फिर हिन्दी पर चलने लगे तीर (या जूते!)

June 28, 2007 by Gyandutt Pandey

हिंदी एक बीमार भाषा है। क्‍योंकि इसका मुल्‍क बीमार है। अस्‍सी फीसदी नौजवान हाथ बेकार हैं। प्रोफेसर और दूसरे कमाने वालों को बैंक का ब्‍याज चुकाना है, वे ट्यूशन पढ़ा रहे हैं, कमाई का अतिरिक्‍त ज़रिया खोज रहे हैं। वे क्‍यों पढ़ेंगे किताब? आपकी किताब उन्‍हें दुष्‍चक्र से बाहर निकलने का रास्‍ता नहीं दिखा रही। मित्रों यह हमारी नहीं मुहल्ले की आवाज है.

मजा आ गया मुहल्ले की आज की पोस्ट पढ़ कर. मैं लिंक नहीं करूंगा. मैं तो बस देख रहा हूं हिन्दी पर जूतमपैजार. मैं नहीं चाहता कि मुहल्ले या विरोधी ठाकुर-बाभन मेरे पोस्ट को अपनी व्यायामशाला का एक्स्टेंशन मान लें.

पहले सुमित्रानन्दन पंत पर (या नामवर सिन्ह पर जो भी हों क्या फरक पड़ता है) कूड़ा उछाला गया. किसपर गिरा पता नहीं. अब फिर चालू हो गया है.

हिन्दी है ही दुरुह! इसमें बकरी की लेंड़ी गिनने का मॉर्डन मेथमेटिक्स है. इसमें पंत पर कविता है. इसमें लम्बे-लम्बे खर्रों वाला नया ज्ञानोदय है. बड़े-बड़े नाम और किताबों की नेम ड्रापिंग है. पर इसमें नौकरी नहीं है!

लेकिन मेरा मानना है कि हिन्दी साहित्य के नाम पर दण्ड-बैठक लगाने वाले कहीं और लगायें तो हिन्दी रिवाइटल खिला कर तन्दुरुस्त की जा सकती है. अगर 100-200 बढ़िया वेब साइटें हिन्दी समझ में आने वाली हिन्दी (बकरी की लेंड़ी वाली नही) में बन जायें तो आगे बहुत से हाई-टेक जॉब हिन्दी में क्रियेट होने लगेंगे. इस हो रही जूतमपैजार के बावजूद मुझे पूरा यकीन है कि मेरी जिन्दगी में हिन्दी बाजार की भाषा (और आगे बाजार ही नौकरी देगा) बन कर उभरेगी.

नागार्जुन जी की तर्ज में कहें तो साहित्य-फाहित्य की ऐसी की तैसी.

आपको कौन लिंक कर रहा है?

June 28, 2007 by Gyandutt Pandey

यह कई बार होता है कि आप वहां नहीं पहुंचते जहां आपके ब्लॉग को लिंक कर कुछ कहा जा रहा हो. आपको ट्रिगर ही नहीं मिलता. उदाहरण के लिये मैने यूनुस पर एक पोस्ट लिखी – नाई की दुकान पर हिन्दी ब्लॉगर मीट. उनके ब्लॉग को लिंक किया. प्रतीक्षा की कि यूनुस देखने आयेंगे और ज्ञान-बीड़ी का सुट्टा लगायेंगे. उस पोस्ट पर टिपेरे आये और (मेरे स्टेण्डर्ड से) थोक में आये. पर नही आये तो यूनुस जिनपर पोस्ट लिखी थी!

जब यूनुस ने मेरी किसी और पोस्ट पर टिप्पणी की तो मैने उन्हे ई-मेल कर चेताया कि सही पोस्ट पर टिप्पणी करो जनाब. और फिर जो टिप्पणी यूनुस ने की वह बहुत ही अच्छी है. अंश नीचे प्रस्तुत है:

यूनुस जी की टिप्पणी:
अरे अरे ज्ञान जी, पता नहीं कैसे आपकी इस ज्ञान बिड़ी का सुट्टा मारना भूल ही गया था । इसमें तो वो धूम्रपान निषेध का प्रतिबंध भी नहीं है । मुझसे भूल हो गयी जो इस पोस्‍ट को नज़र अंदाज़ कर दिया । तो आखिरकार आपने नाई की दुकान पर हमसे मुलाक़ात कर ही ली । ………
पर आपका लिखा बहुत अच्‍छा लगा । इसी तरह हमें ज्ञान बिड़ी पिलाते रहिये । जबलपुरिया हैं ज्ञान बिड़ी पीने के पुरानी आदत है । ये वो लत है जो हमसे छूटती नहीं ।……..

यूनुस की बात तो बतौर दृष्टांत है. असली सवाल है कि आप हाई-टेक ब्लॉगर गण सवेरे कुल्ला-मुखारी कर जब अपना कम्प्यूटर खोल कर ब्लॉग खंगालते हैं तो कैसे मालूम करते हैं कि आप पर किस-किस ने लिंक बना कर तीर चलाये हैं? इसके निश्चय ही कई तरीके होंगे. मैं आमंत्रण देता हूं कि आप टिपेरकर लोगों को अपना तरीका बतायें. अगर आपका तरीका ज्यादा मस्त हुआ तो मैं भी वह अपना लूंगा. अन्यथा मैं अपना तरीका बताने की हिम्मत जुटाऊंगा.

हमारे जैसे तो पुरनिया ब्राण्ड के ब्लॉगर हैं. न हमारा घेट्टो है न जवान ब्लॉगरों की जमात हमारे साथ है. पत्रकार या तकनीकी विशेषज्ञ भी नहीं है. रेलवे के तो लोग भी हिन्दी ब्लॉगरी में नही हैं जो हमें पट्टीदारी के लिहाज से लिंक करें. अत: हमें तो ज्यादा फायदा नहीं है अपने लिंक जानने की तकनीक का. पर मैं निश्चित ही चाहूंगा कि अगली बार यूनुस ज्ञान बीड़ी का सुट्टा लगाना भूल न जायें कि उन्हें ई-मेल करनी पड़े! इसी तरह आप लोगों पर भी कभी कंटिया फंसाऊं तो आप भी ओवरलुक न कर पायें!

मुझे बिग-बाजार में क्या गलत लगता है?

June 26, 2007 by Gyandutt Pandey

मैं किशोर बियाणी की पुस्तक पढ़ रहा हूं इट हेपण्ड इन इण्डिया.* यह भारत में उनके वाल-मार्टिया प्रयोग का कच्चा चिठ्ठा है. कच्चा चिठ्ठा इसलिये कि अभी इस व्यवसाय में और भी कई प्लेयर कूदने वाले हैं. अंतत: कौन एडमण्ड हिलेरी और तेनसिंग बनेंगे, वह पता नहीं. पर बियाणी ने भारतीय शहरों में एक कल्चरल चेंज की शुरुआत तो कर दी है.

बिग बाजार के वातावरण का पर्याप्त इण्डियनाइजेशन हो गया है. वहां निम्न मध्यम वर्गीय मानस अपने को आउट-ऑफ-प्लेस नहीं पाता. वही नहीं, इस वर्ग को भी सर्विस देने वाला वर्ग – ड्राइवर, हैल्पर, घरमें काम करने वाली नौकरनी आदि, जिन्हे बियाणी इण्डिया-2 के नाम से सम्बोधित करते हैं भी बिग बाजार में सहजता से घूमता पाया जाता है. इस्लाम में जैसे हर तबके के लोग एक साथ नमाज पढ़ते हैं और वह इस्लाम का एक सॉलिड प्लस प्वॉइण्ट है; उसी प्रकार बिग बाजार भी इतने बड़े हेट्रोजीनियस ग्रुप को एक कॉम्प्लेक्स के नीचे लाने में सफल होता प्रतीत होता है.

पर मैं किशोर बियाणी का स्पॉंसर्ड-हैगियोग्राफर नहीं हूं. बिग-बाजार या पेण्टालून का कोई बन्दा मुझे नहीं जानता और उस कम्पनी के एक भी शेयर मेरे पास नही हैं. मैं बिग बाजार में गया भी हूं तो सामान खरीदने की नीयत से कम, बिग-बाजार का फिनामिनॉ परखने को अधिक तवज्जो देकर गया हूं.

और बिग-बाजार मुझे पसन्द नहीं आया.

मैं पड़ोस के अनिल किराणा स्टोर में भी जाता हूं. तीन भाई वह स्टोर चलाते हैं. हिन्दुस्तान लीवर का सुपरवैल्यू स्टोर भी उनके स्टोर में समाहित है. तीनो भाई मुझे पहचानते हैं और पहचानने की शुरुआत मैने नही, उन्होने की थी. अनिल किराणा को मेरे और मेरे परिवार की जरूरतें/हैसियत/दिमागी फितरतें पता हैं. वे हमें सामान ही नहीं बेंचते, ओपीनियन भी देते हैं. मेरी पत्नी अगर गरम-मसाला के इनग्रेडियेण्ट्स में कोई कमी कर देती है, तो वे अपनी तरफ से बता कर सप्लिमेण्ट करते हैं. मेरे पास उनका और उनके पास मेरा फोन नम्बर भी है. और फोन करने पर आवाज अनिल की होती है, रिकार्डेड इण्टरेक्टिव वाइस रिस्पांस सिस्टम की नहीं. मैं सामान तोलने की प्रॉसेस में लग रहे समय के फिलर के रूप में बिग-बाजार से उनके कैश-फ्लो पर पड़े प्रभाव पर चर्चा भी कर लेता हूं.

बियाणी की पुस्तक में है कि यह अनौपचारिक माहौल उनके कलकत्ता के कॉम्प्लेक्स में है जहां ग्राहक लाइफ-लांग ग्राहक बनते हैं और शादी के कार्ड भी भेजते हैं. (पुस्तक में नॉयल सोलोमन का पेज 89 पर कथन देखें – मैं अंग्रेजी टेक्स्ट कोट नहीं कर रहा, क्योंकि हिन्दी जमात को अंग्रेजी पर सख्त नापसन्दगी है और मैं अभी झगड़े के मूड में नहीं हूं). इलाहाबाद में तो ऐसा कुछ नहीं है. कर्मचारी/सेल्स-पर्सन ग्राहक की बजाय आपस में ज्यादा बतियाते हैं. ग्राहक अगर अपनी पत्नी से कहता है कि ट्विन शेविंग ब्लेड कहां होगा तो सेल्स-गर्ल को ओवर हीयर कर खुद बताना चाहिये कि फलानी जगह चले जायें. और ग्राहक बेचारा पत्नी से बोलता भी इस अन्दाज से है कि सेल्स-गर्ल सुनले. पर सेल्स-गर्ल सुनती ही नहीं! अनाउंसमेण्ट तो उस भाषा में होता है जो बम्बई और लन्दन के रास्ते में बोली जाती है इलाहाबाद और कोसी कलां के रास्ते नहीं.

परस्पर इण्टरेक्शन के लिये मैं अनिल किराना को अगर 10 में से 9 अंक दूंगा तो बिग बाजार को केवल 4 अंक. अनिल किराना वाला चीजों की विविधता/क्वालिटी/कीमतों मे किशोर बियाणी से कम्पीट नहीं कर पायेगा. पर अपनी कोर कम्पीटेंस के फील्ड में मेहनत कर अपनी सर्वाइवल इंस्टिंक्ट्स जरूर दिखा सकता है. ऑल द बेस्ट अनिल!

————————

It Happened In India

by Kishore Biyani with Dipayana Baishya

Roopa & Co, Rs. 99.

कुछ सफल और आत्म-मुग्ध (हिन्दी ब्लॉगर नहीं) लोग!

June 26, 2007 by Gyandutt Pandey

मेरा लोगों से अधिकतर इण्टरेक्शन ज्यादातर इण्टरकॉम-फोन-मीटिंग आदि में होता है. किसी से योजना बना कर, यत्न कर मिलना तो बहुत कम होता है. पर जो भी लोग मिलते है, किसी न किसी कोण से रोचक अवश्य होते हैं.

अधिकतर लोग मेरे मुख्यालय में सोमवार की महाप्रबन्धक महोदय की रिव्यू मीटिंग में मिलते हैं. ये होते हैं 20 से तीस साल तक की अवधि सिविल/इंजीनियरिंग सेवा में गुजारे हुये विभागाध्यक्ष लोग. इनमें से प्रत्येक व्यक्ति कम से कम 5000 रेल कर्मियों पिरामिड के शीर्ष पर होते हैं. सामान्य जन-अवधारणा से अलग, अपनी प्रतिभा और अपनी मेहनत से उपलब्धियां पाये और उन उपलब्धियों से एक ब्लॉगर की तरह ही आत्म-मुग्ध लोग हैं ये. मै इनमें से कुछ सज्जनों के विषय में बिना नाम लिये लिखने का यत्न करता हूं.

एक सज्जन हैं; जो सबसे ज्यादा इम्पेशेण्ट दीखते हैं. अगर उनके अपने विभाग की बात न हो तो दूसरों को समस्या का समाधान सुझाने में पीछे नहीं रहते. और कोई दूसरा भला आपकी बिन मांगी सलाह क्यों हजम करने लगा? परिणाम द्वन्द्व में होता है अक्सर. मजे की बात यह हुई की किसी ने मुझे बताया कि ये बम-ब्लास्टिया सज्जन परम-शांति नामक शीर्षक से एक ब्लॉग भी लिखते हैं. मैने ब्लॉग देखा. बिना चित्रों के, अंगेजी के एक ही फॉंण्ट में, ब्लैक एण्ड ह्वाइट रंग में था वह. फुरसतिया जी की पोस्टों से दूने लम्बे लेख थे उसमें. वास्तव में परम शांति थी. कौन पढ़े! एक पोस्ट पर एक कमेण्ट दिखा तो उसे पढ़ने का मन हुआ. वह निकला उन्ही के किसी कर्मचारी का जो न जाने किस मोटिव से ऐसी प्रशंसा कर रहा था जैसे कि वह पोस्ट-लेखन 10 कमाण्डमेण्ट्स के बाद सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज हो!

दूसरे सज्जन हैं जो वानप्रस्थ आश्रम की उम्र में चल रहे हैं पर कुंवारे हैं. कविता करते हैं. फाइलों पर अनिर्णय की बीमारी है उनके हस्ताक्षर लेना चक्रव्युह भेदने से कम नहीं है. एक बार पूंछा गया कि ये हस्ताक्षर क्यों नहीं करते? बढ़िया कमेण्ट था हस्ताक्षर करना आता होता तो निकाह न हो गया होता?

तीसरे सज्जन हैं जो सरनेम नहीं लगाते. पर जब भी किसी से पहली बार मिलते हैं तो येन-केन-प्रकरेण अपना जाति-गोत्र स्पष्ट कर देते हैं; जिससे कोई उन्हें अनुसूचित वर्ग का न समझ ले. विद्वान हैं, अत: जो भी पढ़ते हैं, उसे सन्दर्भ हो चाहे न हो, मीटिंग के दौरान बोल जरूर देते हैं. यानि ब्लॉगरों को जबरी लिखने की बीमारी होती है; उन्हे जबरी विद्वत्व प्रदर्शन की! कौन क्या कर लेगा!

चौथे सज्जन हैं जो हर चीज का तकनीकी हल तलाशते हैं. उनके घर में अच्छी खासी प्रयोगशाला और जंक मेटीरियल का कबाड़खाना है. रेलवे में गलत फंसे हैं. किसी कम्पनी में होते जो मेवरिक सोच को सिर माथे पर लेती तो उनकी वैल्यू हीरे की तरह होती. पर यहां तो जैसे ही वे कोई समाधान सुझाते हैं चार लोग तड़ से ये बताते हैं कि ये फलाने कोड/मैनुअल/रूल के तहद परमिसिबल नहीं है! फिर भी, मानाना पड़ेगा कि वे अधेड़ उम्र में भी (रेलवे जैसे ब्यूरोक्रेटिक सेट-अप में) इतने सतत विरोध के बावजूद तकनीकी इनोवेशन की उर्वरता खो नहीं बैठे!

ऊपर जो लिखा है उन सज्जनों के रोचक पक्ष है. उनकी दक्षता और मानवीय उत्कृष्टता के पक्ष अधिक महत्वपूर्ण हैं. पर उन पक्षों के लिये मुझे बहुत अधिक लिखना पड़ेगा. इसके अलावा कुछ सज्जन और हैं, जिन पर फिर कभी मन बना तो लिखूंगा.

नाई की दुकान पर हिन्दी ब्लॉगर मीट

June 25, 2007 by Gyandutt Pandey

पिछले तीन हफ्ते से हेयर कटिंग पोस्टपोन हो रही थी. भरतलाल (मेरा भृत्य) तीन हफ्ते से गच्चा दे रहा था कि फलाने नाई से तय हो गया है – वह घर आ कर सिर की खेती छांट देगा. वह नाई जब रविवार की दोपहर तक नहीं आया तो बोरियत से बचने को मैने एक ताजा पुस्तक पकड़ी और जा पंहुचा नाई की दुकान पर. रविवार की दोपहर तक सभी केण्डीडेट जा चुके थे. नाई अकेला बैठा मुझ जैसे आलसी की प्रतीक्षा कर रहा था. मैंने सीधे लांचपैड (नाई की ऊंची वाली कुर्सी) पर कदम रखा.

उसके बाद रुटीन हिदायतें – बाल छोटे कर दो. इतने छोटे कि और छोटे करने पर वह छोटे करने की परिभाषा में न आ सकें. ये हिदायत मुझे हमेशा देनी होती है – जिससे अगले 2-3 महीने तक हेयर कटिंग की जहमत न उठानी पड़े.

जब केवल नाई के निर्देशानुसार सिर इधर-उधर घुमाने के अलावा कोई काम न बचा तो मैने उसकी दुकान में बज रहे रेडियो पर ध्यान देना प्रारम्भ किया. कोई उद्घघोषक बिनाका गीतमाला के अमीन सायानी जैसी आवाज में लोगों के पत्र बांच रहे थे. पत्र क्या थे – लोगों ने अटरम-सटरम जनरल नॉलेज की चीजें भेज रखी थीं. … भारत और पाकिस्तान के बीच फलानी लाइन है; पाक-अफगानिस्तान के बीच ढिमाकी. एवरेस्ट पर ये है और सागर में वो … एक सांस में श्रोताओं की भेजी ढ़ेरों जानकारियां उद्घघोषक महोदय दे रहे थे. मुझे सिर्फ यह याद है कि उनकी आवाज दमदार थी और कर्णप्रिय. एक बन्दे की चिठ्ठी उन्होने पढ़ी – “मैं एक गरीब श्रोता हूं. ईमेल नहीं कर सकता ” (जैसे की सभी ईमेल करने वालों के पास धीरूभाई की वसीयत हो!). फिर उद्घोषक जी ने जोड़ा कि ईमेल क्या, इतने प्यार से लिखे पत्र को वे सीने से लगाते हैं … इत्यादि.

उसके बाद माइक उषा उत्थप को. जिन्होने मेरे ब्लॉग की तरह हिन्दी में अंग्रेजी को और अंग्रेजी में हिन्दी को औंटाया. कुछ देर वह चला जो मेरी समझ में ज्यादा नहीं आया. बीच-बीच में गानों की कतरनें – जो जब समझ में आने लगें तब तक उषाजी कुछ और बोलने लगतीं.

खैर मेरी हेयर कटिंग हो चुकी थी. तबतक उद्घोषक महोदय ने भी कार्यक्रम – पिटारा समाप्त करने की घोषणा की. और कहा - आपको यूनुस खान का नमस्कार.

यूनुसखान अर्थात अपने ज्ञान बीड़ी वाले ब्लॉगर! जो मेरे ब्लॉग पर अपनी आवाज जैसी मीठी टिप्पणी करते हैं और जिनके ब्लॉग पर मैं फिल्मों के गीत पढ़ने जाता हूं. वहां गीत तो नही सुने पर अब वे अपनी आवाज में कुछ कहेंगे तो सुनूंगा. हां, अब लगता है कि वे अपने ब्लॉग पर अपने कार्यक्रमों के समय जरूर दें जिससे कि घर पर रेडियो पर सुना जा सके.

मैने नाई को हेयरकटिंग के दस रुपये दिये और लौटते हुये सोचा – दस रुपये में हेयर कटिंग भी हो गयी और ब्लॉगर मीट भी!

उत्तर – रमानाथ अवस्थी की एक कविता का अंश

June 24, 2007 by Gyandutt Pandey

कविता हर एक के बस की बात नहीं है. मैं जो कुछ बनना चाहता था और नहीं बन पाया – उसमें काव्य लेखन भी एक आयाम है. इसलिये दूसरों की कविता से मन रमाना पड़ता है. रमानाथ अवस्थी की कविता/गीत मुझे बहुत प्रिय हैं.

समय के विविध रंग देखते देखते समय से एक अजीब सम्मोहन हो गया है. यह कब सुखद हो जाता है और कब कष्टकर – समझ नहीं आता. और बहुत सी ऊर्जा सुखद समय को लम्बा खींचने, दुखद को पलटने तथा दोनो का अंतर समझ समय को उत्तर देने में व्यतीत होती है.

आप फिलहाल इस विषय में अवस्थी जी की कविता के अंश देखें.

सवाल समय करेगा, उत्तर देना होगा!

आसानी से समय किसी को नहीं छोड़ता,
खामोशी के साथ एक दिन हमें तोड़ता,
कभी समय के सागर की कोई चाह नहीं,
और कभी यह करता कोई परवाह नहीं!
बुरे समय को सब-कुछ चना-चबेना होगा!

समय हुआ नाराज राम को वन में भेजा
और भरत को पूरा-पूरा राज सहेजा!
समय कभी देवता कभी दानव लगता है,
जो है नहीं सचेत उन्ही को यह ठगता है!
वह क्षण ही सच जब तू निरा अकेला होगा!

मार समय की बहुत बुरी होती है यारों,
अपने कर्मों से ही खुद को यहां संवारो!
पानी में जो डूब रहा है उसे निहारो,
अपनी जान लगा कर उसकी जान उबारो!
बालू में भी हमको नौका खेना होगा!
समय सवाल करेगा उत्तर देना होगा!

हिन्दी ब्लॉगरी में नॉन-कंट्रोवर्शियल बनने के 10 तरीके

June 23, 2007 by Gyandutt Pandey

झगड़ा-टण्टा बेकार है. देर सबेर सबको यह बोध-ज्ञान होता है. संजय जी रोज ब्लॉग परखने चले आते हैं, लिखते हैं कि लिखेंगे नहीं. फलाने जी का लिखा उनका भी मान लिया जाये. काकेश कहते हैं कि वे तो निहायत निरीह प्राणी हैं फिर भी उन्हे राइट-लेफ़्ट झगड़े में घसीट लिया गया. लिहाजा वे कहीं भी कुछ कहने से बच रहे हैं. और कह भी रहे हैं तो अपनी जुबानी नहीं परसाई जी के मुह से. जिससे कि अगर कभी विवाद भी हो तो परसाई जी के नाम जाये और विवाद की ई-मेल धर्मराज के पास फार्वर्ड कर दी जाये. लोग शरीफ-शरीफ से दिखना चाह रहे हैं. और श्रीश जी जैसे जो सही में शरीफ हैं, उन्हे शरीफ कहो तो और विनम्र हो कर कहते हैं कि उनसे क्या गुस्ताखी हो गयी जो उन्हे शरीफ कहा जा रहा है. फुरसतिया सुकुल जी भी हायकू गायन कर रहे हैं या फिर बिल्कुल विवादहीन माखनलाल चतुर्वेदी जी पर लम्बी स्प्रेडशीट फैलाये हैं. हो क्या गया है?

हवा में उमस है. मित्रों, पुरवाई नहीं चल रही. वातानुकूलित स्टेल हवा ने हमारा भी संतुलन खराब कर रखा है. हिन्दी पर कोई साफ-साफ स्टैण्ड ही नहीं ले पा रहे हैं. कभी फ्लिप तो कभी फ्लॉप. ज्यादातर फ्लॉप. हमारे एवरग्रीन टॉपिक – कॉर्पोरेट के पक्ष और समाजवाद/साम्यवाद को आउटडेट बताने के ऊपर भी कुछ लिखने का मन नहीं कर रहा. अज़दक जी के ब्लॉग का हाइपर लिंक बना कर लिखें तो कितना लिखें!

ऐसे में, लगता है नॉन-कण्ट्रोवर्शियल बनना बेस्ट पॉलिसी है. इसके निम्न 10 उपाय नजर आते हैं:

  1. अपने ब्लॉग को केवल फोटो वाला ब्लॉग रखें. फोटो के शीर्षक भी दें “बिना-शीर्षक” 1/2/3/4/… आदि.
  2. लिखें तो टॉलस्टाय/प्रेमचन्द/परसाई जी आदि से कबाड़ कर और उन्हे कोट करते हुये. ताली बजे तो आपके नाम. विवाद हो तो टॉलस्टाय/प्रेमचन्द/परसाई के नाम.
  3. समीर लाल जी की 400-500 टिप्पणियां कॉपी कर एक फाइल में सहेज लें. रेण्डम नम्बर जेनरेटर प्रयोग करते हुये इन टिप्पणियों को अपने नाम से बिना पक्षपात के ब्लॉग पोस्टों पर टिकाते जायें. ये फाइल वैसे भी आपके काम की होगी. आप 2-2 डॉलर में बेंच भी सकते हैं. समीर जी की देखा देखी संजीत त्रिपाठी हैं – वो भी हर जगह विवादहीन टिपेरते पाये जा रहे हैं.
  4. आपको लिखना भी हो तो कविता लिखें. ढ़ाई लाइनों की हायकू छाप हो तो बहुत अच्छा. गज़ल भी मुफीद है. किसी की भी चुराई जा सकती है – पूरे ट्रेन-लोड में लोग गज़ल लिखते जो हैं. मालगाड़ी से एक दो कट्टा/बोरा उतारने में कहां पता चलता है. कई लोगों का रोजगार इसी सिद्धांत पर चलता है.
  5. दिन के अंत में मनन करें कहीं कुछ कंट्रोवशियल तो नहीं टपकाया. हल्का भी डाउट हो तो वहां पुन: जा कर लीपपोती में कुछ लिख आयें. अपने लिये पतली गली कायम कर लें.
  6. बम-ब्लास्ट वाले ब्लॉगों पर कतई न जायें. नये चिठ्ठों पर जा कर भई वाह भई वाह करें. किसी मुहल्ले में कदम न रखें. चिठ्ठे रोज बढ़ रहे हैं. कमी नहीं खलेगी.
  7. फिल्मों के रिव्यू, नयी हीरोइन का परिचय, ब्लॉगर मीट के फोटो, झुमरी तलैया के राम चन्दर को राष्ट्रपति बनाया जाये जैसे मसले पर अपने अमूल्य विचार कभी-कभी रख सकते हैं. उसमें भी किसी को सुदर्शन, हुसैन, चन्द्रमोहन, मोदी जैसे नाम से पुकारने का जोखिम न लें.
  8. धारदार ब्लॉग पोस्ट लिखने की खुजली से बचें जितना बच सकें. खुजली ज्यादा हो तो जालिमलोशन/जर्म्सकटर/इचगार्ड आदि बहुत उपाय हैं. नहीं तो शुद्ध नीम की पत्ती उबला पानी वापरें नहाने को.
  9. अगर खुजली फिर भी नहीं जा रही तो यात्रा पर निकल जायें. साथ में लैपटॉप कतई न ले जायें. वापस आने पर फोटो ब्लॉग या ट्रेवलॉग में मन रमा रहेगा. तबतक खुजली मिट चुकी होगी.
  10. हो सके तो हिन्दी ब्लॉगरी को टेम्पररी तौर पर छोड़ दें. जैसे धुरविरोधी ने किया है. बाद में वापस आने का मन बन सकता है – इसलिये अपना यू.आर.एल. सरेण्डर न करें. नहीं तो सरेण्डर करते ही कोई झटक लेगा.

…. आगे अन्य क्रियेटिव लोग अपना योगदान दें इस नॉन-कण्ट्रोवर्शियल महा यज्ञ में. यह लिस्ट लम्बी की जा सकती है टिप्पणियों में.

———————
ऊपर का टेन प्वॉइण्टर सुलेख एक तरफ; मुद्दे की बात यह है कि जब ऊर्जा की कमी, समय की प्रकृति का ड्रैग, किसी निर्णय की गुरुता आदि के कारण अपने आप में कच्छप वृत्ति महसूस हो; तो अपनी वाइब्रेंसी का एक-एक कतरा समेट कर, अपनी समस्त ऊर्जा का आवाहन कर उत्कृष्टता के नये प्रतिमान गढ़ने चाहियें. उत्कृष्टता का इन्द्र धनुष ऐसे ही समय खिलता है.
मैं रेलवे का उदाहरण देता हूं. कोई बड़ी दुर्घटना होती है तो अचानक सब खोल में घुस जाते हैं. संरक्षा सर्वोपरि लगती है. तात्कालिक तौर पर यह लगता है कि कुछ न हो. गाड़ियां न चलें. उत्पादन न हो. जब एक्टिविटी न होगी तो संरक्षा 100% होगी. पर 100% संरक्षा मिथक है. असली चीज उत्पादन है, एक्टिविटी है. संरक्षा की रिपोर्ट पर मनन कर अंतत: काम पर लौटते हैं. पहले से कहीं अधिक गहनता से लदान होता है, गाड़ियां चलती हैं, गंतव्य तक पहुंचती हैं. संरक्षा भी रहती है और उत्पादन का ग्राफ उत्तरमुखी होने लगता है. कुछ ही महीनों में हमारी रिपोर्टें उत्पादन में रिकॉर्ड दर्ज करने लगती हैं.
ये हिन्दी ब्लॉगरी कोई अलग फिनॉमिना थोड़े ही होगा? क्यों जी?

फ्री-सॉफ्टवेयर : एक नियामत है मोजिल्ला फॉयरफॉक्स

June 22, 2007 by Gyandutt Pandey

भगवान ने फ्री फण्ड में नियामतें दी हैं वायु, जल, धरती…. इसी तरह सॉफ्टवेयर में मिला है फॉयरफॉक्स. जब कल श्रीश जी ने कहा कि फॉयरफॉक्स में शब्दकोश का सर्च इंजन उसपर चिपकाया जा सकता है (देखें मेरे ब्लॉग पर कल की गयी उनकी टिप्पणी) तो मैने देखा कि वह मैने पहले ही डाउनलोड कर रखा है. फ्री की चीज पर नजर जाती नहीं. यही दो चार डालर दे कर लिया होता तो घिस कर इस्तेमाल करते.

फॉयरफॉक्स जमाने से प्रयोग करता हूं और यह मुझे सबसे बढ़िया ब्राउजर लगता है. खुलता दन्न से है. गूगल सर्च टूल बार इण्टरनेट एक्स्प्लोरर की गूगल टूल बार से बेहतर है. इसके अलावा ऐड-ऑन सॉफ्टवेयर की बड़ी च्वाइस है. हिन्दी में कई ब्लॉग बढ़िया दिखते है, पर कुछ में मुझे एक्स्प्लोरर पर जाना होता है. इस को लेकर ज्यादा परेशानी नहीं है. अपने 90% काम के लिये मैं फॉयरफॉक्स का प्रयोग करता हूं. कोई आश्चर्य नहीं कि लगभग 24% ब्राउजर यातायात फॉयरफॉक्स के पास है.

स्टैटकाउण्टर वाले मुझे यह भी बताते हैं कि लोग कौन से ब्राउजर से मेरे ब्लॉग पर पहुंचते हैं. यह देख कर मुझे आश्चर्य होता है कि मोजिल्ला फॉयरफॉक्स प्रयोग करने वाले भी 20-22% ऐसे हैं जो उसके पुराने संस्करण से काम चला रहे हैं. मोजिल्ला फॉयरफॉक्स का 2.0 सीरीज का ब्राउजर उपलब्ध है पर काफी लोग मोजिल्ला फॉयरफॉक्स 1.5 या 1.0.7 का प्रयोग कर रहे हैं. गूगल वाले अपनी टूल बार के साथ मोजिल्ला फॉयरफॉक्स के लेटेस्ट संस्करण को डाउनलोड की सुविधा देते हैं. उसका उपयोग करने में बुद्धिमानी है. ऐसा फॉयरफॉक्स रेफरल ऐडवर्टिजमेंट हमने भी बाजू में अपने ब्लॉग पर लगा रखा है यह बताने को कि हम फॉयरफॉक्स के मुरीद हैं. वैसे फ्री-फण्ड के सॉफ्टवेयर में कई बार चोट हो गयी है जब उसके साथ वायरस/स्पाईवेयर उपहार में मिल जाते हैं. पर गूगल-फॉयरफॉक्स के साथ उसका खतरा नहीं.

सी-नेट रिव्यू में इण्टरनेट एक्स्प्लोरर 7 तथा फॉयरफॉक्स 2 का तीन जजों द्वारा तुलनात्मक आकलन किया गया है. कुल 5 मुद्दों पर आकलन है :

  • इंस्टॉलेशन की दिक्कतें
  • लुक एण्ड फील फैक्टर तथा बढ़ते प्रयोग कर्ता
  • टैब में ब्राउजिंग
  • अपग्रेडिंग और नये फीचर
  • सिक्यूरिटी और परफार्मेंस

तीनो जजों ने इन सभी मुद्दों पर फॉयरफॉक्स को बेहतर पाया है. अत: आपके पास अगर फॉयरफॉक्स नहीं है तो अजमायें, बढ़िया लगेगा. और साथ में श्रीश का शब्दकोश वाला सर्च जरूर डाउनलोड कर लीजियेगा.

मैं जानता हूं कि यह लिख कर मैं ई-पण्डित के कार्य क्षेत्र में अनावश्यक दखल दे रहा हूं. पर कभी-कभी सामान्य ज्ञान वाला भी विशेषज्ञों वाले टॉपिक पर (दोयम दर्जे का ही सही) लिख तो सकता है वह भी तब जब आप वास्तव में “फील-गुड़-फैक्टर” महसूस करते हों!

हिन्दी और अंग्रेजी में छत्तीस का आंकड़ा क्यों है?

June 21, 2007 by Gyandutt Pandey

छत्तीस का प्रयोग देवनागरी आकड़ों में तब होता है जब तनातनी हो. अंग्रेजी और हिन्दी में झगड़ा होने का कोई कारण नहीं होना चाहिये. दोनो अपने अपने प्रकार से समृद्ध भाषायें हैं. अंग्रेजी के नाम से बिदकना शायद इसलिये होता है कि कुछ लोग अंग्रेजी को शासन तंत्र की भाषा मानते हैं. पर अब शासन नहीं, उत्तरोत्तर बाजार मजबूत हो रहा है. चलेगा वह जिसे जनता वापरेगी. चाहे वह हिन्दी हो या अंग्रेजी.

मैने पहले परिचर्चा में अंग्रेजी का प्रयोग सम्प्रेषण की सहूलियत के लिये किया था.तब हिन्दी में टाइप करना मेरे लिये बहुत झंझट का काम था. पर पिछले कुछ दिनों से इस ब्लॉग पर अंग्रेजी का प्रयोग बतौर टीज़र कर रहा था. तभी कल अमित और श्रीश का नाम लेकर लिखा.

श्रीश मैं ऑन रिकार्ड कहना चाहूंगा निहायत शरीफ इंसान हैं. वे टीज़र पर छैलाये नहीं. लाल-पीले नहीं हुये. उनकी जगह मैं खुद होता, जिसे (अगर) हिन्दी का जुनून होता तो, ताल ठोंक मैदान में आ गया होता. मैं अंग्रेजी-हिन्दी में फ्लिप-फ्लॉप न करने का निर्णय इसलिये लेता हूं कि मैं श्रीश को प्रोवोक नहीं कर पाया!

खालिस हिन्दी में लिखने की और सोचने की अपनी लिमिटेशन हैं. मेरे पास केवल कामिल बुल्के की डिक्शनरी है, जो सटीक हिन्दी शब्द सुझाने में कई बार गच्चा दे चुकी है. लिहाजा अंग्रेजी को सीधे देवनागरी में लिखने के और कोई चारा नहीं बचता.

कल जो महानुभावों ने चलेबल (चल सकने योग्य) माना है वह शायद यह है कि अंग्रेजी की संज्ञा-सर्वनाम-क्रिया भले हो, पर व्याकरण/वाक्य विन्यास और लिपि हिन्दी की अवश्य हो. अगर हिन्दी ब्लॉगरी पंचायत इसे रेटीफाई करती है तो मेरे जैसा जन्मजात रेबल अपने आप को रबल नहीं सफल मानेगा!

प्रियंकर जी बता सकते हैं कि “कामिल बुल्के” के बाद उससे बेहतर अंग्रेजी-हिन्दी कोश कौन सा आया है. सरकारी प्रयास तो मक्षिका स्थाने मक्षिका वाले अनुवाद के होते हैं. उनके अनुसार लिखें तो लगता है कि एकादशी व्रत के दिन अलोना (बिना नमक-मिर्च-मसाले का) भोजन बना रहे हैं. लिहजा हिन्दी बरास्ते अंग्रेजी लिखने वालों की मजबूरी धुर-हिन्दी वाले ब्लॉगर समझने की कृपा करें.

असल में हिन्दी-अंग्रेजी में लाग-डांट होने का कारण सिर्फ यह है कि अंग्रेजों ने यहां राज किया. अन्यथा, अगर फ्रेंच में लिखा होता तो फ्रेंच पर व्यंग न होता; मात्र अनुरोध होता कि जरा साथ में हिन्दी अनुवाद भी लिख दिया करें!

कल की टिप्पणियां पढ़ने पर एक विचार मन में आया है – जो सम्भव है नितांत व्यक्तिगत असुरक्षा की भावना का प्रगटीकरण हो. बहुत से ऐसे लोग होंगे जो गाली वाले चिठ्ठे को निकाले जाने पर अभिव्यक्ति की आजादी के आधार उसे गलत निर्णय बताने और वापस लेने के लिये शायद लामबन्द हो जायें (या हैं), पर वे हमारे रोज के चार लाइन अंग्रेजी में ठूंसने के मुद्देपर हमें हिन्दी ब्लॉगरी से बाहर करने को सात-आठ दिन में ही धर्मयुद्ध/जिहाद बोलने से गुरेज नहीं करेंगे. और निकाल बाहर करने की दशा में, बावजूद इसके कि अभी शतकवीर होने की बधाई टिप्पणियां मिल रही हैं, किसी कोने से कोई सपोर्ट मिलने वाला नहीं है. हिन्दी ब्लॉगरी में कुनबापंथी का बड़ा स्थान है पर किसी की पर्सनल इडियोसिंक्रेसी के प्रति टॉलरेंस जरा कम ही है!

भाइयों, हिन्दी मस्त भाषा है. अंग्रेजी भी मस्त भाषा है. हिन्दी में दूध पिया है. अंग्रेजी में सूप पिया है. ऑलमण्ड सूप-सैण्डविच में भी पौष्टिकता और दिव्य अनुभूति होती है. अत: मुझे हिन्दी-अंग्रेजी में छत्तीस नहीं तिरसठ का आंकड़ा लगता है. दोनों साथ-साथ जियें. बल्कि दोनो के फ्यूज़न से ब्लॉग-हिन्दी (ब्लिन्दी) बने. यही कामना है!

ब्लॉग पर लिखने में न मुझे लेखक कहलाने की चाह है न अपने को हिन्दी/अंग्रेजी फेनॉटिक साबित करना है. जब तक मन चाहे ब्लॉग पर मडल थ्रू (muddle through) करना है!

इति हिन्दी-अंग्रेजी टण्टा पुराण. भूल-चूक माफ. सफेद झण्डा फहराया जाये!

नारद का कलेवर अखबार जैसा करें जनाब!

June 20, 2007 by Gyandutt Pandey

मैं अखबार के स्पोर्ट्स और फिल्म के पन्ने पर शायद ही जाता होऊं. भरतलाल (मेरा भृत्य) केवल फिल्म के पन्ने निहारता है. नगर/महानगर/अंचल की खबरें मेरे पिताजी पढ़ते हैं. यानि हर एक की पसन्द का अपना पन्ना. अखबार को ले कर घर में कोई चौंचियाहट नहीं है.

वही हाल नारद का होना चाहिये. हिन्दू का पन्ना; मुसलमान का पन्ना, सेकुलर का पन्ना; बच्चों का पन्ना, बाड़मेर पुलीस का पन्ना, खेल का पन्ना, रेल का पन्ना, बैन का पन्ना, कविता का पन्ना, सभ्य का पन्ना, गाली देने वाले का पन्ना…. सब अपने ब्लॉग को मन माफिक पन्ने के ऊपर पंजी करा लें. या फिर सहूलियत हो कि लिख्खाड़ ब्लॉगर लोग जो दिन में 5 पोस्ट लिखें और वे पांच अलग अलग पन्नों पे टंग जायें – उनके टैग के मुताबिक. उनकी सहूलियत के लिये दो चार और पन्ने क्रियेट कर दिये जायें – भुतहे पन्ने जहां कभी कोई भूले भटके ही जाता हो.

मेरा कर्तव्य नारद के वर्तमान झाम का सॉल्यूशन सोचना था. तकनीकी सिर फोड़ी जीतेन्द्र जैसे करें. वैसे भी लोग उनको तलाश रहे हैं! कुछ बाड़मेर पुलीस वाले ब्लॉग पर एफ.आई.आर. न कर आये हों!

कैसी लगी ये मुन्नी (मिनी) पोस्ट? जब प्रिय लोगों ने टार्गेट दिया है 1000 पोस्ट का तो ऐसी मुन्नी पोस्ट ही बन पायेंगी!
————
Joke apart, I feel, some kind of segregation will help. Once you have proliferation and variety in the content and do not want to police the Blog content (which otherwise you cannot do), the better option is sorting the Blogs and letting people decide where they want to go or what they want to read.
At present energy is wasted in clicking and finding that you have come to a post which is not in synchronism with your thought. But once you come to a post, like an obsessive blogger,you read and you fume and you comment and then suck your thumb because your comment will not make the chap change his views!
Sarcasm in comments, if avoided, can serve the purpose to a large extent. A post on Effective Commenting by Mr Sameer Lal is long over-due!
लगता है ब्लॉग में अंग्रेजी ठूंसने पर अमित और श्रीश अपनी कृपाणें ले कर आने वाले होंगे!