Archive for the ‘Uncategorized’ Category

विकी पर कोई गया तो फिर लौटा है? – समीर लाल

July 3, 2007

भैया, समीर जी कौन सी चक्की का खाते हैं जो ऐसी सुपर सशक्त टिप्पणी करते हैं. मदान जी ने एक पोस्ट लिखी नारदजी सुनिये जमाना बदल गया है. अब नारदजी सुनिये से हमें लगता है कह रहे हों – जीतेंद्र चौधरी सुनिये. बेचारे जीतेन्द्र सुनते-सुनते अण्डर ग्राउण्ड हो गये. वे हमें कह रहे थे कि जून के अंत में मिलेंगे. पर अभी तक इंतजार ही कर रहा हूं.

खैर, डिटूर कर जाने की बुरी आदत है. मदान जी नाराज हैं कि महादेवी जी पर उन्होने विकीपेडिया का इतना महत्वपूर्ण हाइपर लिंक दिया था पर किसी टिपेरे ने उनको सुना तक नहीं! वो इतने नाराज थे कि उस पोस्ट पर टिपेरने की सुविधा भी नहीं प्रदान की. इतना महत्वपूर्ण मुद्दा हो और समीर जी टिपेर न पायें? गजब हो जायेगा. लिहाजा समीर जी ने उसके पिछली पोस्ट पर टिपेरा. और क्या मस्त टिपेरा! मैं उनकी टिप्पणी जस की तस रिप्रोड्यूस कर रहा हूं :

भाई, पढ़ते तो जरुर हैं मगर आपने ही तो लिंक से सब को विकि पर भेज दिया तो जो गया सो गया..कौन लौटा है आजतक वो भी टिप्पणी करने!!! आप संवेदनशील हैं..मगर लिखना जारी रखें. कोशिश की जायेगी कि पढ़ने के बाद पावती रख जायें. शुभकामनायें.

महादेवी वर्मा, हिन्दी साहित्य, मदान जी की अच्छी पोस्ट, उनकी खुन्दक – इन सबसे मेरा कोई लेना-देना नहीं है. मैं तो सिर्फ समीर जी के टिपेरने पर पोस्ट लिख रहा हूं. क्या ग्रेट बात की है उन्होनें – विकी न हुआ, ब्लैक होल हो गया. हम भी जब विकी पर गये हैं तो उसी में दारुजोषित की नाईं भटकते रहे हैं. कटिया दर कटिया, हाइपर लिंक दर हाइपर लिंक. उस दिन पत्नी भिन्ना कर बोल ही देती हैं – ये तुम्हारा कम्प्यूटर गंगाजी में फिंकवा दूंगी!

कितना गूढ़ ऑब्जर्वेशन है समीर जी का!

समीर जी ने हमारे ब्लॉग पर टिपेरा :

अच्छा शोध किया है और मैं सहमत हूँ…..बहुत सही. अब सोता हूँ.

अब देखिये; साफ है कि उन्हे हमारी पोस्ट निहायत ऊबाऊ लगी. पढ़ कर नींद आने लगी. फिर भी कितने शरीफ हैं. साफ-साफ नहीं कहा – ‘क्या अण्ट-शण्ट लिखते हो. कोई किताब पढ़ ली तो इसका मतलब यह नहीं कि सब को पढ़ा मारो!’ बड़ी शराफत से यह बता दिया कि पोस्ट ऊबाऊ है पर वे मॉरल डाउन नहीं करना चाहते!

जब बात समीर जी की कर रहा हूं तो एक ऑब्जर्वेशन मैं और करना चाहता हूं. चिठ्ठे छप रहे हैं – धड़ाधड़. ऐसे में समीर जी सो कैसे सकते हैं? ऐसे कैसे हो सकता है कि चिठ्ठों की प्रोडक्शन लाइन तीनों शिफ्ट में चले और मास्टर टिपेरा एक शिफ्ट बन्द कर दे – यूनीलेटरली. पोस्ट बनने लगेंगी – नारदजी सुनिये हम परेशान हैं, समीरजी सो रहे हैं!

एक काम वो कर सकते हैं. अपने कम्प्यूटर को वे ई-मेल के ऑटो-रिप्लाई मोड की तरह ऑटो-कमेण्ट मोड में डाल दें. और इस तरह की टिप्पणियां अपने सोते में जेनरेट करें :

udan tashtari said…
बहुत शानदार. लिखते रहें. आपके लेखन में बहुत धार है. बहुत प्रेरक लिखा है! (यह ऑटो कमेण्ट है. अभी मैं दौरे पर हूं. वापस आते ही पुन: टिप्पणी करूंगा.)

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पुन:
अभी-अभी देखा है कि अनुनाद सिन्ह जी के ब्लॉग पर भी मदान जी के विषय में समीर जी टिपेर चुके हैं :

हमारी भी टिपियाने की हसरत धरी रह गई!! :(

इतना बढ़िया टिपेरने पर भी समीर जी की हसरतें हैं कि पूरी नहीं होतीं!

खैर, समीर जी, हमारी कोई पोस्ट आपकी टिप्पणी से बचनी नहीं चाहिये वर्ना मुझे लगेगा कि आप नाराज हो गये.

देश में अमन है, चिठ्ठों में अराजकता

June 14, 2007

एक चिठ्ठा निकाल दिया गया नारद की फीड से. उसकी भाषा देख कर तो लगा कि उचित ही किया. व्यक्ति लिखने को स्वतंत्र है तो फीड-एग्रीगेटर समेटने में. मुझे उस बारे में चौपटस्वामी/प्रियंकर की तरह बीच बचाव करने/पंच बनने का कोई मोह नहीं है. मेरे विचार से जब तर्क और सम्वेदना में द्वन्द्व हो – तो तर्क की चलनी चाहिये. प्रशासन में मेरे सामने जब अथॉरिटी और कम्पैशन में द्वन्द्व होता है तब मैं अथॉरिटी को ऊपर रखता हूं. उसमें फिर चाहे कर्मचारी निलम्बित हो या नौकरी से जाये; मोह आड़े नहीं आता. फीड-एग्रीगेटर के पास ऐसी अथॉरिटी है कि उसके प्युनिटिव एक्शन से इतना सेंटीमेण्टल रिप्रजेंटेशन इतने सारे ब्लॉगों/टिप्पणियों मे दिखे – यह मुझे अजीब लगता है. नारद वालों की अथॉरिटी से ईर्ष्या भी होती है. काश मेरे पास भी ऐसा फीड-एग्रीगेटर होता!

मेरे तीन ऑब्जर्वेशन हैं -

  1. देश में अमन चैन है – कमोबेश. तो चिठ्ठों में यह अराजकता और जूतमपैजार क्यों है? हर आदमी चौधरी (जीतेन्द्र से माफी!) क्यों बन रहा है? असगर वजाहत की कथा – टीज़ करने को त्रिशूल का प्रतीक – क्यों फंसाया जा रहा है बीच में? असगर जी शरीफ और नॉन-कंट्रोवर्शियल इंसान होंगे; पर उनकी कहानी का (कुटिलता से) दुरुपयोग क्यों हो रहा है? भाईचारे का भी वृहत साहित्य है – उसकी ज्ञान गंगा क्यों नहीं बहाई जा सकती? इतिहास देखें तो कौन सा धर्म है जिसमें किसी न किसी मोड़ पर बर्बरता न हो. फिर हिन्दू और मुस्लिम बर्बरता को अलग-अलग खेमों में अलग-अलग तराजुओं मे डण्डी मार कर क्यों तोला जा रहा है? कोई आदमी केवल ब्लॉग पढ़े तो लगेगा कि देश इस समय घोर साम्प्रदायिक हिंसा से ग्रस्त है. और उसमें भी गुजरात तो भस्म-प्राय है. है इसका उलट – देश मजे में है. रिकार्ड तोड़ जीडीपी ग्रोथ हो रही है और गुजरात उसमें अग्रणी है!
  2. समाज में आवाजें कैसे उठती हैं; उनका मेरा यह 3-4 महीने का अनुभव है. कोई अच्छा अनुभव नहीं है. आपस में नोक-झोंक चलती है. कभी-कभार पारा बढ़ सकता है. उसके अलावा अगर कोई ज्यादा ही छिटकता है तो उसपर या तो राजदण्ड या विद्वत-मत या फिर आत्मानुशासन काम करना चाहिये. पर इतने सारे लोग एक साथ अगर कुकरहाव करने लगें तो उसे एनार्की ही कहा जायेगा. हिन्दी ब्लॉगरी में वही दिख रहा है. अचानक चिठ्ठों का प्रॉलीफरेशन और नयी-नयी बोलने की स्वछन्दता लोगों के सिर चढ़ गयी है. उतरने में समय लगेगा.
  3. सेकुलरहे पता नहीं किस स्ट्रेटेजी से काम करते हैं मोदी को गरियाने में? असल में पूरे देश में अगर राम-राज्य होता तो मोदीजी को परेशानी हो सकती थी. पर अन्य प्रांतों की बजाय गुजरात बेहतर है. ऐसे में मोदी को गरियाना वैसा ही है जैसे लोग अमेरिका/रिलायंस/टाटा/वाल-मार्ट/इन्द्रा नूई को गरियायें. समर्थ को ही गरियाया जाता है. पर उससे मोदी को कोई फरक नहीं पड़ता; उल्टे मोदी को लाइमलाइट मिलती है. वे जितना मोदी बैशिंग करते हैं; मोदी के चांसेज उतने ब्राइट होते जाते हैं!

भाइयों, जरा चीनी का प्रयोग बढ़ाइये!

June 13, 2007

ड़ा झमेला है. चीनी के शेयर ऐसे लमलेट हैं कि बैठने का नाम नहीं ले रहे. उठ खड़े होने की कौन कहे. शरद पवार को पहले चिदम्बरम ने बीमार कर दिया जब चीनी एक्सपोर्ट पर बैन लम्बा खिसका दिया. बैन उठा भी तब जब दुनिया में चीनी की बम्पर क्रॉप सामने थी. पेट्रोल के दाम भी बढ़ नहीं रहे हैं कि उसके विकल्प के लिये विलाप तेज हो. एथेनॉल का फण्डा जोर पकड़ ही नही रहा. चीनी कम्पनियां डोलड्रम में हैं. साथ ही हम जैसे भी डोलड्रम में है, जिनके पास चीनी के थोड़े शेयर हैं.

दफ्तर में चाय-पान का मेरा थोड़ा कोटा है. उसमें मैं महीने भर के लिये ईक्वल लो कैलोरी स्वीटनर भी आता है. अब मैं सोचता हूं वजन बढ़ने के भय की ऐसी-तैसी. चीनी का प्रयोग प्रारम्भ किया जाये. कुछ तो फर्क पड़े चीने के शेयरो की कीमत में. पोर्टफोलियो सुधारना वजन कम रखने से ज्यादा जरूरी है.

शरद पवार जी को तो बी.सी.सी.आई. के मामलों से फुर्सत नहीं है. कोच ढ़ूंढना ही मुश्किल काम लग रहा है. एक के बाद एक, जिनको बीसीसीआई ऑफर दे रहा है, वे अपनी अनिच्छा की घोषणा मीडिया में पहले कर रहे हैं, उन्हें बाद में बता रहे हैं. चीनी की कड़वाहट दूर करने के लिये समय ही नहीं निकल पा रहा है शायद? अब आप चिठेरे लोग ही हैल्प करें, साहबान!
जरा चीनी का प्रयोग बढ़ायें! कृपया, एक-दो रसगुल्ले ही गपकने लगें रोज! और कहीं मुफ्त में मिलें तो चार से कम न खायें.

लेखक और ब्लॉगर में फर्क जाना जाये

June 12, 2007

पता नहीं स्कूल के दिनों में कैसे मुझे गलतफहमी थी कि हिन्दी मुझे बहुत अच्छी आती है बस, मेरे मन में फितूर आ गया था लेखक बनने का. जिसे मेरे पिता ने कस के धोया. उनके अनुसार अगर प्रोफेशनल डिग्री हासिल कर ली तो कम से कम रोटी-पानी का जुगाड़ हो जायेगा.

मैने भी वही किया और मैं अपने को बेहतर अवस्था में पाता हूं. वर्ना हरिवंशराय बच्चन जैसी सोशल नेटवर्किंग तो कर नहीं पाता. निराला जैसा बनने की क्षमता न होती और बनता तो भी फटेहाल रहता. हिन्दी में बीए/एमए कर कई साल सिविल सेवा परीक्षा में बैठता और अंतत: किराने की दुकान या क्लर्की करता.

इस लिये जब सत्येन्द प्रसाद श्रीवास्तव जी ने ब्लॉगर को लेखक कहा तो मैं अपने को बागी महसूस करने लगा.

लेखक और ब्लॉगर में मूल भूत अंतर स्पष्ट करने को हम मान सकते हैं कि लेखक मूर्तिकार की तरह है. वह एक अच्छी क्वालिटी का पत्थर चुनता है. अच्छे औजार लेता है और फिर परफेक्शन की सीमा तक मूर्ति बनाने का यत्न करता है. ब्लॉगर तलाशता है कोई भी पत्थर सैण्ड स्टोन/चाक भी चलेगा. न मिले तो पेड़ की सूखी जड़/पत्ती/कबाड़/या इनके कॉम्बीनेशन जिसे वह फैवीकोल से जोड़ ले वह भी चलेंगे. इन सब से वह प्रेजेण्ट करने योग्य वस्तु बना कर ब्लॉग पर टांग देगा. वह भी न हो पाये तो वह किसी पत्थर को पटक कर अपना सौभाग्य तलाशेगा कि पटकने से कोई शेप आ जाये और आज की ब्लॉग पोस्ट बन जाये. यह व्यक्ति लेखक की तुलना में कम क्रियेटिव नहीं है और किसी भी लेखक की अभिजात्यता को ठेंगे पर रखता है.

ब्लॉगर के दृष्टांत देता हूं. सवेरे मॉर्निंग वाक करते मैने नीलगाय की फोटो मोबाइल के कैमरे से उतारी थी और 25 मिनट फ्लैट में ब्लूटूथ से फोटो कम्प्यूटर में डाउनलोड कर, पोस्ट लिख कर और वह फोटो चिपका कर पोस्ट कर चुका था इंटरनेट पर. उसके बाद वह पोस्ट भले ही एडिट की थी दिन में, पर ब्लॉगरी का रैपीडेक्स काम तो कर ही दिया था. कौन लेखक इस तरह का काम करेगा? चाहे जितना बोल्ड या डेयरिंग हो; पच्चीस मिनट तक तो वह मूड बनाता रहेगा कि कुछ लिखना है! फिर फोटो खींचना, डाउनलोड करना, चिपकाना यह सब तो 4-इन-1 काम हो गया !!

इसी तरह मैने अपनी पिछली ओधान कलेन पर लिखी पोस्ट आनन फानन में चिपकाई थी. बस उस बन्दे का काम पसन्द आ गया था और मन था कि बाकी जनता देखे.

मिर्ची सेठ की देखो भैया पैसा ऐसे बनता है और हवा से चलती गाड़ी मुझे बहुत पसन्द आईं. इनमें कौन सा लेखकत्व है जरा देखें. पिद्दी-पिद्दी से साइज़ वाले लेखन की, फोटो लगी पोस्टें है ये.

कई लोग ब्लॉगरी में इसी तरह लठ्ठ मार काम कर रहे हैं. यह बड़ा इम्पल्सिव होता है. कई बार थूक कर चाटने की अवस्था भी आ सकती है. पर जब आप मंज जायें तो वैसा सामान्यत: नही होता. और आप उत्तरोत्तर कॉंफीडेंस गेन करते जाते हैं.

श्रीवास्तव जी, आपको मेरे कहने में कुछ सब्स्टेंस लग रहा है या नहीं? अगर आप लेखक हैं तो शायद यह कूड़ा लगेगा वैसे भी काकेश का कहना है (?) कि यहां चिठेरी में 75% कूड़ा है!

(इसी कूड़े के बाजू में कृष्ण जी को बिठा दिया है!)

क्या करें जी; आदमी कमजोरी का पुतला ही तो है!

May 21, 2007

एच पी नन्दा की ऑटोबॉयोग्राफी में एक प्रकरण है कि उन्होने एक अंग्रेज मिलिटरी वाले को कैसे पटाया. उनका वाजिब काम वह कर नहीं रहा था. पठ्ठा सीधे-सीधे घूस भी नहीं ले रहा था. तो नंदा जी ने उसकी नस पता की. उसके मनपसन्द दारू की ब्राण्ड जानी. एक आदमी को लिया. उसके सिर पर दारू की बोतलों का टोकरा रखा. आर्मी की ऑफीसर्स मेस में दाखिल हुये और कहा कि फलाने साहब से मिलना है. वह अफसर इनको देख आग-बबूला होता उससे पहले ही नन्दा जी बोले कि सर, आपने जो ब्राण्ड खरीद कर लाने को कहा था, वह मैं ले आया हूं. जरा देख लें. फिर स्टाइल से जेब से 250 रुपये निकाल कर अफसर को सरे आम देते हुये कहा सर आपने जो पैसे दिये थे उसमें से इतने बच गये हैं.

मनपसन्द दारू की बोतलें देख कर अफसर की आंखें वैसे ही चमक गयी थीं, उपर से ईमानदारी का फोकट में सर्टीफिकेट और साथ में 250 रुपये. आप समझ सकते हैं कि नन्दा जी का काम बन गया. यह मैं अपनी मेमोरी से लिख रहा हूं उनकी ऑटोबॉयोग्राफी मेरी पर्सनल लाइब्रेरी में नहीं है. अत: हो सकता है कि किस्से में कुछ विवरण बिल्कुल वैसा न हो जैसा ऑटोबॉयोग्राफी में था.

मित्रों मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था.

बहुत पहले मैं मण्डल का वाणिज्य प्रबन्धक था. स्टेशन पर एक स्टॉल का निरीक्षण करते समय मैने पानी की बोतल स्पूरियस पाई थी और वह स्टॉल बन्द कर दी थी. स्टॉल वाला शरीफ सा इंसान था. गड़बड़ शायद उसके कर्मचारी की थी. पर चूंकि निरीक्षण मैने खुद ने किया था और गलत बोतल मैने ही देखी थी जिसका पानी गन्ध और स्वाद में स्पष्टत: खराब था, मैं अड़ गया.

उस बन्दे को कोई रास्ता नहीं मिल रहा था कि मुझे कैसे टैकल करे. एक बार उसने हिण्ट भी दिया कि उसका भतीजा लुधियाना से गरम कपड़े लाता है… मैने साफ कह दिया कि गरम कपड़े हमारे पास पर्याप्त हैं और पुरानों का क्या करें यही समझ नहीं आता तो नये की जरूरत ही नहीं है.

दो-तीन महीने उसकी स्टॉल बन्द रही. सामान्यत: इस तरह के अपराध पर हफ्ते भर स्टॉल बन्द रहती और 500 रुपये का फाइन ठोंका जाता. पर बेचारा गलत आदमी से फंस गया था!

एक दिन दफ्तर में कॉरीडोर में वह दिखा. माथे पर बड़ा सा तिलक लगाये था. कानों पर भी लाल-लाल गेरू सा लगा था. बोला साहब मैं फलाने तीर्थ गया था. वहां बड़ी अच्छी किताबें मिल रही थीं. मैं आपके लिये लेता आया. देखेंगे?

किताबों के नाम से ही मेरी लार टपकती है. देखा; बन्दे ने पूरी रिसर्च की थी मेरी रुचि पता करने में. वो किताबों के पैसे भी मांगता, तो भी मैं सहर्ष देकर उन्हें ले लेता.

आप सही समझे – मैने किताबें ले लीं. पूरी तन्मयता से आधे पेज की नोटिंग लिख कर 500 रुपये का फाइन लगा उसकी स्टॉल खोलने के इंस्ट्रक्शन जारी किये.

क्या करें जी; आदमी कमजोरी का पुतला ही तो है!

हिंदी ब्लॉगरी में कौन सा फ्रिक्वेंसी बैंड नहीं हैं?

May 20, 2007

जीतेंद्रजी ने पिछली पोस्ट की टिप्पणी में अपनी फ्रिक्वेंसी हिंदी ब्लॉगरी से मैच करने की सलाह दी हैं नेक विचार हैं उनकी हर पोस्ट पर जा-जा कर आर.टी.ओ. की लाइसेंस चेकिंग की तरह कर ये प्वाइंट आउट करना बड़ा अच्छा लग रहा हैं की लोगों नेनारद का तावीजअपने ब्लॉग पर नहीं बांधा हैं कुछ बेचारे तो डर के मारे 4-4 बार तावीज बान्ध ले रहे हैं. मैं अपने में इसी तरह का पैशन डेवलप करना चाहता हूँचाहे किसी फील्ड में हो

हिंदी ब्लॉगरीमें मन लगाने के लिए पारिवारिक माहौल बहुत हैं इसी के वशीभूत काकेश जी हिट काउण्टर की परवाह न कर जुड़े हैं. ऐसा कुछ तुलसी बाबा के साथ रहा होगा जब उन्होने मानस लिखना प्रारम्भ किया होगा.

लेकिन वही फ्रिक्वेंसी बैंड काफी नहीं हैं आप की सम्प्रेषण की जरूरतों के लिए

मेरी पिछली पोस्ट पर लोगों को हिंदी ब्लॉगरी के पक्ष में लिखने का मौका मिला वह हिंदी ब्लॉगरी का सशक्त पक्ष हैं पर वैविध्य की कमी तो हैं ही

एक तो हिंदूमुसलमान+सेक्युलर/स्यूडो सेक्युलर का झगडा भारी हैं इसी बेकार से मुद्दे पर बडी जूतमपैजार हो रही है. और कुछ ज्यादा ही खिंच गयी हैं यह शायद भारतीय चरित्र का अंग हैं। यह अवगुण छोटा और नजर- अंदाज किये जाने योग्य हैं जो असली कमी हैं, वह हैं विशेषज्ञों का आभाव

मुझे ब्रेन इन्जरी पर वेब साईट बनने में सहायता के बहुत प्रस्ताव मिले पर सभी लोग या तो इनफॉर्मेशन तकनीक से जुडे थे या फिर मेरे जैसे जनरल फील्ड के थे अपने फील्ड के धाकड़ डाक्टर या वकील नहीं थे जिनकी सहायता वेब साईट के मैटर को परिपुष्ट कर सकती अंग्रेजी में मैंने सर्च किया तो अनेक लोग मिले जो केवल इन विषयों में माहिर थे वरन बडे पैशन से लिख रहे थेपैसा कमाने को नहीं; अपने आनंद के लिए अब यह कमी तो मानी ही जायेगी हिंदी ब्लॉगरी में। विषयों में माहिर लोगों को यह दिक्कत तो होगी कि उनका सारा ज्ञान/उस विषय में सोच अंग्रेजी में होती है और लिखना हिन्दी में है!

पत्रकार ढेरों हैं हिंदी ब्लॉगरी में पर अधिकतर तो हिंदूमुसलमान+सेक्युलर/स्यूडो सेक्युलर खेमों में समय नष्ट कर रहे हैं ब्लॉगरी में न्यूज कंटेंट ढूंढने का यत्न ये लोग नहीं करते मिसाल के लिए मैंने शिव मंदिर पर बसपा के झंडे का फोटो लेख लिखा मुझे लगता था की इसमें चुनाव आयोग की आचार संहिता का उल्लंघन हैं यह लगा की ढेरों पत्रकार हैं ब्लागरी मेंकोई तो यह मीडिया में ले जाएगा पर कुछ नहीं हुआ अपने पत्रकार भी तो सहिष्णु हैं वह जब तक नरेंद्र मोदी या सुदर्शन पर कंटिया फंसता होअपनी जगह से हिलते नहीं। केवल आत्म-मुग्ध ललित निबन्ध लिखते रहते हैं और इसी में प्रसन्न होते रहते हैं कि उनका सुलेख आम ब्लॉगर के लेख से ज्यादा चमकदार/वर्तनी की गलतियों से रहित/बढिया चित्रों से युक्त/अभिजात्य है!

ऐसे ही कुछ मुद्दे हैं जो खुजली करते हैं बाकी तो मस्त हैं हिंदी ब्लॉगरी!

अरे भाई, वहां अपने लिये एक प्लॉट का जुगाड़ करो!

May 10, 2007

हम 6-7 अफसर ब्रेन स्टॉर्मिंग कर रहे थे. जगह की कोई बन्दिश नहीं थी. जितना चाहो, जितना सोच लो उतनी जमीन उपलब्ध है एक टर्मिनल बनाने को जहां से एक मेट्रोपॉलिटन शहर के बाहर करीब 25-30 ट्रेनें आ सकें, और वहां से शुरू हो सकें. पैसे की कोई बन्दिश नहीं यह टर्मिनल जितनी इकनामिक एक्टिविटी जनरेट करेगा, उसके सामने हमारी टर्मिनल बनाने के खर्चे की उड़ान छोटी ही पड़ेगी.

हम सबने 10 प्लेटफार्म, 7-8 लाइन का कोचिंग डिपो, बस/टेम्पो/टेक्सी/कार पार्किंग, सर्क्युलेटिंग एरिया, शापिंग कॉम्प्लेक्स, सभी रेल से सम्बन्धित सुविधायें सोच कर लिख ड़ालीं. फिर यह माना गया कि इस टर्मिनल से सीधे जाने वाले यातायात को काटा नहीं जा सकता. तरह-तरह के विचार जनरेट किये गये. अंत में तय पाया गया कि जमीन को कट एण्ड कवर कर तीन पटरियों की सुरंग बना कर थ्रू ट्रेफिक जाने दिया जाये और यह टर्मिनल जो 2-3 लाख लोगों को रोज लाये-ले जायेगा; उसके ऊपर जमीन पर बने.

अर्थात कल्पना के उड़ान पर कोई सीमा नहीं!

कुल मिला कर तय पाया गया कि हम 1000 एकड़ जमीन का प्रस्ताव रखेंगे.

धीरे-धीरे हम लोगों को यह अहसास होने लगा कि यह ब्रेन स्टॉर्मिंग केवल शेखचिल्ली की कल्पना नहीं है. देश का विकास ऐसे होता रहा तो यह अगले 5-6 साल में वास्तविकता होगी. और न हो पाई तो हम विकास की दिशा में रोड़ा साबित होंगे.

उस एक हजार एकड़ जमीन के इर्द-गिर्द विकास और जमीन की बढ़ने वाली कीमत की हमने कल्पना की तो हममें से एक बोल उठा अरे भाई, पहले वहां अपने लिये एक प्लॉट का जुगाड़ करो. और फिर सारा डिस्कशन सोसाइटी बनाने और जमीन खरीदने पर केन्द्रित हो गया….

हम सब तो सरकारी बाबू हैं. यह सब कल्पना कर सकते हैं. पर सही मायने में उद्यमी तो यह सब सोच कर पैसा लगाने और कमाने का काम शुरू कर देते हैं. यही एक धनी और मध्यवर्गीय की सोच/कर्म में अन्तर है.

हम तो ब्रेन स्टॉर्मिग कर के घर चले गये. ज्यादा हुआ तो यह ब्लॉग पोस्ट लिख लिये. पर जिस उद्यमी को यह लीड मिलेगी, वह दूसरे तरीके से चलेगा. और चलेगा क्या, चल ही रहा होगा. सूचना के इस युग में सूचनायें बहुत हैं, सूंघना आना चाहिये.

हम तो यही कहते रह जायेंगे एक-दूसरे से – अरे भाई, वहां अपने लिये एक प्लॉट का जुगाड़ करो.

पार्ट्स जरूर मिलते हैं

May 7, 2007

पिछली पोस्ट की टिप्पणी में समीर लाल जी को जानने की उत्कंठा है कि स्टीम इंजन के पार्ट्स मिले कि नहीं? जिस घटना को ले कर रेल परिचालन में बवाल मचता है, उसकी तार्किक परिणिति करने की प्रक्रिया निर्धारित है. वह कवायद अवश्य की जाती है और जो पुर्जे मिलने चाहियें, वे जरूर मिलते हैं.

(इस मामले में भी ब्वायलर से सम्बद्ध कुछ पुर्जे गिरे थे, जो सवेरे तक बरामद थे. उसके बाद जवाबदेही तय करने की कवायद प्रारम्भ हो गयी थी.)

तार्किक परिणिति की प्रक्रिया रोचक है. अगर सम्बद्ध विभाग घटना की जिम्मेदारी स्वीकार करता है तो मामला सीधा सा हो जाता है. वह विभाग अपने स्तर पर जांच कर आगे के लिये कौन से कदम उठाने हैं या किस व्यक्ति को जवाबदेह ठहराना है तय कर देता है. मसलन अगर सिगनल का फेल्योर सिगनल विभाग स्वीकारता है तो फेल हुआ पुर्जा बरामद करता है, मेंटेनेंस के लिये सम्बद्ध कर्मचारी को एकाउंटेबल बनाता है और/या पुर्जे में सुधार के स्टेप्स तय करता है…

पर अगर विभाग जिम्मेदारी नहीं मानता तो उसका कारण बताता है. यह कारण पता करने में कई बार बहुत क्रियेटिविटी लगती है. जैसे सिगनल रिले फेल होने में छिपकली या कॉक्रोच की भूमिका होना, बिजली के तारों में उड़ती पतंग का फंस जाना आदि. इनसे किसी दुर्घटना की सम्भावना नहीं होती, पर यातायात अवरोध अवश्य होता है. अत: आरोप प्रत्यारोप से बचने के लिये 10-12 घंटे पहले मरी छिपकली या दबा काक्रोच/पतंग के हिस्से ढूंढ निकालना जरूरी हो जाता है.

और काक्रोच/छिपकली/पतंग को कभी कभी घटना स्थल से दूर, बहुत दूर भी ढूंढ लिया जाता है.

पुर्जे मिलते जरूर हैं अगर उन्हें मिलना चाहिये!

स्टीम इंजन के जमाने की याद

May 5, 2007

मैने जब रेलवे में नौकरी प्रारम्भ की थी तब स्टीम इंजन जिन्दा थे. बड़ी लाइन पर गोधरा-रतलाम खण्ड पर 111/112 पैसेंजर स्टीम इंजन से चला करती थी. बेचारे बूढ़े इंजन जहां-तहां फेल हो जाते थे. उस खण्ड के विद्युतिकरण का काम भी चल रहा था. जहां तक इलेक्र्टिफिकेशन हो गया था, वहां तक बिजली के इंजनों से माल गाड़ियां चलती थीं, फिर उनपर डीजल इंजन बदलना पड़ता था. यह करने में यातायात चौपट हो जाता था. ऊपर से अगर पेसेंजर ट्रेन का स्टीम इंजन फेल हो जाये तो और मुसीबत!

(गोली की आकृति का डब्ल्यूपी स्टीम इंजन)

सबसे जूनियर अफसर होने के कारण मुझे दिन में तो काम देखना ही पड़ता था, रात में 3-4 बार उठना पड़ता था. परिचालन की समस्याओं पर सबसे पहले मुझे ही जगाता था गाड़ी नियंत्रक. (रेलवे के सिस्टम में अगर एक कर्मचारी अधिकारी के समस्या की टोपी उढ़ा देता है तो आगे काम भले ही वह करे, समस्या की जवाब देही से मुक्त हो जाता है.)

एक रात तो विचित्र हुआ. ढाई-तीन के आस-पास नियंत्रक महोदय ने टेलीफोन की घंटी दी साहब, पंचपिपलिया में 111 डाउन का स्टीम इंजन फेल हो गया है. ड्राइवर कह रहा है कि इंजन के कुछ पार्ट पिछ्ले सेक्शन में चलते में गिर गये हैं. ड्राइवर यह नहीं बता पा रहा है कि क्या-क्या गिरा है और किस जगह पर गिरा है.

बेचारा जर्जर स्टीम इंजन! ढेरों पुर्जे. ढ़ीले-ढ़ाले से. फिर भी चलते में कुछ पुर्जे यूं ही टपक जायें यह मैने पहली बार सुना (और अंतिम बार भी).

खैर, दूसरे इंजन का इंतजाम हुआ 111 डाउन को चलाने को. और पिछले स्टेशन बजरंगगढ़ से बाद की गाड़ी को धीरे-धीरे चलाया गया कहीं इंजन का पार्ट पटरी पर न हो , और गाड़ी ड़ीरेल कर दे! बजरंगगढ़ और पंचपिपलिया के चतुर्थ श्रेणी के कर्मी रात भर खंड में इंजन के पार्ट ढ़ूंढते रहे.

बेचारे बॉम्बे-बड़ौदा-एण्ड-कॉंटीनेण्टल-इण्डिया-रेलवे (BB & CI Railway) के जमाने के वे डब्ल्यूपी इंजन एक दो वर्षों में ही फेज-आउट हो गये. पर वह घटना ऐसी रही कि मुझे आज भी याद है.

The Election arrangements are simply Impressive

May 3, 2007
I have come back after voting. And I am all praise for the arrangements.

We had moved here in Allahabad only 5 months back. The people deputed by the Commission had come to our house to get us photographed. We were still not sure that we will get voter card…

(Election Commission people photographing at our home)
But about 20 days back, my wife and I were walking to the market. A shaggy looking man, sitting in front of Dhobi’s shop was asking every one – “क्या ज्ञानदत्त पाण्डेय को जानते हो?” (” Do you know someone named Gyandutt Pandey?”) When I replied that I am that person, he handed over our voter cards! We had no option but to vote.
(The man in front of Dhobi shop who gave us the Voter Cards)

And today I saw massive reinforcement of para-military forces. Poor booth-capturers must be without job. Since we were not the regular voters, my wife and me were video graphed again to keep our identity.
No fuss, no mess, clean voting.
It is only a post election problem which I as Passenger Train Operator will be facing. The para-military staff would be moving out and I will have to arrange 150-200 coaches to move out these men. I am sure that I shall not be succeeding in a big way. Any failure will only make these uniformed men eating up the General coaches!
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And my mother gave me this good one:
She commented to the electoral employees: “With this para-military arrangements, you people must be very satisfied about your safety.”
Pat came the reply from the woman checking the identity card: “अरे क्या माताजी, ये लोग न होते तो अब तक कितनी बार चाय समोसे आ गए होते। अब तो कोई पानी पूछने वाला भी नहीं है।” (“What mother, if these people were not there we would have got tea-snacks several times. Now the condition is that no one is giving even a glass of water.”)