. वह न केवल सुविधा जनक और व्यापक होगा वरन देसी कट्टा लेकर रोज पेट्रोल पम्प और बैंक लूटने वालों को बेरोजगार भी कर देगा.

हसन जमाल को इंटरनेटेनिया क्यों नहीं हो सकता

May 6, 2007

बेताल पच्चीसी की तरह इस ब्लॉग पोस्ट में लिंक और पेंच हैं. पहला और डायरेक्ट लिंक है रवि रतलामी का ब्लॉग. उसमें 4-5 लिंक हैं जो आप फुर्सत से वहीं से क्लिक करें.

हसन जमाल एक मुसलमान का नाम है. ये सज्जन लिखते हैं. नया ज्ञानोदय जैसे अभिजात्य हिन्दी जर्नल-नुमा-पत्रिका में इनके पत्र/प्रतिक्रियायें छपती हैं तो इंटेलेक्चुअल ही होंगे. कई चिठेरों ने इनपर कलम चलाई है. मुझे इनसे न जलन है न इनके मुसलमान/इंटेलेक्चुअल होने पर कोई वक्र टिप्पणी करनी है. मैं तो इंटरनेट को लेकर उन्होने जो कहा है उसके समर्थन (?) में कुछ कहना चाहता हूं.

यह इंटरनेटोबिया इंटरनेटेनिया क्या है? मोटे तौर पर इंटरनेट बग जिसे काट लेता है और जो यदा-कदा-सर्वदा गूगल सर्च में मूड़ी घुसाये रहता है, वह इंटरनेटोबिया इंटरनेटेनिया ग्रस्त जीव होता है. आप अगर यह ऑन-लाइन पढ़ रहे हैं और आप के दायें हाथ की तर्जनी माउस को सतत सहलाती रहती है, तो आप को यह विशेष फोबिया (सही शब्द मेनिया, जैसा बासूती जी ने स्पष्ट किया है) इंटरनेटोबिया इंटरनेटेनिया है.

हसन जमाल जी इंटरनेट के खिलाफ हैं. जाहिर है उनको इंटरनेटोबिया इंटरनेटेनिया नहीं हो सकता. पर इतना कहने से बात समाप्त नहीं हो जाती. उन्होने अपने रिसाले में जो अजीब तर्कों से युक्त सम्पादकीय लिखा है, उसके बावजूद उनसे ईर्ष्या करने का मन कर रहा है.

प्रयोग कै तौर पर मैने अपना कम्प्यूटर बन्द कर दिया है। केवल ऑफलाइन ही नहीं, यह लेखन मैं कागज-कलम लेकर कर रहा हूं. जेल पेन इस्तेमाल करने की बजाय, बहुत समय बाद मैने अपने फाउण्टेन पेन में रॉयल ब्ल्यू स्याही भरी है. निब हो धोया-पोंछा है. अपने ट्रांजिस्टर को बाहर निकाल कर वन्देमातरम सुनते हुये सवेरे छ बजे की हिन्दी खबर का इंतजार कर रहा हूं.

इंटरनेट के दंश से पीड़ित होने के कारण अपने बगीचे को मैने काफी समय से नहीं देखा था. आज ध्यान से देखा है. सूरजमुखी उदात्त मन से खिला है. किचन गार्डन में भिण्डी और नेनुआ में फूल लगे हैं. मनी-प्लाण्ट की बेल जो गमले से निकाल कर जमीन में रोपी गयी थी, न केवल जड़ पकड़ गयी है वरन पास के ठूंठ पर चढ़ने भी लगी है. कितना कुछ हो गया है, और मोजिल्ला/इण्टरनेट एक्स्प्लोरर की शरणागत इस जीव को उनका पता भी नहीं चला. लानत है.

यह पढ़कर हमारी जैसी प्रवृत्ति के अन्य सज्जन, जो इण्टरनेटोबिया इंटरनेटेनिया से ग्रस्त हैं; अपने कदम जरा पीछे खींचें. मेरी तरह अपने को कोसते हुये इंटरनेट कनेक्शन बन्द करें और हसन जमाल जी का प्रशस्ति गायन करें.

हसन जमाल जी के प्रशस्ति गायन का अर्थ उनके मुसलमान परस्ती के (कु)तर्क को समर्थन देना नहीं है. पर हम लोगों में इंटरनेटीय ऑब्सेशन के प्रति उनके आगाह करने को धन्यवाद देना जरूर है. शनै-शनै हम भूलते जा रहे हैं कि हमें यह ऑब्शेसन भी है.

हसन जमाल जी को इंटरनेटोबिया इंटरनेटेनिया नहीं हो सकता क्यों कि वे इंटरनेट के सख्त खिलाफ हैं. (वे इसे चैटिंग-चीटिंग का माध्यम मानते हैं जैसे कि इससे पहले लोग पूजा-नमाज में ही तल्लीन रहते रहे हों!) पर हम जो इंटरनेट के सख्त पक्षधर हैं, वे भी, क्यों इंटरनेटोबिया इंटरनेटेनिया ग्रस्त हों? किसी तकनीक का प्रयोग मानव जीवन की सहूलियतें बढ़ाने में होना चाहिये, न कि बतौर अफीम, एडिक्शन के लिये. आफीमची होना घोर कर्म है, जिसे अफीमची ही सत्व संकल्प से दूर कर सकता है.

शूल हो, बस फूल ही हो; इनटरनेट एक टूल ही हो.

(मुझे खेद है – जहां भी इंटरनेटोबिया शब्द का प्रयोग हुआ है, उसे कृपया इंटरनेटेनिया पढ़ें. वास्तव में बीमारी मेनिया की है, फोबिया की नहीं. चेताने के लिये बासूती जी को धन्यवाद)